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Bhojpuri: सावन में झुलुहा के बा बाड़ा महत्व, एकरा पर बा कए गो गीत... पढ़ीं

झूला, जवना के हमनीं के भोजपुरिहा सभ झुलुहा भी कहेनीं जा, ओकर माजा तबे बा, जब पेंग बढ़ाके आसमान के चूमि लिहल जाऊ..आसमान के ई चूमल तब बहुते बढ़िया लागेला. एकरा के लेके कए गो गीत भी बा. पढ़ीं रउआ सभे...

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बचपन में एगो कविता पढ़ले रहनीं जा,
आओ हम सब झूला झूलें,
पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें.

ई झूला, जवना के हमनीं के भोजपुरिहा सभ झुलुहा भी कहेनीं जा, ओकर माजा तबे बा, जब पेंग बढ़ाके आसमान के चूमि लिहल जाऊ..आसमान के ई चूमल तब बहुते बढ़िया लागेला, जब आसमान में करिया मेघ छवले रहेला, बारिश के प्रेम फुहार पाइ के अगराइल धरती हरियर रंग के चूनरि ओढ़ि लेली..अइसना में पिया के यादि ना आवे, ई कइसे हो सकेला..तब झुलुहा झूलत सांवरि-गोरी के मुंह से फूटि पड़ेला,
सावन मनभावन ना भावे,
ना अइले सजनवां ए ननदो
ए भवनवां ए ननदो,
ना अंगनवा ए ननदो..

सावन के महीना में अगर सइंया संगे नइखन त बरखा के संगे-संगे विरह के जवन दर्द उठेला, ओह के जबरदस्त चित्रण सावन के कजरी गीतन में देखे के मिलेला..

अब एह गीत के ही देखीं....घर के पिछुआरि वाला नीमि के गांछि पर अब झुलुहा लटकि गइल बा. गांव में रहत देवर नवका भउजाई खातिर झुलुहा लगावे में ओकर मन बहुत लागता..दुपहरिया बीतत-बीतत टोला-महल्ला के लइकी सब जुटि गइल बाड़ी, झुलुहा झूलल शुरू हो गइल बा. अइसना में सुमधुर गीत के बोल फूटि रहल बा.

सावन में पिया नइखन त का ह...ननद के मनुहार के बादो कनिया उहवां से हटत नइखी..काहें कि उनुका केहू के इंतजार बा,
ना जइबे ननदी, हो ना जइबे ननदी
बेरन भइया अइहें अनवइया हो
सावनवा में ना जइबो ननदी..
सोने की थारी में जेवना परोसबो, चाहे भइया जेवे चाहे भइया जाय हो
सावनवां में ना जइबे ननदी..
मगही पानवा के बीड़ा लगइबो,
चाहे भइया रचे चाहे जाय हो,
सावनवां में ना जइबे ननदी
बेला-चमेली के सेजिया लगइबे,
चाहे भइया सुते चाहे जाय हो,
सावनवां में ना जइबो ननदी

भाई के प्रति भोजपुरिहा नवोढ़ा के प्यार सावन में कइसे परवान चढ़ेला, ई कजरी ओकर उदाहरण बा...

जेकर पिया घरे परदेस के घरे आ गइल बाड़े, चाहे घरहिं बाड़े, सावन के बरखा उनुकर हुलास बढ़ा देले बा..सावन, शिवजी के महीना ह, उनुका पूजा-पाठ वाला मंदिरन पर मेला-ठेला भी लागि गइल बा. अइसन में नायिका के मन के साध उमगि के बाहर आवहीं के बा, ऊ अपना पिया से मनुहार करतारी,
हमके सावन में झुलनी में गढ़ाइ द पिया
जिया बहलाइ द पिया ना
आइल सावन के बहार
लागे मेलवा बाजार
हमके संग-संग में मेलवा घुमाइ द
जिया बहलाइ द पिया न
कोयल कूके बार-बार
तरसे जियरा हमार, तरसे जियरा हमार
हमके बगिया में
हमके बगिया में झुलुहा झुलाइ द पिया ना

एगो नायिका के घर में पिया नइखन, ओकरा बाद कइसन उनुका दुख झेले के परता. आपाना सखियन से ऊ आपन दुख बांटतारी. सावन के गीत में एकर कइसन चित्रण भइल बा, एहू के देखीं..
पटना से बैदा बोलाइद
नजरा गइली गुईंया, नजरा गइली गुईंया
बारि बलमुवा गइले कलकतवा
बारि बलमुवा गइले कलकतवा,
गइले कलकतवा हो गइले कलकतवा
केहू सनेसा पहुंचाइ द, सरमा गइली सखिया
पटना से बैदा बोलाइ द, नजरा गइली सखिया.
हमरे जेठ जी करेले छेड़खानी
हमरे जेठ जी करेले छेड़खानी
करेले छेड़खानी करेले छेड़खानी
जेठानी जी, समझाइ ल, नजराइ गइली सखिया
छोटकी ननदिया बड़ी हरजाई
छोटकी ननदिया हरजाई
ससुर जी तनी समझाइ द, नजरा गइली सखिया

सावन में प्रकृति नाया नाया रूप धइ लेले..एह वजहि से ओकर सोभा देखत बनेला..अइसना में नायिका के मन मोर ना नाचे, कइसे हो सकेला. एह कजरी के देखीं, एह में कइसे प्रकृति के चित्रण भइल बा,
हरे रामा भीजत मोर चुनरिया
बदरिया बरसे ए हरी..
बदरिया बरसे ए हरी..
देख झूम रहल अमराई,
करि सीतल करे पुरवाई
हरे रामा बदरा में चमके बिजुरिया,
बदरिया बरसे ए हरी...
चारों ओर भइल हरियाली
नाचे फूल के डाली
हरे रामा मनवा उठेला लहरिया
बदरिया बरसे ए हरी

भोजपुरिया समाज कई बेर हंसी आ व्यंग्य में केहू के चिढ़ावेला कि फलानां रसगुल्ला छीलि के खाले..ओकरो एगो कजरी में कइसन प्रयोग भइल बा, इहो देखीं...ओइसे तक सावन में झूलुहा के किसिम-किसिम के चित्रण भइल बा, चंदन तिवारी के गावल एगो कजरी में रसगुल्ला आ झुलुहा प्रकरण के देखीं. ओकरा संगे टह-टह गोर नायिका के उमगल देखीं..
रहलीं करत दूध के कुल्ला,
छीलि के खात रहलीं रसगुल्ला सखि खुल्लमखुल्ला
झूला झूलत रहनीं बुनिया फुहार में, सावन के बहार में ना..
हम त रहलीं टह-टह गोर
करत रहीं हम अंजोर
मोरा अंखिया ओर
धर कहां अइसन तेज कटार में, चाहे तलवार में..
हंसली मोहरा दांत, कइलसि बिजुली मात
दाना काहां अइसन काबुली अनार में
सुघर कतार में ना..
जबसि आइस सवतिया मोर
सुखवा धइलसि दोसर छोर
झरे अंखिया से लोर
नइया मोर परल बा मझधार में
सुखवा जलधार में ना..

सावन के भोजपुरिया लोकरंग आताना तरीका से यादि कइले बा, अइसन-अइसन सौंदर्य-विरह, प्रकृति के चित्रण कजरी में बा कि ओह पर ग्रंथ के ग्रंथ लिखा जाइ, तबो ओकरा के सीमा में ना बांधल जा सकेला. आई सावन के बहार में रउंओ कजरी के आनंद लीं, झुलुहा झूलीं आ प्रकृति के गोद में सुकून हासिल करीं..

(उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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