Home /News /bhojpuri-news /

Bhojpuri: बंगाल में तंत्र- मंत्र: केतना सांच, केतना झूठ

Bhojpuri: बंगाल में तंत्र- मंत्र: केतना सांच, केतना झूठ

.

.

“तंत्र विद्या” भा “तांत्रिक” शब्द सुनते कई आदमी के मन में एगो खास तरह के कपड़ा पहिरले, तरह- तरह की माला आ अंगूठी धारण कइले, कौनो स्त्री भा पुरुष के रहस्यमय/ एक हद तक भयावह छवि आवेले. बाकिर जमाना बदलला का संगे- संगे अइसनो तांत्रिक रउरा के मिल जइहें जे एकदम हमरा- रउरा नियर ड्रेस पहिरले बाड़े. उनुकर माला कमीज भा कुर्ता के भीतर लुकाइल बा. हं अंगूठी आ कलाई में बान्हल धागा जरूर लउकेला.

अधिक पढ़ें ...

हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध धर्म में भी तंत्र विद्या के प्रचलन रहत आइल बा. बौद्ध धर्म में पहिली शताब्दी में तिब्बत आ हिमालय के कई गो इलाकन में तंत्र विद्या के साधक के उल्लेख मिल जाई. बंगाल के जादू आदि काल से ही लोगन के कौतूहल के बिसय रहल बा. पश्चिम बंगाल आ असम तंत्र विद्या के गढ़ रहल बाड़न स. पश्चिम बंगाल के तारापीठ के श्मशान तांत्रिक साधकन के चुंबक नियर आज भी आकर्षित करेला. तारापीठ 51 गो शक्तिपीठन में से एगो ह आ मान्यता ह कि एइजा माता सती (पार्वती) के आंख गिरल बा. ईहो मान्यता बा कि पश्चिम बंगाल के वीरभूम (बांग्ला में- बीरभूम) जिला में स्थित एह पवित्र स्थान पर सबसे पहिले महर्षि वशिष्ठ मंदिर बनवा के मां सती के पूजा “मां तारा” के रूप में कइले रहले.

रुउरा सभ के मन में ई प्रश्न उठल स्वाभाविक बा कि तंत्र साधना दरअसल ह का? ई त आदि कालीन तथ्य बा कि तंत्र विद्या के जनक – भगवान शिव हउवन. तंत्र विद्या कहेले कि जदि हमनींका “पाशबद्ध” बानी जा त जीव हईं जा आ जदि “पाशमुक्त” हो गइनींजा त हमनी के रूपांतरण शिव के रूप में हो जाला. पाश (बंधन) कथी के बा? त काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य (विद्वेष) के पाश बा. जीव से शिव बने खातिर चेतना के रूपांतरण के जौन प्रक्रिया बिया ऊहे तंत्र विद्या कहाले. तंत्र में पाशमुक्त होखे खातिर तीन प्रकार के तरीका बतावल बा- पशु भाव, वीर भाव आ दिव्य भाव. पशु भाव में भोग से योग के बात कहल गइल बा- चरम भोग से गुजरला का बाद जब मन उबिया जाला त मुक्त होके साधक के चेतना भगवान शिव से योग करेले आ साधक शिवरूप हो जाला. बाकिर पशु भाव में एक बहुते बड़ खतरा बा. खतरा ई कि साधक भोग में इतना लिप्त हो जाला कि योग ओकरा चेतना से गायबे हो जाला. ओकरा के काम- वासना “हद से ज्यादा” गिरा देले. अइसना में साधक आपन मानसिक संतुलन भी खो सकेला. वीर भाव में अहंकार के प्रबल होखला के कारन बहुते साधक, साधना मार्ग से विचलित हो जाला लोग आ सिद्धि कइसे मिलिहें सन, एकरा फेर में परि जाला लोग. एमें सबसे अधिका सुरक्षित बा- दिव्य भाव. तंत्र साधना के दूगो प्रमुख मार्ग बा- 1- कौल मार्ग या वामाचार और 2- समय मार्ग.

एह दूनो मार्गन में बीज मंत्र (जैसे- ह्रीं… आदि) आ श्रीयंत्र के प्रयोग होला. चूंकि ई विषय बहुत व्यापक आ गहरा बा, एसे ए लेख में सिर्फ कौल मार्ग पर ध्यान केंद्रित कइल जाउ. भविष्य में समय मार्ग के भी उल्लेख करब. कौल मार्ग में पंच मकार- मांस, मदिरा, मत्स्य (मछली), मुद्रा आ मैथुन- साधना के पांचि गो स्तंभ बाड़े सन. आईं एकर तात्विक अर्थ जानल जाउ. रामकृष्ण परमहंस भी वाम तंत्र के साधना कइले रहले. उनकर गुरु रहली- भैरवी ब्राह्मणी. बाकिर उनुका संगे अद्भुत घटना घटे. जब मदिरा के नांव लियाउ त ऊ नांवे सुनत बिना पियले गहिर नशा में डूबि जासु. उनका खातिर पंच मकार खाली प्रतीक रहे.

त पंच मकार ह का? आईं जानल जाउ.

मांस- मौलिक व्याख्या बिया कि मनुष्य के जनम मांसधारी प्राणी के रूप में होला. ओकर शऱीरबद्धता भा शरीर चेतना हरदम बनल रहेले. ऊ मांस खाला, मांस के देह टच करेला, देह में आसक्त रहेला. हर प्राणी मांस के संपर्क में रहबे करेला. त तंत्र में एह चेतना से मुक्त होखे के बा. मदिरा- मदिरा (शराब) पियला से नशा होला. त एइजा मदिरा के अर्थ निष्ठा, लगन रूपी मदिरा के सेवन से जुड़ल बा. एकरा खातिर जीभ के तालु में लेजाके कुछ खास क्रिया करावल जाला जौना से कंठ में एगो खास तरह के स्राव होला जौन मदिरा के नशा से भी ज्यादा नशा करेला. साधना के अंतिम लक्ष्य तक पहुंचे के नशा ना रही त साधक गहिर साधना कइसे करी? मत्स्य- ई त रउरा सब जानते बानी कि मत्स्य माने मछली/मछरी होला. मछरी स्वभाव से चंचल होले. जब मनुष्य में भोग के लालसा जागेला त मन बहुते चंचल हो जाला. त मछरी रूपी चंचलता खा लिहल, समाप्त क दिहल साधना के तिसरकी सीढ़ी होले. मुद्रा- साधना में मुद्रा के महत्व बढ़ि जाला. शक्तिपान मुद्रा, मांडुकी मुद्रा, योनि मुद्रा, ज्ञान मुद्रा आदि कई गो मुद्रा बाड़ी सन जौन साधना के बढ़ावे में मदद करेली सन. मैथुन- मैथुन के अर्थ होला- मंथन भा मथि दीहल. संसार में दूध के मथि के मक्खन बनेला. मतलब मथला का बाद कौनो नया चीज के जनम. ठीक एही तरे तंत्र में ज्ञान के मथि के सार तत्व पावल जाला. एही के भगवान शिव के असली तंत्र पद्धति कहल जाला. त शुद्ध तंत्र में मैथुन, काम- वासना से नइखे जुड़ल.

हर पेशा आ साधना पद्धति में कुछ नकली लोग आ जाले. ज्योतिष नियर तंत्र साधना में भी कुछ नकली लोग बाड़े जौन तंत्र विद्या के बदनाम क देले बाड़े. अइसन लोग तंत्र के नाम पर सिर्फ वासना पूर्ति आ भयभीत करे के धंधा करेले. कौनो तांत्रिक वगैरह किहां जाए के पहिले ओकरा बारे में सौ बार पूछताछ, जांच- परख कके जाए के चाहीं. कौनो तांत्रिक का लगे जाएके जरूरते का बा? घर में अपना देवी- देवता के पूजा करीं. राउर समस्या हल हो जाई. होला का कि कई लोग गंभीर समस्या, रोग भा प्रपंच के दलदल में फंसि जाला आ कौनो नकली तांत्रिक भी ऊपरी वेशभूषा आ पाखंडी बातचीत से अपना के बहुते बड़ तांत्रिक कहे लागेला. अब ऊ कथित तांत्रिक जातक के ठगे शुरू करेला. जदि ठीक से पता नइखे त तांत्रिक वगैरह के लगे जइबे मत करीं. ईश्वर से प्रार्थना करीं. बिना कहीं गइले राउर समस्या भगवान ठीक क दीहें. सिद्ध तांत्रिक आपन प्रचार ना करे . ओकरा लगे काम ढेर आ समय कम रहेला. सिद्ध तांत्रिक अपना प्रचार से दूरे रहेला.

कौल मार्ग आ समय मार्ग के श्री चक्र यंत्र/श्री यंत्र में तनकी भर के फरक रहेला. वाममार्ग आ समय मार्ग दूनो के श्रीयंत्र में नौ गो त्रिकोण होला. श्रीयंत्र के ऊपर वाला हिस्सा में सामान्य त्रिकोण के संख्या चार गो होला जौन भगवान शिव के प्रतीक ह आ नीचे के तरफ पांच गो उल्टा त्रिकोण होला. त कुल नौ गो त्रिकोण भइले सन. ऊपर वाला चार गो त्रिकोण शिव के आ नीचे वाला पांच गो त्रिकोण शक्ति के प्रतीक ह. ई त्रिकोण आपस में गुंथल रहेलन स. ई त्रिकोण एगो वृत्त के भीतर होले सन जौना पर कमल के पंखुड़ी बनल रहेला. दूनों तरह (वाममार्ग आ कौल मार्ग) के श्रीयंत्र में बीच में एगो बिंदु होला जौन समूचा ब्रह्मांड के प्रतीक होला. कई लोग श्रीयंत्र के वृत्त के ही ब्रह्मांड के संज्ञा दे देले . तारापीठ के एगो तांत्रिक के अनुसार बिंदु ब्रह्मांड के प्रतीक ह. कौल मार्ग के श्रीयंत्र में बिंदु त्रिकोण के नीचे होला आ समय मार्ग के श्रीयंत्र में बिंदु वृत्त के ठीक बीच में रहेला.

एइजा एक बात से सावधान रहल जरूरी बा. बाजार में बिकाए वाला कौनो भी श्रीयंत्र के घर में लेआके राखेके ना चाहीं. कई बार बाजार में नकली/गलत श्रीयंत्र भी बिकाले सन जौन घर में आवते अशांति, बीमारी आ धनहानि करावे लागेले सन. एही से श्रीयंत्र ज्यादातर तंत्र साधके श्रीयंत्र राखेला लोग भा ऊ लोग राखेला जे कौनो प्रामाणिक सिद्ध व्यक्ति के संपर्क में बा. एही से श्रीयंत्र ना राखिके भगवान शिव/पार्वती, मां दुर्गा आदि के चित्र राखल आ पूजा कइल जादे सुरक्षित बा.

कहल जाला कि भगवान शिव के तंत्र बहुते पवित्र आ मोक्षदायी ह. तंत्र विद्या के प्राचीन ग्रंथन में से एगो “विज्ञान भैरव तंत्र” बा. एमें कुल 112 तंत्र प्रविधि भा टेक्नीक के बारे में विस्तार से बतावल बा. साधक के जौन टेक्नीक अनुकूल लागे ऊ ओकर अनुसरण करे. तंत्र विद्या के कुल्हि ग्रंथन में देवी (माता पार्वती) प्रश्न कइले बाड़ी आ भगवान शिव तंत्र प्रविधि बता के प्रश्न के उत्तर देले बाड़े. एही से कहाला कि तंत्र विद्या फिलासफी ना, विज्ञान ह. परमहंस योगानंद अपना विश्वप्रसिद्ध पुस्तक “आटोबायोग्राफी आफ अ योगी” (हिंदी अनुवाद- “योगी कथामृत”) के 20वां अध्याय के फुटनोट में 14वीं शताब्दी के कश्मीर के संत लल्ला योगीश्वरी के चर्चा कइले बाड़े जौन एगो दिगंबर शिव भक्त रहली. उनका लंगटे रहला से एगो समकालीन व्यक्ति के धार्मिक भावना के ठेस पहुंचल. ऊ लल्ला योगीश्वरी से पुछलस- रउरा लंगटे काहें रहेनीं?

लल्ला योगीश्वरी ने जवाब दिहली- “काहें ना लंगटे रहीं. हमरा आसपास कवनो पुरुष लउकते नइखे.” लल्ला योगीश्वरी के उग्र विचारधारा के अनुसार जे ईश्वर के नइखे जानत, ईश्वर के सिद्ध नइखे कइले, ऊ पुरुष ना ह. जब लल्ला योगीश्वरी के अंतिम समय आइल त ऊ अपने आप प्रगट भइल अग्नि में समा के गायब हो गइली. आज भी कई लोग मानेले कि ऊ सिद्ध तांत्रिक रहली. ओकरा अगिला दिने लल्ला योगीश्वरी अपना भक्त लोगन के बीच पीला प्रकाश के वस्त्र पहिर के प्रकट भइली आ कहली कि हमरा के जे भक्ति से पुकारी, ओकरा किहां हम आ जाइब. बाकिर हमार भौतिक शरीर खतम हो गइल बा.

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News

विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर