भारतीय सिनेमा जब बोले लागल तबे से पर्दा प भोजपुरियो बोलsता

भारतीय सिनेमा जब बोले लागल तबे से पर्दा प भोजपुरियो बोलsता

भोजपुरी फिल्मन के इतिहास पर शोध करे वाला लेखक के दावा बा कि भोजपुरी फिल्म हिंदी के बोलत फिल्म के साथ ही चलत आइल बा. एकरा खातिर उ बाकायदा उदाहरण भी देत बाने.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 17, 2020, 12:44 PM IST
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लहीं भोजपुरी के पहिला फिल्म ' गंगा मईया तोहे पियरी चढइबो'' 1962 में रिलीज भइल लेकिन फ़िल्मी दुनिया में भोजपुरी के प्रवेश त तबे हो गइल रहे जब भारतीय सिनेमा बोले लागल. जी हाँ, 1931 में पहिलकी बोलती फिल्म या सवाक सिनेमा या टॉकी फिल्म जवन कहीं ..  आलम आरा बनल. ओही साल दौलत का नशा, नूरजहाँ आ फ़रेबीलाल तीन गो फिल्म रिलीज भइल जवना में भोजपुरी गीत भी शामिल रहे. दौलत का नशा में एगो मुजरा मुंशी सागर लिखले रहलें - गगरिया भरत न देय, हो बांके छैला.  नूरजहाँ फिल्म में एगो गीत रहल - जब से मोहन दरसवा देखाई गयो रे. फ़रेबीलाल में एगो गीत रहल- बलमुआ साथी कहो मोसे बतिया. कहे के मतलब कि गीत-संगीत के राहे सिनेमा में भोजपुरी घुसिए गइल.

शुरूआती दस साल (1931-1939)
1932 में एगो फिल्म आइल, भर्तृहरि. एह में तीन गो गीत अइसन रहल जवना के मुखड़ा भोजपुरी में रहे आ अंतरा हिंदी में. पहिला गीत के बोल रहे, '' मन ना रंगावै, रंगावै जोगी कपड़ा'', दूसरा गीत के बोल रहे, 'उड़ि जा रे कारे कगवा नगर से हमरे' आ तीसरा गीत के बोल रहे, 'मर गई हाय रे मोरी दईया.'  1932 में हीं बनल ' इंदरसभा 'एगो संगीत ओपेरा फिल्म रहल जवना में छोट-छोट लगभग 70 गो गाना रहे. अब तक के सबसे अधिक गीत वाली फिल्म के विश्व रिकॉर्ड एही फिल्म के नामे बा. एह फिल्म में एगो गाना बा जवन इन्द्र के सभा में एगो परी गावत बाड़ी. गाना के मुखड़ा बा - महाराजा से नैना लड़इबै हमार कोई का करिहैंअउर गाना के अंतरा भी भोजपुरिये में बा –

ना डरबै हम सास ससुर से / मुंशी दरोगा, लोगवा नगर से  ... छोड़ि के घर, चलि अईबै , हमार कोई का करिहैं
(एह लोकगीत में थोड़ा सा बदलाव करके मजरूह सुल्तानपुरी अर्धांगिनी फिल्म में गीत लिखलें - अपने सइयां से नैना लड़इबै हमार कोई का करिहैं) सिनेमा जगत के ई पहिला गीत ह जवन कम्प्लीट भोजपुरी में बा माने कम्प्लीट भोजपुरी फ़िल्मी गीत.



1933 में इजरामीर निर्देशित आर. एस. चौधरी सुलोचना उर्फ़ टेम्पल बेल के लिखल  फिल्म में भी गीतकार मुंशी नश्तर के लिखल दू गो भोजपुरी गीत रहे. मोहन के लेई के अलग रहबै आ दगाबाज तोरी बतिया ना मानू रे. 1939 में महबूब के फिल्म पुकार में कमाल अमरोही एगो धोबिया लोकगीत रखले रहलें - छीयो राम छीयो.... छीयो राम छीयो / कवन घाट तोर अउनन-सउनन, कौन घाट तोर घाट / मिर्जापुर मोर अउनन-सउनन, काशी जी मोर घाट / छीयो राम छीयो.....  छीयो राम छीयो

1943 के ई घटना त नींव के ईंट जइसन बा
1943 में एगो फिल्म बनल तकदीर जवना में एगो गीत (ठुमरी) भोजपुरी मेंरहे. ई गीत बनारस के रहे वाली ठुमरी गायिका, नृत्यांगना आ अपना मातृभाषा भोजपुरी से अगाध प्रेम करे वाली जद्दनबाई के जिद्द पर राखल गइल रहे. जिद्द उ कइली निर्देशक महबूब खान से जेकर मातृभाषा गुजराती रहे. गीत रखाइल. बोल रहे, ' बाबू दरोगा जी कवने करनवा बन्हलs पियवा मोर .."  दरअसल पूर्वी के बेताज बादशाह महेन्दर मिसिर के एगो ठुमरी के शब्दन में कुछ हेर-फेर क के ई गीत बनल.  हेरफेरकार रहलें गीतकार अशोक पीलीभीती. रफीक गजनवी के संगीत पर शमशाद बेगम के आवाज़ में ई ठुमरी आपन छाप छोड़लस.

जद्दनबाई खुश भइली काहे कि उनकर दू दू गो सपना साँच भइल. एगो त भोजपुरी गीत पर्दा पर नाचल आ साथ हीं (एह गीत पर ) नचली उनकर बेटी जे एह फिल्म के नायिका रहली. बेटी माने के ?  .... नरगिस. अभिनेता संजय दत्त के माई. बतौर मुख्य नायिका नरगिस के ई पहिला फिल्म रहे. ई पहिला भोजपुरी फिल्मी गीत रहल जेकरा के गैर भोजपुरी भाषी भी मजा लेके गवलें. एह गीत के रिकॉर्ड खूब बिकल. 1946 में एगो फिल्म आइल - धरती के लाल. ख्वाजा अहमद अब्बास के एह फिल्म में भोजपुरी-हिंदी के जानल-मानल साहित्यकार प्रोफ़ेसर उमाकांत वर्मा के एगो भोजपुरी गीत शामिल रहे- केकर-केकर नांव बताई - ई जग बहुत लुटेरा हौ.

सिनेमा जगत में भोजपुरी के प्रवेश के सबसे चर्चित कहानी
बाकिर बम्बई के फिल्म संसार में भोजपुरी के विजय प्रवेश के सबसे चर्चित कहानी त फिल्म नदिया के पार के पीठ पर हीं टांकल गइल बा.  बाप रे बाप हिंदी फिल्म के सगरी गीतवे भोजपुरी में आ एकर श्रेय जाता अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के भूतपूर्व अध्यक्ष गीतकार श्री मोती बी०ए० जी के. बात सन् 1946 के ह. श्री मोती बी० ए० जी भोजपुरी में एगो गोत लिखलीं आ फिल्मिस्तान लि० में, विख्यात अभिनेता अशोक कुमार आ प्रोडक्शन विभाग के संचालक शशिधर मुखर्जी के सुनवलीं. गीत सुन के ऊ लोग मोहा गइल आ इहाँ के नियुक्ति फिल्मिस्तान में गीतकार के पद पर हो गइल. गीतरहे -

काटे ना कटे मोरा दिनवा गवनवा कब होई, पिया के अवनवा, मीलनवा कब होई, अइले सजनवा सपनवा, गवनवा कब होई फिल्म जगत में विशुद्ध भोजपुरी गीत के ई अद्भुत प्रयोग रहे बाकिर अशोक कुमार के निर्माणाधीन पिक्चर ' आठ दिन ' में एकरा खातिर कवनो सिचुएशन ना रहे. एह से ई गीत एगो दोसरा फिलिम ' एककदम ' में रेकार्ड भइल, बाकिर एह फिलिम के नायिका दमयन्ती साहनी के इंग्लैण्ड में आकस्मिक निधन हो गइला से फिलिम पूरा ना हो सकल. बाद में सन 1947 में एगो फिलिम बनल 'साजन' जवना में श्री मोती बी०ए० जी के गीत (गजल) ' तुम हमारे हो न हो ' बड़ा फेमस भइल. एह फिलिम के निर्देशक रहले किशोर साहू. श्री साहू के अगिला फिलिम ' नदिया के पार ' रहे जवना के कथानक मछुआ मल्लाह के जिनिगी पर आधारित रहे. कथानक के परिवेश ग्रामीण रहे.

एह से एकर संवाद आ गीत ग्रामीणे भाषा में लिखाइल. संवाद साहू साहब खुदे लिखले छतीसगढ़ी में आ एकर गीत (आठ गो गीत) मोती बी० ए० जी लिखली भोजपुरी में. सन् 1948 में ई फिलिम परदा पर आइल आ दुनिया के कान में आवाज गूंजल भोजपुरी फिल्मी गीत '  कठवा के नइया बनइहे रे मलहवा, नदिया के पार दे उतार. ' ' दिल लेके भागा, दगा देके भागा, कवने बेदरदी से दिल मोरा लागा'. 'नजरिया में अइह, डगरिया में अइह, बजरिया में अइह हो संवरिया मोर '. 'अंखिया मिला के अंखिया, रोवे दिन रतिया न भूले बतिया भूले ना सुरतिया हो तोहार ',  ' मोरे राजा हो ले चल, नदिया के पार , मोरी रानी हो तूहीं मोरा प्रान के आधार 'आदि. सुधीर साहू आ कामिनी कौशल पर फिलमावल गइल पहिला गीत ' कठवा के नइया. . . 'विरहा के धुन पर रहे. " ई गीत जेही सुने उह कहे ' हाऊ स्वीट, हाऊ स्वीट ' .

कल्पना करीं बंगाली, पंजाबी, मराठी, गुजराती, मुसलमानी माहौल में भोजपुरी के ई शानदार प्रवेश केतना सुखदायी रहल होई? दूसरको गीत 'दिल लेके भागा . . . 'भोजपुरी स्वर माधुरी के मिठास कान के राह से दिल में उतार देत रहे. तीसरका गीत ' नजरिया में अइह ' त अतना प्रभावकारी रहे कि एकरा समानान्तर आ एही धुन में संतोषी जी एगो गीत लिखले–

बड़ी-बड़ी पाती लिखवइया, मोरा नन्हा सा दिल समुझइयाँ, हो सईया.

"एहो संवरिया, जो जइह बजरिया, त लइह चुनरिया खादी के. जय बोलो महात्मा गांधी के. कहे के मतलब ई कि 'नदिया के पार' के भोजपुरी प्रधान गीतन के जादू फिल्मी दुनिया पर बखूबी चल गइल. एकर गीत संसार भर में गूंज उठल. एकर बहुत नकलो भइल. ' मोरे राजा हो… के धुन पर आरती फिल्म में एगो गीत बनल 'बार –बार तोहे का समुझाएं पायल की झनकार, आवो चलो सजनी ले चलूं नदिया के पार. ' ' आजाद ' फिल्म के एगो कौव्वाली भी एही धुन प रबा.

बागों में बहार आई, देखो जी खिली हैं कलियां
आना हो तो आ जाओ, सुनी है मोरी गलिया.

खुद चित्रगुप्त जी ' बनवारी हो हमरा के लरिका नादान ' में एही धुन के प्रयोग कइले बानी. ई सब करामात भोजपुरी के ह. फिल्म में भोजपुरी के एतना बड़ प्रयोग के ईहे कथा सार ह, जवना के बाद दिलीप कुमार अवधी में ' गंगा-यमुना ' आ भोजपुरी में विश्वनाथ शाहाबादी जी ' गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो ' बना के सफलता के मोहर लगा दिहलन. भोजपुरी बोले वाला लोग हिकारत के नजर से देखल जात रहे. अब ओ लोगन के सम्मान बढ़ गइल. भोजपुरी देस- विदेस के कोना-कोना में पहुंच गइल. ई त होखहीं के रहल बाकिर श्रीगणेश नदिया के पार से भइल.

डुमरी कतेक दूर अब नियराइल बा (1948-1960)
एह कालखंड में त कम्प्लीट भोजपुरी फिल्म बनावे खातिर पहल भी शुरू हो गइल रहे जवना के सबूत बा ओह समय रघुवंश नारायण सिंह के संपादन में छपे वाली भोजपुरी पत्रिका ' भोजपुरी ' में फिल्म निर्माता लोग के छपल चिठ्ठी. केहू पाकल-पाकल पनवा बनावे के कोशिश करत रहे त केहू वीर कुंवर सिंह. बाकिर तबो जादा लोग गाना आ संवादे प खेलत रहे. कम्प्लीट फिल्म खातिर अह-जह लागले रह गइल.

1956 में एगो फिल्म आइल- टकसाल. एह फिल्म में प्रेमधव बनारस के हीं लोक गायक दुखरन के निर्गुण के संस्कारित कर के एगो गीत पेश कइलें - अइलें सजना हमार लेके डोलिया कहांर / चलि जइबै मुंहवा ढांपि के चदरिया में.

एह सब के अलावा प्रेमचंद के कहानी दो बैलों की कथा पर आधारित ननद- भौजाई संवाद गीत आज भी सुनल जाला - कौने रंग मुंगवा, कवने रंग मोतिया, कवने रंग हो, ननदी तोर भईया.  फिल्म गोदान में भी भोजपुरिया रंग रहल.  चार दीवारी ( संगीत - सलिल चौधरी ) अउर तीसरी कसम (संगीत - शंकर जयकिशन ) के गीत त हिंदी भइला के बावजूद भोजपुरिये लागे.  काला पानी ( संगीत - सचिन देव वर्मन ) में पॉपुलर मुजरा गीत, मजरूह साहेब ज्यों के त्यों पेश कइलें - नज़र लागी राजा तोरे बंगले पै / जो मै होती राजा बन कै कोईलिया / कुहुकि रहतीं राजा तोरे बंगले पै फिल्म  गंगा -जमुना के अवधी -भोजपुरी मिक्स गीत , '' नैन लड़ी जइहें त मनवा मा कसक होइबै करी '' आजो सबका जुबान पर बा.

कहे के मतलब कि बोलती फिल्म के साथ हीं साथ 1931 से हीं सिनेमा में भी भोजपुरी अपना गीत-संगीत में बोले लागल रहे, गूंजे लागल रहे आ लोग के दिलोदिमाग पर छा के फिल्म के सफल भी करावे लागल रहे.  (लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा के इतिहासकार हैं.)
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