Bhojpuri: बीतत आषाढ़ में भइल धाराधार बरखा, लेकिन खुश नइखे किसान लोग!

बारिश त भइल, लेकिन मौसम विभाग आ किसान लोग अबहियों एह बरखा से खुश नइखन. काहें कि धनखेती लायक अबहियो पूरा पानी नइखे बरसल. हालांकि उमेदि लागि गइल बा. घाघ के जमाना ले कम से कम एह बेरि बरखा ठीके भइल बा.

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देरी भले भइल, बाकिर आषाढ़ बीतत-बीतत के मेह धाराधार बरसि गइले. मौसम विभाग आ किसान लोग अबहियों एह बरखा से खुश नइखन. काहें कि धनखेती लायक अबहियो पूरा पानी नइखे बरसल. हालांकि उमेदि लागि गइल बा. घाघ के जमाना ले कम से कम एह बेरि बरखा ठीके भइल बा. घाघ कवि के एक साल लागत रहे कि परदेसहीं जाएके परि बाल-बाचा के पेट पाले खातिर पुरूब देस खातिर ऊ निकलियो गइल रहले कि उनुकर नजरि पुरूब दिसा के ओरि गइल. आसमान में करिया बादरि छा गइल रहे. उनुका आभास हो गइल कि थोरहिं देरि में बरखा हो सकेला. आपन जातरा ऊ टालि दिहले. बरखा बाजे लागल. तब उनुका जबान से निकलल रहे, पुरूब जात मोहिं पुरूबा राखा.

बीतत आषाढ़ में बरखा भइला से एहू के उमेदि बढ़ि गइल बा कि गोर-गोर बाहिं में हरियर चूड़ी सजी. पिछुआरि वाला नीमि के फेंड़ पर झुलुहा लागि. नाया ससुरा गइल धिया भी आस कइ सकेली कि उनुका नइहर जाए के मिली.

बाकिर सबके भागि एके नीयर नइखे. केहू-केहू के माई-बाबूजी अब नइखन. या त दुनिये में नइखन भा परदेस चलि गइल बाड़े. अइसना में एगो नवोढ़ा के नइहर से तीजि के मिठाई आइल बा, एह मिठाई के देखि के उनुका मायका के यादि आवता. एह यादि में माई-बाबूजी के ना रहला के हूक कतना गहरा बा, एह लोकगीत से समझीं.
नइहर से आइल बा मिठाई पिया
गइनीं दुबराइ पिया ना
बाबा रहिते हमार, खबरि लिहिते बार-बार
बिना माई के कइसन बिदाई पिया
गइनीं दुबराई पिया ना
पिया छूटे रोआई पिया ना

भोजपुरिया समाज के पीढ़ियन से बड़ समस्या से जूझे के आदति बा. रोजी-रोजगार के मजबूरी से भोजपुरिहा जवान के परदेसी कमासुत बने के परत रहल बा. गरमी के दिन में परदेसी कमासुत गांवे लवटि आवत रहल हा. चैत में दंवरी के बाद घरे आइल अनाज-पानी के दम पर बेटा-बेटी के बियाह-सादी, मुंडन-जनेव के लगन गरमिये में होत रहल हा. परदेसी कमासुत एही वजहि से गरमि में छुट्टी लेत रहल हा लोग. छुट्टी में तीन गो काम निबटावत रहल हा लोग. पास-पड़ोस, हितई-नतई के सादी-बियाह, मुंडन-जनेव में शिरकत कइल आ चइत के कटनी में गिरहथ बाबू जी के मदद आ फेरू जनेरा-धान के बोवाई-रोपाई करावल. एकरा बाद जइसहीं आषाढ़-सावन बरसे लागत रहल हा, परदेसी कमासुत परदेस के मुंह कइ लेत रहल हा लोग. एह परंपरा में अबहुं बदलाव नइखे भइल.

घर के बेटा जहिया परदेस खातिर निकले लागेला,ओह दिन के नजारा बेहद मार्मिक रहेला. आंगन के किनारे वाला कोठरी के अधखुला पल्ला से पीछे से दूगो सून आंखि परदेसी के जात देखत रहि जाले. आंगाना में चारि गो आंखि धाराधार बहि रहलि होले, ऊ आंखि होले माई आ बहिना के. परदेसी के हालत तब बहुते अजीब होला. ओकरा मरद के नाते ई देखावे के परेला कि ओकरा आंखि में लोर नइखे, केवाड़ी के पीछे खाड़ आपाना कनिया से मिले के भी चाहत होला. बाकिर बाबूजी उहवें खाड़ा रहेले, एह लेहाज ऊ कनिया के ओरि देखियो ना पावेला. कबो नजरि बचा के धीरे से खालि देखि लेला. अइसना में कठकरेज के भी लोर ना बहरियाई, अइसन होइये ना सकेला.

हर बेरि केवाड़ी के पल्ला के पीछे खाड़ कनिया के एकही इच्छा होला, कम से कम एह सावन में पिया परदेस मति जासु. ओकर ई चाहत अइसे फूटि पड़ेला,
असों के सावन सइयां घरहिं रह,
घरहिं रह ननदी के भाई.
सांप छोड़ेला आपन केंचुलि,
गंगा छोड़ेलि अरारि.

हाय रे भोजपुरी माटी के मजबूरी, केहू-ए-केहू के ई चाहति पूरा हो पावेला.

आ जेकर पिया घरे रहि गइले, जेकरा घरे आताना खेती-बारी बा कि ओकरा परदेस जाए के मजबूरी नइखे, उनुकर बातिए मत पूछीं. फेरू त ऊ आपन कलाई सजावे लागेली. सावन से मेंहदी के भी गहरा नाता बा. अइसना में ऊ आपाना पिया से मेंहदी के इसरार करे लागतारी,
पिया मेंहदी लियाइ द मोतीझील से
जाके साइकिल से

सावन अब आवहिं लागल बा. सावन के इंतजार खाली सौंदर्य या प्यार खातिरे नइखे होत. भारतीय लोकचेतना गहराई से पर्यावरण से भी जुड़ल रहलि बिया. रऊंआ यादि होइ निबउरी, नीमि के फर. ऊ सावने में पाकेले. जवना से किरावना मारे वाला तेल निकालल जाला, खेती खातिर जैविक खाद आ कीटनाशक बनेला, दवाई बनेला. निबउरी आ सावन के एह नाता के भी लोकचेतना आपाना तरीका से यादि करतिया,
कांचे नीमि के निबउरी , सावन जल्दी अइयो रे

सावन आवहिं वाला बा, ओकरा बाद कजरी के गूंजल स्वाभाविके बा. राधा रानी के झुलुहा खेले के मोका आवहिं वाला बा. अइसना में ई कजरी ना गूंजी त अचरजे होई,
रिमझिम बरसे पनिया, झूले राधारनिया ए हरी
घिर आए घुमड़ घन कारे
पड़े रिमझिम बूंद फुहारे
हरे रामा चमकि रही दामिनिया
झूले राधा रनिया ए हरी

(उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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