Bhojpuri: भितरिया ताकत जुटावे के उतजोग रहे के बा निरोग

भगवान रामो त अत्याचारी रावन प विजय पावे खातिर रात में शक्ति सरूप देवी के उपासना कइले रहलन आ एगो फूल कम परि गइला पर राजीव लोचन राम हथियार से आपन आंखि निकाले जात रहलन.तलहीं माई दुरुगा परगट होके जीत के वरदान देले रहली आ ओही कथ प महाप्राण निराला के अमर कविता 'राम की शक्ति पूजा ' रचाइल रहे.

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  • Last Updated: April 19, 2021, 4:54 PM IST
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ओइसे त चइत अंजोरिया के नवमी तिथि मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी के जनम खातिर जानल जाला आ रामनवमी का रूप में मशहूर ई दिन सीताराम आउर हनुमान जी के शोभाजातरा, महावीरी धजा बदलाए के जलसा हुलास-उछाह से मनावे बदे इयाद कइल जाला, बाकिर ओकरा पूर्व संध्या पर महा अष्टमी के रात में भोजपुरिया हलका में नमी(नवमी) पूजे के परिपाटी चलल आ रहल बा,जवना में नया सम्मत साल में कुलदेवी के पूजा कइल जाला. भितरिया ताकत जुटावे के ई उतजोग सालों भर निरोग आ ऊर्जावान बनवले राखेला. भगवान रामो त अत्याचारी रावन प विजय पावे खातिर रात में शक्ति सरूप देवी के उपासना कइले रहलन आ एगो फूल कम परि गइला पर राजीव लोचन राम हथियार से आपन आंखि निकाले जात रहलन.तलहीं माई दुरुगा परगट होके जीत के वरदान देले रहली आ ओही कथ प महाप्राण निराला के अमर कविता 'राम की शक्ति पूजा ' रचाइल रहे.

भोजपुरिया समाज के सेहतमंद बनवले राखेवाली आ हरेक आफत-बिपत से बचाके बढ़न्ती देबेवाली देवी मातादाई भा शीतला माता के नांव से इयाद कइल जाली. जब-जब कवनो महामारी आवेले, शीतलता देबे आ भला-चंगा करे खातिर शीतला माई के गोहरावल जाला-'हारे को हरिनाम' लेखा.

जइसे 2020 से अब ले देश-दुनिया कोरोना महामारी से जूझि रहल बा, ओइसहीं 1919-20,1820,1720,1520-कहे के माने ई हरेक सइ साल पर अइसन-अइसन महामारी अइली स कि जनमानस दहलि गइल. स्पेनिश फ्लू, प्लेग, चेचक, हैजा नियर जानलेवा महामारी जब अइली स, त ओह घरी वायरस भा विषाणु का बारे में आम जनता अनभिज्ञ रहल. नतीजतन इन्हनीं के दैवी आफत आ दुष्टातमा के सराप बूझि लिहल गइल.फेरु त संकट से निजात पावे खातिर 'एक भरोसो, एक बल,एक आस-बिसवास' ओह शीतला माता के शरन में जाके उन्हुकर महिमा के बखान होखे लागल रहे, जे कीटनाशक नीम के डाढ़ प झुलुहा झूलेली आ पियासि लगला प गांछ-बिरिछ के सेवा में लागल मालिन के हाथ से पानी पीके मए परिवार के समृद्धि-बढ़न्ती के वरदान देली. फेरु त सभ केहू ओइसने असीस के उमेदि से आराधना-उपासना करेला.

जवना शीतला माता के पूजा कइल जाला, उन्हुकर सात गो बहिन बाड़ी-
वंदे अहं शीतला देवीं रासभस्थां दिगंबराम्,

मार्जनी कलशोएताम् शूर्पालंकृत मस्तकाम्

कहे के माने ई कि शीतला माई दिगंबर हई. ई नीम के पतई से सजल-धजल बाड़ी. इन्हिंका हाथ में शीतल जल से भरल कलशा बा आ माथ प 'सारतत्व के धरे आउर थोथा के उड़ावेवाला' सूप बा. मातादाई के पसंदीदा चीजु-बतुस बा- नीम, अंढ़उल के फूल, धूप-दीप, दूध, पीयर चुनरी (पीतमरी), लवंग, खप्पर वगैरह. एही से जब नमी(नवमी) के पुजाई होला, त एह चीजन पर खास धेयान दिहल जाला. चूंकि माई सर्वहारा के पक्षधर हई, एह से पुजाई में वंचित वर्ग के विशेष तवज्जो दिहल जाला. हजाम आम के पल्लो ले आवेलन. मलहोरी फूल आ हार दे जालन.



ऊ माला उपेक्षित फूलन से बनल रहेला-जइसे जटाधारी, कनइला वगैरह के फूलन से.हं,अंढ़उल के फूल आ नीम के पतई जरूर होला. कोंहइन भा कोंहार माटी के कलशा(मेटा),ढकनी, दीया देलन. पहिले जब माटी के घर रहे,त पियरी माटी से देवाल लिपा जात रहे. गाय के गोबर से अंगना, ओसरा, दुआर लीपिके चारू ओरि सोन्ह पवित्रता के गमक फइलावत जात रहे. पूजा के जगह पर चउक पुरात रहे. कलशा में इनार के शीतल जल भरिके ओकरा ऊपर ढकनी में जौ भरात रहे.करू के तेल से दीया जरावल जात रहे आ पीयर चुनरी चढ़ाके गीत-मांगर से हाथ जोड़िके माई के आवाहन कइल जात रहे. शीतला माई के भोग लगावे खातिर दलपूरी आ गूर के रसिआव बनाके धऽ दियात रहे. बाकिर माई तबले ना आवत रहली,जबले चमरुआ बाजा बजावत चमार भा चमइन आके डगर ना दे देत रहे. रात के बारह बजे ले माई के गीत गा-गाके गोहरावल जात रहे आ फजीरे जब चमरुआ बाजा से फेरु डगर दियाउ, तब ई मानल जात रहे कि मातादाई भोग लगाके चलि गइली. फेरु ऊ परसादी (सिरिनी) बंटात रहे. सामाजिक समरसता से लबरेज़ कइसन तरक्की पसन पुजाई होला शीतला माता के! नमी का दिने कराहो चढ़ावल जाला-गाय के दूध,गूर आउर चाउर के, गोइंठा के आगी प डभकत कराह.

शीतला माता के बाट जोहत हाथ जोड़िके मेहरारू लोग गा उठेला-

कथी बिनु सून घनी बगिया, त कथी बिनु आंगन हो,

ए मइया, कथी बिनु सून देवघरवा, सेवकवा राउर बाट जोहे हो!

कोइलर बिनु सून घनी बगिया, बलकवा बिनु आंगन हो,

ए मइया, रउरा बिनु सून देवघरवा,

सेवकवा राउर बाट जोहे हो!

गीत में इहो जिकिर कइल जाला कि पूजा खातिर का-का सरंजाम जुटावल गइल बा आ एमें केकर-केकर रेघरिआवे जोग भूमिका रहल बा-

मलिआ के पूतवा बोलवले बानीं, हार-फूल मंगवले बानीं हो,

ए मइया, उजर लुगवा सेजिया सजवले बानीं,

सेजियवा रउआ आईं ना परीं.

कोंहरा के पूतवा बोलवले बानीं, कलशा मंगवले बानीं हो,

ए मइया,चमरा के पूतवा बोलवले बानीं,

डगर दियवले बानीं हो,

ए मइया---

खाली शीतला माता के आवाहन नइखे कइल जात. माई विंध्याचल, भगवान आ शिवोजी के संगें-संगें गोहरावल जात बा. पूरब से शीतला देवी, पछिम से विंध्याचल, उत्तर से भगवान आ दक्खिन से शंकर जी आवत बाड़न-

कहवां से अइली मइया शीतल अउरी विंध्याचल हो,

मइया, कहवां से अइले भगवान, कहां से शिवशंकर हो?

पुरुब से अइली मइया शीतल, पछिम से विंध्याचल हो,

मइया, उत्तर से अइले भगवान, दक्खिन शिवशंकर हो!

एह देवी-देवता के एके जगहा आसन देबे के प्रावधान नइखे.देवता लोग दुआर प आ ओसरा में बइठिहें,जबकि शीतला माता के देवघर में आ विंध्याचल देवी के अंगना में जगह मिली-

कहवां बइठइबू माई शीतल,कहवां विंध्याचल हो,

भगतिन, कहवां बइठइबू भगवान, कहां शिवशंकर हो?

देवघर बइठइबो मइया शीतल, अंगना विंध्याचल हो,

ए मइया, दुअरा बइठइबो भगवान, ओसरवा शिवशंकर हो!

बाकिर शीतला माई कहवां बेलमि गइली?

तबे नू कराह के दूध जस के तस परल बा.ऊ खउलिके माई के आवे आ चढ़ावा हंसी-खुशी से लेबे के सनेस काहें नइखे देत?गीत में मातादाई से सवाल-जवाब होता, बतकही होता.शीतला माता के जवाबो मिलत बा कि काहें आवे में देरी भइल?

कहवां बेलमलू ए मइया, कहवां बेलमलू हो,

ए मइया,लोहे के करहवा नाहीं डोले,

बलकवा राउर बाट जोहे हो!

आवत रहलीं ए सेवका,आवत रहलीं हो,

सेवका,रहिया में मिलले किछु कोढ़िया,

त काया देत बेलम भइल हो!

देवी माई ना सिरिफ कोढ़ियन के काया देली, बलुक आन्हर के आंखि, बांझ के संतान आ गरीब-गुरबा के दुनिया के सरबस सुख देली-

देवी माई अन्हरन के आंखि देली,

कोढ़ियन के काया देली हो,

माई बांझिनी के देली औलाद

आ निरधन के माया देली हो!

नमी पुजाई में देवी माई से दसों नोह जोरिके, साष्टांग दण्डवत कऽके आ नाक रगरिके सेहत के भीख विनयी भाव से मांगल जाला-

सुमिरेलीं शीतला भवानी,

संकट हऽरीं महरानी,

रछपाल बनीं जन-जन के

मंगल करीं महरानी!

सही माने में ई लोकपरब अपना आंतर में शक्ति के भक्ति जगावे के आ खुद के ऊर्जावान बनावे के दीढ़ संकलप लेबे के परब ह. सामाजिक समरसता, उपेक्षित के महत्ता आ भितरी-बहरी साफ-सफाई एकरा के अउर बेशकीमती बना देत बा. पहिले सउंसे जनसमुदाय के मंगल, फेरु आपन मंगल नमी पुजाई के मूल मंतर बा. (लेखक भगवती प्रसाद द्विवेदी वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
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