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Bhojpuri: बनारस क आखिरी कामरेड रहलन उदल, कोलसला से 9 बार बनलन विधायक

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बनारस जिला के देवराई गांव में एक किसान के घरे उदल वर्मा क जनम भयल रहल। समाजवादी सोच क उदल भाकपा क सदस्य बनलन अउर 1952 के आम चुनाव में पार्टी ओन्हय वाराणसी पश्चिम सीट से उम्मीदवार बनउलस। उदल कांग्रेस उम्मीदवार देवमूर्ति शर्मा से चुनाव हारि गइलन।

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बनारस आज दक्षिणपंथी राजनीति क गढ़ भले बनि गयल हौ, लेकिन एक समय इ वामपंथी राजनीति क गढ़ रहल। सन 1967 के आम चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) क सत्य नारायण सिंह कांग्रेस के रघुनाथ सिंह के हराइ के संसद पहुंचलन, अउर साथ में शहर दक्षिणी से रुस्तम सैटिन अउर कोलसला से उदल भाकपा विधायक के रूप में विधानसभा पहुंचलन। हलांकि उदल 1957 के चुनाव में ही कोलसला से अपने जीत क शुरुआत कइ देहले रहलन। 1985 के चुनाव में गंगापुर में भी ललका झंडा फहरल अउर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) क राजकिशोर विधायक बनलन। राजकिशोर 1989 में भी इहां से जीतलन। फिर ओन्हई के पार्टी क दीनानाथ सिंह यादव 1991 में इहां से जीतलन। लेकिन बनारस के कामरेडन में लंबी पारी उदल ही खेलि पइलन। बनारस में कम्युनिस्ट पार्टी क खाता भी उदल खोललन अउर खाता बंद भी ओन्हई कइलन। नौ बार जीत दर्ज करावय क कीर्तिमान भी बनारस में उदल के नाव ही हौ। उदल अपने जीवनकाल में कुल 13 विधानसभा चुनाव लड़लन, जवने में चार दइया ओन्हय हारय के पड़ल। खास बात इ कि उदल अपने चुनावी सफर क शुरुआत हार से कइलन, अउर ओनके चुनावी सफर क समापन भी हार से भयल। उदल के साथे एक संयोग इ भी जुड़ल हौ कि हर तीन जीत के बाद ओन्हय एक हार मिलल।

बनारस जिला के देवराई गांव में एक किसान के घरे उदल वर्मा क जनम भयल रहल। समाजवादी सोच क उदल भाकपा क सदस्य बनलन अउर 1952 के आम चुनाव में पार्टी ओन्हय वाराणसी पश्चिम सीट से उम्मीदवार बनउलस। उदल कांग्रेस उम्मीदवार देवमूर्ति शर्मा से चुनाव हारि गइलन। अगले चुनाव में वाराणसी पश्चिम क नाव बदलि के कोलसला होइ गयल अउर उदल 1957 के चुनाव में कांग्रेस के लालबहादुर सिंह के हराइ के पहिली बार विधानसभा पहुंचलन। एह तरह से बनारस में कम्युनिस्ट पार्टी क खाता खुलल। लेकिन एही चुनाव में दिग्गज कम्युनिस्ट नेता रुस्तम सैटिन शहर दक्षिणी से जीतत जीतत हारि गइलन।

उदल 1962 अउर 1967 के चुनाव में भी कोलसला से लगातार जीत दर्ज करउलन। लेकिन 1969 में कांग्रेस उम्मीदवार अमरनाथ दुबे से मामूली अंतर से चुनाव हारि गइलन। क्षेत्र क पुरनिया लोग बतावयलन कि दबंग जमींदार अमरनाथ दुबे गलत हथकंडा अपनाइ के चुनाव जीतल रहलन। हलांकि 1974 में उदल वापस कोलसला सीट पर कब्जा कइ लेहलन, अउर भारतीय क्रांति दल क उम्मीदवार वीरेंद्र प्रताप सिंह के हार क सामना करय के पड़ल। वीरेंद्र प्रताप सिंह काशी विद्यापीठ छात्रसंघ क अध्यक्ष रहलन, जवने के नाते तमाम विद्यार्थी चुनाव प्रचार में जुटल रहलन, साथ ही ओन्हय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी अउर मुस्लिम मजलिस क भी समर्थन रहल, लेकिन उदल के आगे सफलता नाहीं मिलल। एह चुनाव में कांग्रेस आपन उम्मीदवार नाहीं उतरलस। फिर 1977 अउर 1980 के विधानसभा चुनाव में उदल कोलसला से लगातार जीत दर्ज करइलन। लेकिन 1985 क चुनाव उ कांग्रेस उम्मीदवार रामकरण पटेल से हारि गइलन।

रामकरण पटेल उदल के ही बिरादरी क रहलन। लेकिन 1989 में अगले चुनाव में उदल रामकरण पटेल से अपने हार क बदला लेइ लेहलन। एकरे बाद देश में, खास कइके उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन क माहौल बनल। लेकिन उदल 1991 में भी कोलसला से बड़े अंतर से चुनाव जीतलन। भाजपा के पूर्णमासी वर्मा के खाली 21 प्रतिशत वोट मिलल, जबकि उदल 38 प्रतिशत वोट हासिल करय में सफल रहलन। उदल 1993 के चुनाव में भी जीत दर्ज करइलन, जबकि इ चुनाव अध्योध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद कांड के बाद भयल रहल। हलांकि ओनकर वोट प्रतिशत घटि के 27 प्रतिशत होइ गयल। लेकिन खास इ कि उदल क निकट प्रतिद्वंद्वी भाजपा नाहीं, बल्कि बसपा उम्मीदवार गुलाब रहलन, अउर ओन्हय 26 प्रतिशत वोट मिलल रहल।

उमर के ढलान के साथ उदल क सक्रियता भी कम होवय लगल रहल, जवने के नाते ओनकर वोट घटल जात रहल। प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार ओनके बुढ़ाई अउर बीमारी क दुष्प्रचार भी करय लगलन। चुनाव में सिद्धांत के बदले पइसा क बोलबाला होवय लगल। उदल 1996 के चुनाव के आपन अंतिम चुनाव बताइ के लड़लन अउर क्षेत्र के जनता से अंतिम बार जीतावय क अपील कइलन, लेकिन खाली 400 वोट से उ चुनाव हारि गइलन। भाजपा उम्मीदवार अजय राय पहिली बार कोलसला से विधायक बनलन। उदल एह चुनाव के पहिलय आपन अंतिम चुनाव घोषित कइ चुकल रहलन, जवने के नाते उ फिर चुनाव नाहीं लड़लन। एही के साथ बनारस से विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी क खाता भी बंद होइ गयल। सन् 1996 के चुनाव में भाकपा उत्तर प्रदेश में मात्र एक सीट जीतले रहल अउर गाजीपुर सीट से राजेंद्र विधानसभा में पार्टी क एकमात्र विधायक रहलन। एकरे बाद से आजतक भाकपा उत्तर प्रदेश विधानसभा में शून्य हौ। माकपा भी 2007 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में शून्य होइ गइल अउर आजतक शून्य हौ। बनारस में सबसे लंबे समय तक विधायक रहय वाला उदल लंबी बीमारी के बाद सन 2005 में अंतिम सांस लेहलन।

उदल सिद्धांत वाली राजनीति करय वाला नेता रहलन। ओनकर जीवन सादगी से भरल रहल। नौ बार विधायक रहले के बाद भी सरकारी पेंशन नाहीं लेहलन। अंतिम समय में बीमार पड़लन त ओह समय क मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव उदल के इलाज बदे सरकार के ओरी से पइसा भेजलन, लेकिन उदल मना कइ देहलन। ओनकर कहना रहल कि जीवन में कभौ जनता क पइसा अपने उप्पर नाहीं खरचे, त अब अंतिम समय में इ न होई।

उदल क सबसे बड़ी खासियत ओनकर सरलता रहल। हमेशा 24 घंटा जनता के बीचे रहय, सबके बदे सुलभ रहय। क्षेत्र क जनता एही नाते ओन्हय आपन नेता मानय। पिंडरा बजार में एकदम सड़क किनारे उदल क लकड़ी क एक ठे अड़ार (दुकान) रहल, अड़ार अबही भी हौ। ओही अड़ारी में एक चौकी पर खद्दर क बंडी अउर लुंगी पहिनले उदल दिनभर बइठल रहय। ठंढी के मौसम में कंबल रफ्फल ओढ़ि लेय। न त कवनो दरवाज रहल, न पीए ही। सड़क किनारे पूरी तरह खुल्लम खुल्ला। जे चाहय ते बिना रोकटोक ओनसे मिलि लेय, आपन समस्या बताइ देय। आज के जमाने में विधायक अउर मंत्री से मिलय बदे पहिले नेताजी के पीए से मिलय के पड़यला। कोलसला क नाव नए परिसीमन के बाद 2012 में पिंडरा होइ गयल, लेकिन क्षेत्र क जनता कोलसला वाले उदल के आज भी आदर सम्मान से याद करयला – क्षेत्र के अइसन दूसर नेता नाहीं मिलल।

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, लेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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