Bhojpuri Spl: पुण्यतिथि पर पढ़ीं कइसे बनारस के 'शमशेर' बनल रहन भोजपुरी के पहिला सुपरस्टार!

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आज सुजीत कुमार (Sujit Kumar) के पुण्यतिथि ह. उहांके भोजपुरी फिल्म के पहिला सुपरस्टार रहीं. सुजीत कुमार जी एक बार मनोज भावुक (Manoj Bhawuk) के इंटरव्यू देले रहीं. ओह दौरान उहांके भोजपुरी से लेके हिन्दी फिल्म पर भी बात कइले रहीं. पढ़ीं एगो आलेख...

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 5, 2021, 5:04 PM IST
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जन्म तिथि - 7 फरवरी, 1934, बनारस

पुण्य तिथि - 5 फरवरी, 2010, मुंबई

सुजीत कुमार भले जीयत नइखीं बाकिर उहाँ के ईयाद कइसे मरी. भोजपुरी सिनेमा के पहिला सुपर स्टार रहीं उहाँ के. लोग उहाँ के भोजपुरी सिनेमा के अमिताभ बच्चन कहत रहे. आज उहाँ के पुण्यतिथि ह. 7 फरवरी 1934 के बनारस में उहाँ के जनम भइल आ 5 फरवरी 2010 के मुंबई में कैंसर के कारण निधन हो गइल. उहां के वास्तविक नाम शमशेर सिंह रहे. उहां के डेब्यू फिलिम बिदेसिया रहे जवन 1963 में आइल. ई फिलिम सफल रहल. सुजीत कुमार एह से पहिले हिंदी के बहुत सारा सफल फिलिमन में अभिनय क चुकल रहनी. उहां के राजेश खन्ना के साथ समानांतर भूमिका में कई गो हिट फिलिम जइसे अनुराधा, हाथी मेरे साथी, अमर प्रेम, महबूबा, मेरे जीवन साथी, रोटी आदि में रहनी.

सुजीत कुमार बिदेसिया कइला के लगभग 14 साल बाद दंगल (1977) में अइनी. ई फिलिम बहुत सफल भइल आ सुजीत कुमार भोजपुरी के फुल-टाइम हीरो बन गइनी. उहां के लगातार फिलिम आइल आ ओहमें से अधिकतर सुपरहिट भइल. भोजपुरी के पहिलका दौर के उहां के सबसे सफल हीरो रहनी. उहां के उल्लेखनीय भोजपुरी फिलिम बा- बिदेसिया, दंगल, गंगा घाट, पान खाए सइयां हमार, गंगा कहे पुकार के, गंगा जइसन भउजी हमार, गंगा हमार माई, चम्पा चमेली, पतोह बिटिया, बैरी सावन, सजनवा बैरी भइले हमार, कब होइहें गवनवा हमार,भौजी, नागपंचमी, गंगा, सइयां से भइले मिलनवा, आइल बसंत बहार, बिधना नाच नचावे, लोहा सिंह, माई के लाल, सम्पूर्ण तीर्थयात्रा, सजाई द मांग हमार, सईंया मगन पहलवानी में आदि. 20 मई 2006 के मुम्बई में आयोजित भोजपुरी फिल्म और अल्बम अवार्ड-2005 में सुजीत कुमार के ‘लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड’ से सम्मानित कइल गइल रहे.
साल 2002 में उहां के मुंबई आवास पर हमरा (मनोज भावुक ) से भेंट भइल. दू दिन साथे रहनी. फिल्म एतबार के सेट पर भी उहाँ के हमरा के ले गइनी आ अमिताभ बच्चन जी से परिचय करवनी. ओह घरी सुजीत कुमार जी के हम एगो लम्बा इंटरव्यू कइनी. ओही बातचीत के प्रमुख अंश इहाँ साझा कइल जा रहल बा. ओह मुलाकात में सुजीत कुमार जी कहले रहीं कि भोजपुरी से हमार उहे नाता बा जवन बछरू के गाय से होला.

'कुमकुम कइली रिजेक्ट, नाज कइली सलेक्ट, तब भइले हीरो -

बकौल सुजीत कुमार- “हमने अब तक हिन्दी-भोजपुरी की कुल साढ़े तीन सौ फिल्मों में विभिन्न किरदार निभाएं हैं. हमारी फिल्में सुरीनाम, गुयाना, फिजी, मारीशस आदि देशों में भी प्रदर्शित हुई हैं और अभिनय से जब फिल्म प्रोडक्शन की तरफ रूख किया तो यहां भी मैंने कई सफल व उत्कृष्ट फिल्में दीं हैं और अभी अमिताभ बच्चन, जान अब्राहम, बिपाशा बसु को लेकर एक नई फिल्म ‘एतबार’ बना रहा हूं. विक्रम भट्ट इसको डाइरेक्ट कर रहे हैं, संगीत राजेश रोशन का है. 22 दिसम्बर 2002 से 10 जनवरी 2003 तक शूटिंग है। आप लोग आइए और देखिए.”



“जी-जी हमनी जरूर आएब. अइसन मौका हमनी थोड़े छोड़ब. राउर अनुष्ठान हमनियों के अनुष्ठान ह. बड़ी भाग से त अपने से भेंट भइल ह. हम हर भोजपुरिया फिल्मकार आ कलाकार से भेंट मुलाकात क के एगो नेटवर्क बनावे के चाहत हईं. हम चाहत हईं कि फेर से भोजपुरी सिनेमा के संसार लहलहा उठे. अइसन फिल्म बने जवना के फिल्म कहे में लाज ना लागे. जवना के देखि के हमनी के गर्व कर सकीं. का भोजपुरी सिनेमा के पहिलका दौर (जब बिदेशिया, गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो आ लागी नाहीं छूटे राम बनल रहे) वाला जोश-खरोश फेर नइखे पैदा हो सकत ?”

हमार बात सुनि के सुजीत कुमार जी मुस्कुरइनी, आंख बंद क लेनी आ अतीत के गुफा-खोह में निकल गइनी. बात शुरू हो गइल ‘लागी नाहीं छूटे राम आ बिदेसिया के’. सुजीत कुमार जी कबो हिन्दी बोलीं कबो कशिका भोजपुरी ( बनारस वाला भोजपुरी). उहां के सुर में सुर मिलावे बदे आ बात के प्रवाह आ त्वरित गति से आगे बढ़ावे बदे हमरो बीच-बीच में कशिका भोजपुरी बोले के पड़ल.

सुजीत कुमार जी 40 साल पहिले के गड़ल मुर्दा उखाड़े लागल रहीं. कुछ लोग एकरे के इतिहास कहेला. अइसहूं बूढ़-पुरनिया के पास अपने बइठीं आ तनि कुरेद दीं त ऊ दादा-आदम के जमाना के ऊखिया-बुखिया उधेड़े लागी. सन् ई. 1960 में हम फिल्म लाइन में अइलीं, बाकिर मुंबई हीरो बने थोड़े आइल रहीं, पढ़ाई करे आइल रहीं. बी.काम कइलीं. फेर सोसियालाजी में पोस्ट ग्रेजुएशन कइलीं. तबही किशोर कुमार के फिल्म ‘दूर गगन की छाँव’ में मौका मिलल. दू सौ रूपया तनख्वाह पर असिस्टेंट के काम करे लगनी. बाकिर ओह से हमार मन ना भरे. मन में त कवनो कलाकार बइठल रहे. देखे में सुन्दर-सुघर आ हृष्ट-पुष्ट रहबे कइलीं. किस्मत साथ देलस आ तिवारी जी के फिल्म ‘लागी नाही छूटे राम’ में बतौर हीरो हमरा के साइन कइल गइल.

साइनिंग एमांउट रहे ढ़ाई हजार रूपिया, बाकिर शूटिंग के कुछ दिन पहिले पता चलल कि ‘लागी नाहीं छूटे राम’ में हमरा जगह असीम कुमार के ले लीहल गइल. कारन पूछला पर पता चलल कि फिल्म के हिरोइन कुमकुम हमरा के रिजेक्ट क देली ह. हम बहुत दुखी भइलीं. मन में बहुत तकलीफ पहुंचल. एक बेर त मन कइलस कि ई लाइने छोड़ दीं. बाकिर ‘होइहें वोही जोई राम रूचि राखा’. ओही समय बच्चू भाई शाह (गुजराती) ‘बिदेशिया’ फिल्म में हमरा के हीरो के रूप में साइन कइलें. कहल जाला कि ‘दूध के जरल मट्ठा फूंक-फूक के पियेला. हम बच्चू भाई से कहलीं कि ना भाई ना हम फिल्म में काम ना करब. कहीं फिल्म के हिरोइन हमरा साथे काम करे से इंकार क दीहली तब? जबाब में तपाक से बच्चू भाई कहलें कि तब हम दोसरा हिरोइन के साइन क लेब. ओही समय कहीं से ‘बिदेशिया’ के हिरोइन ‘नाजो’ आ गइली. बात खुलल त ऊ कहली- “कलाकार के निर्माता आ निर्देशक के काम में हस्तक्षेप ना करे के चाहीं. हमरा अपोजिट में के बा, एह से हमरा का मतलब. अपने केहू के लीं, हमरा कवनो आपत्ति नइखे.

एह तरह से ‘बिदेशिया’ से हमरा फिल्मी कैरियर के शुरूआत भइल. ‘लागी नाहीं छूटे राम ‘ में हमार साइनिंग एमांउड रहे ढ़ाई हजार जबकि बिदेशिया में ओकरा ठीक दुगुना पांच हजार रूपया मिलल. फिल्म खूबे सफल भइल. ओकर हमरा लाभ मिलल. ठीक तीन महीना के भीतर हम आठ गो फिल्म साइन कइलीं. फेर त हर फिल्म में हमहीं हम रहीं. 1983 में अमिताभ बच्चन आ रेखा के लेके ‘पान खाए सइयां हमार’ बनवलीं. इहो फिल्म खूबे धूम मचवलस. विदेशन में न जाने केतना बेर एकर प्रदर्शन भइल. भोजपुरी के साथे-साथे हिन्दीयो में उतरलीं आ पूरा मन-मिजाज के साथे. आँखे, अराधना शुरूआती दौर के फिल्म रहे. ‘अराधना’ में राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में रहलन. उनका एक लाख रूपया मेहनताना मिलल रहे आ हमरा 75 हजार. फेर आगे के कहानी सबका मालूमे बा. हम लगभग हिन्दी-भोजपुरी के साढ़े तीन सौ फिल्म में काम कइलीं आ जब मुम्बई में आपन फ्लैट, गाड़ी, नीमन बैंके बैलेंस हो गइल त हिन्दी फिल्म-निर्माण के क्षेत्र में उतर गइलीं आ ऊ क्रम अभीयो जारी बा.

Sujeet Kumar With Manoj Bhawook
भोजपुरी के पहिला सुपरस्टार सुजीत कुमार जी के संगे मनोज भावुक. (File Photo)


“बाकिर खाली हिन्दी में, भोजपुरी में ना, अइसन काहें?” हम बीच में टोकनी.

सुजीत कुमार जी कस के सांस लिहनी. दू बेर हमरा के ऊपर-नीचे देखनी. फेर दू शब्द में बहुत बड़ बात कहि गइनी. “डकैत डिस्ट्रीब्यूटरों के चलते.”

“जी, हम कुछ समझली ना”

“आप नही समझ सकते, डिस्ट्रीब्यूटरों द्वारा प्रोड्यूसरों का खटिया खड़ा करने का फार्मूला. अगर डिस्ट्रीब्यूटर ईमानदार हो जाए और सही तरीके से काम करे तो भोजपुरी फिल्मों की स्थिति सुधर सकती है. मगर यह इतना आसान नहीं (थोड़ी चुप्पी के बाद ) अरे हमने तो भोजपुरी फिल्मों की स्थिति सुधारने के लिए बकायदे एक आन्दोलन खड़ा किया था, एक संस्था बनाई थी (भोजपुरी चलचित्र संघ) मगर कुछ भी नही हुआ. इन डिस्ट्रीब्यूटरों ने बड़ा अहित किया है भोजपुरी फिल्मों का.”

बोलत-बोलत सुजीत कुमार जी अचानक मौन हो गइनी. फेर आँख बन्द क लेनी कुछ सोचे लगनी.

“अपने राही मासूम रजा के ‘आधा गांव’ पढ़ले हईं?”

“जी”

“राही मासूम रजा (मेगा सीरियल महाभारत के संवाद लेखक) भोजपुरी के हिमायती रहलन. संगीतकार नौशाद हमरा से अक्सर भोजपुरी में बतियावस. एह लोग के मातृभाषा से प्रेम रहे. अमिताभ बच्चनो से हमार कई बेर बात भइल हव, उनको इहे कहनाम बा कि भोजपुरी में बोले बतियावे आ फिल्म बनावे में कवनो शिकाइत नइखे. ई त अच्छा बात बा. भोजपुरी में जे संगीत बा, लय बा, लोच बा, ऊ हिन्दी में कहां बा? पहिले के जतना गीत लिखात रहे सब पर कहीं ना कहीं भोजपुरी के प्रभाव रहे, बाकिर अब तनि जुग-जमाना बदल रहल बा. अब त हिन्दियो नइखे चलत. अंग्रेजी मिक्स हिन्दी त स्वाभाविक बा, ई भोजपुरी खातिर चुनौती बा." सुजीत कुमार जी फेर थोरिका देर खातिर चुप हो गइनी. अचनाक ‘महाभोजपुर’ पत्रिका पर नजर गइल. उठा के पन्ना उल्टे लगलीं.

“अपने भोजपुरी के बात हिन्दी में काहें नइखीं छापत? गध्य हिन्दी में छापीं, गीत-कविता भोजपुरी में. तब ज्यादा लोग पढ़ी. लोगे ना पढ़ी त पत्रिका छपववला से का फायदा? अइसन कुछ करीं कि भोजपुरी के बात ओहू लोग तक पहुँचो जेकरा भोजपुरी ना बुझाला. ई हमार सुझाव बा. दरअसल हिन्दी आ भोजपुरी के लिपि एकही बा.

हम कैथी के लेके टोकनी. भोजपुरी के लिपि कैथी ह. त उहाँ के कहनी कि लिखात कहाँ बा कैथी में.

आगे उहाँ के कहनी- शायद एही से भोजपुरी फिल्म के हमेशा कम क के आकंल गइल. देखीं आगे का होता. हम त बूढ़ा गइनी. नयकी पीढ़ी जोर-शोर से लागे त कुछ बात बन सकेला. भोजपुरी में त ताकत बड़ले बा, जरूरत बा ओकरा के समझे के, सही ढ़ग से फिल्मावे के आ सबसे ज्यादा जरूरत बा डिस्ट्रीब्यूटर लोग के ईमानदारीपूर्वक, सेवाभाव से आ भोजपुरी के उठावे बदे काम करे के. जइसे गाय हंकरेले त बछरू चाहे जहां रहे अपना महतारी के आवाज सुनि के ओने दउड़ जाला. ओइसहीं हम बानी. चाहे कहीं व्यस्त रहब बाकिर भोजपुरी खतिर आवाज उठावे के बात होई त हम उहाँ दउड़त पहुँच जाएब. आज जरूरत बा, भोजपुरी खातिर जोरदार आन्दोलन के, सशक्त संगठन के, जवना में ना खाली फिल्मकार आ साहित्यकार बलुक सभे भोजपुरिया मंत्री सब कोई मिलि के आवाज उठावे आ भोजपुरी के सही स्थान आ सम्मान दिलावे. हमार शुभकामना बा आ हम हमेशा सक्रिय सहयोग खातिर तइयार बानी.”

( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा के जानकार हैं. )
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