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Bhojpuri: पहिला आमचुनाव से ही शुरू हौ दल-बदल क खेला, पढ़ीं पूरी कहानी

Bhojpuri: पहिला आमचुनाव से ही शुरू हौ दल-बदल क खेला, पढ़ीं पूरी कहानी

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बरसात में जइसे मेघा इधर से उधर भागय-कूदय लगयलन, ओइसय चुनाव अउतय नेता लोग इधर से उधर कूदय-फांदय लगयलन. पांच राज्यन के विधानसभा चुनाव क घोषणा होतय नेतन के पाला बदलय क रफ्तार तेज होइ गइल हौ. हर रोज पाला बदलय वाली खबर मीडिया में छइले हौ. कब के कवने ओरी से कवने ओरी चलि जाय, ठेकाना नाहीं बा. लेकिन पाला बदल वाली इ कहानी आजू क नाहीं हौ. अजादी के बाद पहिला आम चुनाव से ही इ खेला शुरू हौ, जवन आज अपने चरम पर हौ.

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पुरानी कहावत हौ कि प्यार अउर युद्ध में कुल जायज होला. लेकिन आज राजनीति में कुछ भी नाजायज नाहीं रहि गयल हौ. राजनीति अब समाज सेवा क नीति नाहीं, बल्कि धंधा हौ. फायदा बदे कुल कायदा गउखा पर रखात हौ. धंधा में खाली फायदा देखल जाला. राजनीति क हर कउड़ी एही फायदा-नुकसान के सिद्धांत पर चलल जात हौ. नेतन के पाला बदलय क मूल मंत्र इहय हौ.

देश के अजादी 15 अगस्त, 1947 के मिलल रहल. लेकिन 26 जनवरी, 1950 के संविधान लागू भइल, अउर ओकरे बाद 25 अक्टूबर, 1951 से पहिला आम चुनाव शुरू भयल, अउर 21 फरवरी, 1952 तक संपन्न भयल. तबतक देश में सविधान सभा अउर संविद सरकार काम करत रहल. चुनाव में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी क बोलबाला रहल. लेकिन सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी अउर भारतीय जसंघ जइसन प्रमुख विपक्षी पार्टी भी मैदान में रहलिन. सोशलिस्ट पार्टी क गठन अजादी के बाद आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण अउर डॉ. राममनोहर लोहिया कइले रहलन. एकरे पहिले इ कुल नेता कांग्रेस में ही रहलन. नेतन क इ अलगाव विचारधारा के नाते भयल रहल. चुनाव में दूसरे पार्टी के नेता के तोड़ि के अपने में मिलाइब, ओह समय कल्पना से परे क बात रहल. लेकिन जब अइसन घटना घटल त सबकर होश उड़ि गयल.

सोशलिस्ट पार्टी मथुरा संसदीय सीट से चौधरी दिगंबर सिंह के आपन उम्मीदवार घोषित कइले रहल. डॉ. राममनोहर लोहिया क करीबी सहयोगी अर्जुन सिंह भदौरिया मथुरा जाइ के दिगंबर सिंह क नामांकन करइलन. दिगंबर सिंह क क्षेत्र में पकड़ रहल. ओनकरे उम्मीदवारी क खबर जब कांग्रेस खेमा में पहुंचल त उहां खलबली मचि गइल. दिल्ली में बइठक भइल अउर निर्णय लेहल गइल कि कवनों भी प्रकार से दिगंबर सिंह के चुनाव मैदान से या त हटावल जाय, नाहीं त कांग्रेस में मिलाइ के कांग्रेस क उम्मीदवार बनावल जाय. पूरे खेला क जिम्मेदारी चौधरी चरण सिंह के देहल गइल. चरण सिंह ओह समय कांग्रेस क बड़ नेता रहलन. जाट बिरादी में ओनकर धाक रहल. दिगंबर सिंह भी जाट रहलन. चरण सिंह मथुरा गइलन अउर दिगंबर सिंह के सोशलिस्ट पार्टी छोड़ि के कांग्रेस से चुनाव लड़य बदे राजी कइ लेहलन. दूसरे पार्टी के उम्मीदवार के नामांकन कइले के बाद अपने पार्टी में मिलावय क पहिला श्रेय चौधरी चरण सिंह के जाला. देश के राजनीति में दल-बदल क इ पहिली घटना रहल. दिगंबर सिंह हलांकि चुनाव हारि गइलन. निर्दलीय उम्मीदवार, भरतपुर स्टेट क राजा गिरराज शरण सिंह चुनाव जीति के मथुरा क पहिला सांसद बनलन.

चरण सिंह दल-बदल के अपने पहिलय प्रयोग में सफल भइलन त एह खेल क चौधरी बनि गइलन. अपने राजनीतिक जीवन में कुल 17 पार्टी बनइलन. चरण सिंह से शुरू भइल दल-बदल क इ कहानी समय के साथ बढ़त गइल. आज इ पूरी एक श्रृंखला बनि गइल हौ. चुनाव में, चुनाव से पहिले जे दूसरे पार्टी क जेतना अधिक नेता तोड़ि लेय, आज उ राजनीति क चाणक्य कहल जाला. जे चुनावी मौसम में हवा क रुख भापि के पाला बदलि लेय, उ मौसमविज्ञानी कहाला. दिवंगत रामविलास पासवान अबतक के राजनीति क सबसे बड़ा अउर घोषित मौसम विज्ञानी रहलन. अपने एही गुणे के नाते हमेशा सत्ता क स्वाद लेहलन. ओनकरे टक्कर क मौसमविज्ञानी भारतीय राजनीति में अबही तक दूसरे केव नाहीं भयल.

चुनाव से पहिले दल-बदल कवनो बड़ी समस्या नाहीं रहल. लेकिन चुनाव के बाद सांसदन अउर विधायकन के पाला बदलले से कई दइया सरकार संकट में आइ गइलिन. कई सरकार दलबदल के भेट चढ़ि गइलिन. 1060-70 के दशक में ’आया राम गया राम’ के राजनीति क जोर रहल. इ ’आया राम गया राम’ मुहावरा बनि गयल. एकर एक अलग कहानी हौ.

हरियाणा में 1967 में गया लाल हसनपुर सीट से निर्दलीय चुनाव जीति के विधानसभा पहुंचलन. ओकरे बाद उ 15 दिन में तीन पार्टी बदललन. चुनाव जीतले के तुरंत बाद कांग्रेस में शामिल होइ गइलन. फिर कांग्रेस से संयुक्त मोर्चा में चलि गइलन. ओकरे बाद वापस कांग्रेस में अइलन, अउर फिर ओही दिना वापस कांग्रेस में चलि गइलन. जब गया लाल संयुक्त मोर्चा से वापस कांग्रेस में अइलन त पार्टी क एक नेता कहलस कि ’’’गया राम राम अब आया राम’ हो गए हैं’’. एकरे बाद जब उ फिर संयुक्त मोर्चा में लउटि गइलन तब यशवंत राव चव्हाण कहलन कि ’’’आया राम, गया राम’ हो गया’’. एकरे बाद जब भी दल-बदल होय, ’आया राम गया राम’ क मुहावरा सबके जबान पर रहय. इ मुहावरा आज भी हर दल-बदल पर गूंजयला.

’आया राम, गया राम’ के बीमारी से बचय बदे 1985 में 52वां संविधान संशोधन कइ के दल-बदल विरोधी कानून बनावल गइल. ताकि चुनल गइल सरकार शांति से आपन कामकाज कइ सकय. कानून में प्रावधान कयल गयल कि अगर सांसद, विधायक आपन पार्टी छोड़ि के दूसरे पार्टी में जइहय त ओनकर सांसदी, विधायकी खतम होइ जाई. एकरे बदे चार अनुच्छेद (101, 102, 190, 191) में बदलाव कयल गयल. अनुच्छेद 102(2) अउर अनुच्छेद 191(2) दसवीं अनुसूची से जुड़ल हौ, जवने में सांसदन अउर विधायकन के राजनीतिक लाभ अउर पद के लालच में पाला बदलले पर अयोग्य ठहरावय क प्रावधान हौ. इ कानून बनले के बाद दल-बदल पर कुछ हद तक रोक त लगल. लेकिन नेता लोग सरकार गिरावय-बनावय क नया रस्ता निकालि लेहलन. कानून में प्रावधान हौ कि अगर कवनो पार्टी क एक-तिहाई सदस्य एक साथे अलग होइहय त ओहके पार्टी में टूट मानल जाई अउर सदस्यन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू न होई. एह प्रावधान क प्रयोग कई बार होइ चुकल हौ, अउर कई सरकार भेंट चढ़ि चुकल हइन. मध्यप्रदेश अउर कर्नाटक क उदाहरण जादा पुराना नाहीं हौ. अब एह तरह के दल-बदल पर भी रोक लगावय बदे कानून बनावय क मांग उठत हौ. राजनीति के थोड़ा साफ-सुथरा रखय बदे दल-बदल पर कारगर रोक वाकई में जरूरी हौ.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles, Bhojpuri News, UP Election 2022

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