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Bhojpuri: टॉपर के बधाई, माटी के प्रति जिम्मेदारियों पर बात होखे

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दुनिया कामयाबिए के पूजे ले..अइसना में बिहार के माटी के लाल शुभम के बड़ाई ना होखित तबे अचरज होइत. देस के सबसे कठिन इम्तिहान संघ लोक सेवा आयोग के सिविल सेवा परीक्षा में टॉप कइल मामूली बात नइखे. उनुकर बड़ाई होखहिं के चाहीं.

  • News18Hindi
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शुभम छठवां बिहारी बाड़े, जे टॉप कइले बा, एकरा पहिले बिहार के विकास आयुक्त आमिर सुभानी करीब बीस साल पहिले टॉप कइले रहले. ओइसे हर साल बिहार के प्रतिभाशाली लोग संघ लोक सेवा आयोग के इम्तिहान पास करेले आ आईएएस, आईपीएस, आईएफएस आ एलायड सर्विस में चुनात रहेले. एतने नइखे, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जइसन राज्यन के पीसीएस परीक्षा में भी बिहार के हर साल ढेरे लोग चुनल जाला आ अफसर बनेला. बिहार में प्रतियोगिता परीक्षा के कइसन क्रेज बा, एही से समझिं कि हर साल बैंकिंग आ दोसर सरकारी नौकरियन के परीक्षा में तमाम बिहारी लोग चुनल जात रहेला.

आजाद भारत के नौकरशाही के लेके महात्मा गांधी अफसर के बजाय लोकसेवक के कल्पना कइले रहले. उनुकर कहनाम रहे कि आजाद भारत में अफसरशाही ना होई, बल्कि ऊ लोक सेवा होई. एही वजहि से संविधान सभा लंबा बहसि के बाद लोक सेवा आ ओह खातिर चुने जाए वाला अफसरन खातिर लोक सेवा आयोग के व्यवस्था कइले रहलसि. जर्मनी के एगो बड़ राजनीति शास्त्री भइल बाड़े,
मैक्सबेबर. ऊ नौकरशाही के स्टील फ्रेम कहले बाड़े. लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक बॉस त पांच साल में आवत-जात रहेले, बाकिर नौकरशाही बनल रहेले. एही वजहि से ऊ कहले बाड़े कि ई स्टील फ्रेम नियर व्यवस्था के बरकरार रखेले.

ई स्टील फ्रेम अबहियों ओइसहीं मजबूत बा, जइसे अंगरेजी राज में रहे. गांधी जी के सपना आ सोच के मुताबिक ऊ काताना लोक सेवक बनि पावल बा, एह पर बहस हो सकेला. अपवाद हो सकेला, बाकिर सांच बात त ईहे बा कि अबहिंयो ब्यूरोक्रेसी अंगरेजी व्यवस्था नियर राजकाज करे वाली मानसिकते से ही प्रभावित बा, ओकरा अंदर लोकसेवा के भाव अपवादे स्वरूप बा.

अइसना में ई सवाल उठल स्वाभाविक बा कि साल दर साल बिहार से निकले वाली नौकरशाही वाली प्रतिभा बिहार के जमीनी स्तर पर बदले में काताना भूमिका निभावत बिया.

2001 में गुजरात में भयानक सूखा परल रहे. कच्छ में सूखा के रिपोर्टिंग खातिर हमहूं गइल रहनीं. ओह घरी पता चलल कि बंबई आ विदेस में रहे वाला कच्छी समाज के लोग आपना गांव-गिरांव, आपन माटी खातिर काताना मेहनति करता लोग. बंबई में ऑटोमोबाइल के कारोबार पर कच्छ के मूल निवासी लोगन के कब्जा बा. उहवां ऊ लोग कच्छी कहाला. कच्छी समाज के लोग आपाना-आपाना इलाका के मददि खातिर असोसिएशन बनवले बा. सूखा के बेरि हर असोसिएशन के जिम्मेदार लोग बारी-बारी से कच्छ आवत रहे.

आपाना-आपाना गांव में जोहड़-पोखरा या त खोनवावत रहे या पुरान पोखरा के गहिर करवावत रहे. गांव के गरीबन-लाचारन के गाइ-गोरू खातिर घासि-भूसा के इंतजाम करत रहे आ लोगन खातिर भोजन-पानी आ दावा-दारू के. ऊ लोग आपाना संगे बंबई से डाक्टरो ले के आवत रहे. जे ढेर बेमार रहे, जेकर उहवां इलाज ना हो पावत रहे,ओकरा आपाना संस्था के क्षमता मुताबिक ट्रेन भा जहाज से बंबई ले के जात रहे.

जब-जब बिहार के आइएएस अफसरन के चर्चा होला, ऊहन लोगन के सफलता के कहानी सामने आवेला, हमारा कच्छ के ई वाकया बहुते यादि आवेला. हामारा लागेला कि बिहार के हालति बदले में ई लोगन काताना योगदान देले बा.

हर आदमी के आपना माटियो के प्रति कुछु जिम्मेदारी होला. ओकरा आपना माटियो के करज उतारे के चाहीं. सवाल ई बा कि हर साल बिहार के माटी से निकले वाला लोग आपाना ओह लोगन के भलाई के काताना कदम उठवले बा, जे उनुका कामयाबी पर साल-दर-साल लहालोट होत रहेला.
अफसोस ई बात बा कि एह सवाल के जवाब निराशाजनक बा.

चाहे बिहार के रहवासी होखसु भा कवनो आउर इलाका के, अफसर बने वाला लोगन के संघ लोकसेवा आयोग के इंटरव्यू बोर्ड के सामने एगो सवाल के साल-दर-साल जवाब एकही बा. ऊ लोग सिविल सेवा में आवे खातिर एकही जवाब देला कि ऊ लोग सिविल सेवा के ताकति से समाज में बदलाव ले आवल चाहतारे.

शायद समाजे के दोष बा कि ऊ बदलले नइखे चाहत, ना त अब तक ले काताना अफसर बनले लोग, ऊ लोग समाज के बदलल चाहत होइहें, ई समाजे के कमी बा कि ऊ बदलल नइखे चाहत.

जइसे हर बार सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेबे वाला सुंदरी लोग मदर टेरेसा बनल आपना जिनिगी के मकसद बतावेला, ओइसहीं सिविल सेवा के प्रतिभागी लोगन के ई जवाब रूढ़ हो गइल बा.

अफसर लोग लोकसेवक कातान बनि पवले बा, ई छुपल नइखे. एगो कहाउत जनता के बीचे बहुते लोकप्रिय बा कि…देश में पीएम के, प्रदेश में सीएम के आ जिला में डीएम के चलेला. सवाल ई बा कि आपाना चलाउर से डीएम यानी अफसर लोग काताना बदलाव ले आइल बा.

बिहार के आजुओ हालति ई बा कि विकास सूचकांक में ऊ काफी पीछे बा.बाहरी एजेंसी के बात अलग बा, आपाना नीति आयोग के ही सूचकांक में बिहार अबहियों काफी पिछड़ल बा.

एह पिछड़ापन खातिर राजनीति पर सवाल उठे के चाहीं. उठबो करेला. बाकिर ई सवाल बा कि राजनीति के बाद सबसे मजबूत आ स्टील फ्रेम मानल जाए वाला नौकरशाही के का योगदान बा. एहू पर अब चरचा होखे के चाहीं, खाली सफलता के कहानी पर लहालोटे ना होखे के चाहीं..

(उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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