Bhojpuri Spl: 'पांडे जी का बेटा... अहिरान के गोरी', सही नइखे भोजपुरी गाना में जातिसूचक शब्द के प्रयोग

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आपन भोजपुरी समाज (Bhojpuri Society) त अइसन कबो ना रहे. इहाँ त हँसी-मजाक करे वाला देवर भउजाई के गोड़ प अबीर लगा के आसिरबाद लेला. महतारी के दर्जा देला. गाँव में कवनो जाति के स्त्री बेटी-पतोह, बहिन-फुआ, भउजी-चाची-ईया होली.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 3, 2021, 12:15 PM IST
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जब समाज तरक्की करेला तs ओकरा हर चीज में बदलाव होला, लोग के रहन-सहन, विचार-व्यवहार, आहार भी बदलेला. सिनेमा आ संगीतो त समाजे से जुड़ल बा. एही से हमनी के एहू में बदलाव के आशा करेनी. ओसही भोजपुरिया समाज कहाँ से कहाँ पहुँच गइल, देश दुनिया में झण्डा गाड़ देलस, गाँव-बधार के रंग-रूप बदल गइल बाकिर एकर संगीत आ सिनेमा में कवनो विशेष बदलाव ना भइल; लोकेशन, टेक्नोलॉजी के छोड़ के. अभियो भोजपुरी सिनेमा के कंटेन्ट 40 साल पीछही चलsता आ गीत-संगीत के कंटेन्ट त पता ना कौना दुनिया में चलsता.

जब हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, मराठी आदि भाषा के गीत-संगीत के फ़िलॉसफ़ी, अलंकार, रूपक में नया-नया प्रयोग होता, भोजपुरी आपन ह्रास के तरफ बढ़ रहल बा. ई नइखे कहल जा सकत कि भोजपुरी में बदलाव नइखे होत; होता, लेकिन निरर्थक. जवना के कवनो माने मतलब नइखे निकल सकत. भोजपुरी सिनेमा के गीतकार आ संगीतकार लोग बेडरूम से बाहर निकलिये नइखे पावत. चोली, लहंगा, नाभि, शारीरिक उभार के आस पास ही एह लोग कल्पना गोता खाता. कुछ आउर सोच सकेला लोग, अइसन बुझाते नइखे. कई बार अइसन लागेला कि भोजपुरी के ई सब तथाकथित सुपरहिट गाना लिखे वाला लोग के दिमाग, का हरदम यौनेच्छा से कुत्सित रहेला, जे ओकरा आगे कलमे ना बढेला?

कुछ साल से एगो अउरी प्रयोग होता, भोजपुरी गाना में हिन्दी शब्दन के खिचड़ी बनावे के. अधिकतर गाना में शुरुआत त भोजपुरी के शब्द से होता लेकिन बोल के अंतिम में हिन्दी सहायक क्रिया के इस्तेमाल कर दिहल जाता. गनवे अधभेसर हो जाता. बात प्रयोग के होता त भोजपुरिया कलाकार आ गीतकार लोग के ई प्रयोग कइसे छूट सकेला जवना में जाति सूचक गाना के बाढ़ आइल आ ओकरा चलते केसो फ़उदारी भइल. 2018 में रितेश पांडे के गाना आइल पांडे जी का बेटा हूँ चुम्मा चिपक के लेता हूँ. फेर ई गाना फिल्म में चिंटू पांडे पर फिल्मावल गइल. फिल्म के बड़ा चर्चा भइल, लोग बड़ा चाव से सुनल. तुरंते ओकर जवाब में एगो गायक अजय लाल यादव सागर गाना गवलस, पांडे जी की बेटी हूँ चुम्मा चिपक कर देती हूँ. एह पर कुछ लोग के एतना खराब लागल कि ओह गायक के कोर्ट ले जाए के पड़ल आ जुर्मानो भरे के पड़ल. कहे के माने बेटा पर जवन लोग आनंद उठावल, बेटी पर ऊ लोग नाराज हो गइल.

एकरा पहिलहूँ जातिसूचक गाना के इतिहास रहल बा जइसे जादो जी बोली कहवाँ ले जाइब, बिना पियले तिवारी जी के नासा भइल बा. बाकिर पांडे जी वाला गाना एगो बड़हन बदलाव के शुरुआत भर रहे. ओकरा बाद त गीतकार आ म्यूजिक डायरेक्टर लोग के प्रतिभा के जवन गटर खुलल ओह में अहिरान, बाबुआन, ठकुरान, पंडित, कुशवाहा सभे बजबजा गइल. गायक लोग में अइसन गीत के लेके होड़ लाग गइल. गायक लोग अपना-अपना जाति के झण्डा ढोअल चालू कर दिहल लोग. बीच में तनी विराम आइल ह कोरोना के चलते तs गीतकार-गायक लोग के रचनात्मकता कोरोना के चोली आ लहंगा में घुसावे तक पहुँच गइल ह. केहू लॉकडाउन में लूडो खेलल ह त केहू के मउगी पबजी खेल के मर्द से सब्जी कटववली ह. केहू सेनीटाइजर लगा के चुम्मा लेत रहल ह तs केहू के बुझाइल ह कि लॉकडाउने में ओकर जवानी बीत जाई. फेर लॉकडाउन खुलते उ सभ तथाकथित भोजपुरिया गायक, गीतकार, संगीतकार छुटहा भइंसा लेखां भोजपुरी के इज्जत चरे निकल गइल ह लोग.
एक जाना बीर बहादुर गायक गवलें हं कि नजरी मिलाव बबुआन से, भोरे नमरी ले जइहे तू बान्ह के. फेर गाना आइल ह कि ‘बबुआन इधर है’ आ गाना में कहन केतना दूरदर्शी बा कि भूला जइबू गली अहिरान के गोरी, मजा जब पइबू बाबुआन से गोरी’. बाबुआन गाना में आपन हक जमावते रहले हं तले अहिरान भी काहें पीछे रहिहें. एने से एगो बाबू साहब सुपरस्टार आपन हक हिस्सा फरिअवले हं तले दोसरा ओरी से अहिरान के सुपरस्टार कबजिया लेहले हं. ऊ तs सभ जाति के स्टार, सुपरस्टार, मेगास्टार लोग के हक मारे आ गइले हं. उनके गाना के बोल त माने का कहेम, सोना में मढ़वावे वाला बा. यथा, चौबे जी चौबीस घंटा करsतारे पीछा, पांडे जी चुम्मा के माँगत बाड़ें भीच्छा, जियल जुलुम कइलें बाबू साहब जान के, दाल गले नाहीं देहब बाबुआन के, तू जान हऊ अहिरान के.

मिला जुला के बात ई बा कि कमजोर के मेहरारू आ गाँव भर के भउजी. भोजपुरी के गायक, गीतकार लोग के सब हक-जायदाद लइकिए में समाइल बा, आ ओकरा खातिर उ लोग अपना जातिगत धौंस के भी इस्तेमाल कर रहल बा लोग. समाज के एक बड़ वर्ग जातिगत व्यवस्था के नकारे के प्रयास कर रहल बा आ ई पॉपुलर माध्यम के लोग ओकरा के गीत-गवनई में ढाल के बढ़ा रहल बा. सभे जानत बा कि गीत-संगीत के समाज पर केतना असर पड़ेला आ एह डिजिटल समय में त अउरी जब लइका-सेयान-बूढ़ सभे इंटरनेट पर रायता के जइसन फइलल ई सब कूड़ा के उपभोग क सकेला.

आपन भोजपुरी समाज त अइसन कबो ना रहे. इहाँ त हँसी-मजाक करे वाला देवर भउजाई के गोड़ प अबीर लगा के आसिरबाद लेला. महतारी के दर्जा देला. गाँव में कवनो जाति के स्त्री बेटी-पतोह, बहिन-फुआ, भउजी-चाची-ईया होली. ई का गावsतारs सन ए चनेसर ? का समाज में स्त्री के इज्जत अतने ले बा कि लोग ओकरा पर आपन हक जमावे, ओके आपन काश्तकारी जमीन बूझे, ओकरा के ऑबजेकटिफ़ाई करे. का अइसन गीत लिखे, बनावे आ गावे वाला के आपन माई, बहिन, बेटी नइखे? का उ दोसरा के बेटी-बहिन खातिर गावsता आ दोसर ओकरा बेटी-बहिन खातिर गावsता. आ एह आपस के रार में स्त्री के इज्जत तार-तार होता. स्त्री के सामान बुझे वाला सिनेमा आखिर समाज के कहाँ ले जाता ???



23 साल पहिले लिखल आपन एगो कविता इहाँ उधृत कइल जरुरी समझत बानी. कविता के शीर्षक बा – संस्कृति. तब भोजपुरी अल्बम के दौर रहे आ अइसने कुल्हि गीत बनत रहे. उहे लोग नू उठ के आइल सिनेमा में. ओह गीतन से हमार मन खिन्न हो गइल आ आक्रोश में कविता ई कविता फूटल –

एक ओर

कुकुरमुत्ता नियर फइलल

भकचोन्हर गीतकारन के बिआइल

कैसेटन में

लंगटे होके नाचत बिया

भोजपुरिया संस्कृति.

(……जइसे ऊ कवनो

कोठावाली के बेटी होखे…

भा कवनो मजबूर लइकी के

गटर में फेंकल

नाजायज औलाद होखे.)

दोसरा ओर,

लोकरागिनी के किताब में कैद भइल

भोजपुरिया संस्कृति के दुलहिन के

चाटत बा दीमक

सूंघत बा तेलचट्टा

आ काटत बा मूस.

एह दूनू का बीचे

भोजपुरी के भ्रम में

हिन्दी के सड़ल-खिचड़ी चीखत

आ भोजपुरिये के जरल भात खात

मोंछ पर ताव देत

‘मस्त-मस्त ‘ करत

ठाढ़ बा, भोजपुरिया जवान !!!

( लेखक मनोज भावुक भोजपुरी सिनेमा के जानकार हैं. )

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