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Bhojpuri: गांव से गायब हो गइल गांव! बदले लागल बोली अउर ओढ़ाव-पहिराव

समय के बदलाव का संगे भाषा-बोली, पहिराव-ओढ़ाव, गीत-गवनई माने संस्कार-संस्कृति सब कुछ बदल रहल बा. गीत-कहाउत परतोख सब कुछ बदल गइल बा. सोझ कहल जाव त गांव से अब गांव गायब हो गइल बा.

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बदलाव के आन्हीं एतना सजोर बा कि देखत-देखत कई गो अइसन शब्द बिला गइले सन, जवना के भोजपुरिया बोतचाल में खूब चलन रहल हा. ओह शब्दन से बनल मुहाबरा होखे भा गीत, ओकरा के समझे खातिर अब नवका पीढ़ी के लोग के केहू पुरनिया ना समझावे त ऊ बूझिए ना पाई. बोलचाल में एह शब्दन के चलन से गायब होखते कई गो मुहाबरा आ गीतन के अब कवनो मोल नइखे रह गइल.

चवनिया मुसकी, चले के लूर ना अंगनवे टेढ़, ना नौ मन तेल होई आ ना राधा नचिहें जइसन मुहाबरा के अब कौनो मोल रह गइल बा का? अब ना चवन्नी रह गइल आ ना आंगन आ जोख के पैमाना मन. गीत-गवनई आ कहाउत से आंगन त साफे बिला गइल. शहरी अंदाज में बने वाला मकान में आंगन के कवनो गुंजाइशे नइखे रहता.

आंगने ना, अइसन ढेरे शब्द समय के होत बदलाव आ नवका रहन-सहन के संगे ओरा-बिला गइले सन. फ्लैट कल्चर में अब केहू ई गावे कि- गाई के गोबरे महादेव, अंगना लिपाय- त सुने वाला के ना लीपल शब्द बुझाई आ ना आंगन. अइसहीं एगो सोहर में बहिन के बेटा भइला पर मामा के बारे में एगो लाइन बा- एक गोड़ धरले दोगहवा, दोसर गोड़ धरले दुअरिया, तीसर गोड़ धइले अंगनवां हो. अब नवका जमाना में ना दोगहा रह गइल, ना आंगन. अइसन शब्द, जवन भाषिक फेर-बदल के संगे करीब-करीब हर ग्रामीण अंचल, खासकर भोजपुरी पट्टी में आम बोलचाल में प्रचलन में रहले सन, ओकनी के तरक्की के सुरसा समय के संगे लीलत गइल. अब ई शब्द लोग के जेहन से गायब हो गइले सन.

पुरनका सगरी शब्द आहिस्ता-आहिस्ता बिसुरल जा तारे सन. आंगन जइसन शब्द अब सपना बा. जवना आंगन के लेके- नाच ना जाने आंगन टेढ़- जइसन भोजपुरी के मुहावरा बनल, ऊ आंगन अब कहां भेंटाता. कबीर दास भी कहले रहले- निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय. जब आंगन रहबे ना कइल त ओह गीत-कवित्त आ शेर-ओ-शायरी के अब कवनो उपयोग भा मतलबे ना रह गइल. कउड़ी भले मुहाबरा भा लोकोक्ति में कबो-कबो जुबान पर आ जाला- कउड़ी के तीन, कउड़ी के मोल- बाकिर अब ना कउड़ी रहल आ ना ओ मुहाबरा के कवनो अब मोल रह गइल.

तरक्की के तरकश से निकलल तीर सबसे बेसी गंवई जीवन के भाषिक संस्कार के नुकसान पहुंचवले बा. पहिले गाय-गोरू हर घर के शोभा रहे. भोजन के रूप में दूध-दही आ अनाज खातिर खेती-बारी के ई जरूरी साधन रहे. अब घरे-घरे दूध-दही त आवता, बाकिर डेयरी से. एह से पशुपालन के संस्कारे करीब-करीब खतम हो गइल बा. जाहिर बात बा कि एकरा संगे-संगे जवन शब्द पशुपालन से जुड़ल रहले सन, ओकर अब कहीं जिकिर नइखे होखत. अब एह मुहाबरा के कवनो मोल बा- आगे नाथ ना पीछे पगहा? सांच कहीं त बदलाव के बेयार एतना सजोर बा कि गांव आ शहर में फरक ना रह गइल. चार-पांच दशक पहिले जवन गांव रहे, अब ओकरा के ओही गांव में ढेबरी ले के खोजन जाव त ना मिली. अब केहू से पैना, पगहा, पेन्हाइल, गाभिन, बिसुकल, सोकन, धवर, गोला जइसन भोजपुरी शब्दन के माने पूछ दिहल जाव त ऊ पूछे वाला के पागल समझ ली. नाद, खूंटा, सानी, खूर, नाथ, छान के माने खांटी भोजपुरिया माटी के लोगन के भी समझे-बतावे में पसेना छूट जाई. सांच कहल जाव त बदलाव के बयार भोजपुरी संस्कृति के वध क दिहले बा.

भोजपुरी के ऊ शब्द कहां चल गइले सन, जवन जीवन, रहन-सहन, समाज, खेती-बारी, तीज-तेवहार भा जीवन के हर क्षेत्र में इस्तेमाल होत रहे. खेती-बारी में पहिले इस्तेमाल होखे वाला कुछ शब्दन के देखल जाव त ओकर अब ना वजूद बा आ ना जरूरत रह गइल बा. एह से कि गंवई जीवन से ओह संस्कार के अब विदाई हो गइल बा. इनार, बरही, ढेंकुल, कूंड़, रहट, चवना, हाथा जइसन शब्द पटवन के काम में इस्तेमाल होत रहे. पटवन के पारंपरिक तरीका बदल गइल त एकरा खातिर इस्तेमाल होखे वाला शब्द इतिहास बन गइले सन. पटवन में अब ट्यूबवेल, पंप सेट, छिड़काव (स्पिरिंकल सिस्टम) जइसन नया तरीका इस्तेमाल होखे लागल बा.

एही तरे खेती वाली जमीन आ ओकरा से जुड़ल कुछ शब्द देखल जाव त नवका पीढ़ी के बुझाई कि ई कवना चीज के नाम ह. जइसे- परती, ऊसर, चंवर, कूर, गोंयड़, पलिहर, कोड़ार जइसन शब्द खेत-माटी के हाल बतावे खातिर इस्तेमाल होत रहे. अब केतना लोग एकर माने समझ पाई. भोजपुरी पट्टी के नवकी पीढ़ी खातिर ई कवनो देश के अजूबा शब्द अइसन लागी.

खेती-बारी करे वाला लोग परंपरागत ढंग से जवन फसल पहिले पैदा करत रहे, ऊ फसल भी आज दुर्लभ जिनिस हो गइल बा. ओइसे आज के लाइफ स्टाइल में एकर जरूरत बेसी बा आ कहीं-कहीं एकर खेती भी होता. भदेया, अगहनी, साठी, कुअरहा, बैसखुआ, सांवा, कोदो, चीना, मड़ुआ, मार्हा, बजड़़ा, बलटांगुन, टंगुनी, कोन, सुथनी जइसन शब्द अनाज आ खेत से उपजे-पैदा होखे वाला फसल के नाम रहे. मौसम के हिसाब से फसल के वैरायटी रहे. साठ दिन में होखे वाला धान के साठी कहल जाव, त अगहन में होखे वाला धान के नाम अगहनी रहे. कुआर आ बैसाख में होखे वाला मकई के फसल खातिर कुअरहा आ बैसखुआ शब्द के प्रयोग होखे. बेसी पैदावार खातिर नया-नया वैरायटी आ गइली सन आ साठी-अगहनी ओरा गइल. सांवा, कोदो, चीना, टंगुनी, मड़ुआ आ बलटांगुन के त अब खेतिये केहू नइखे करत.

खेती-बारी से जुड़ल कुछ अउरी शब्द देखीं- हर (हल), फार, जुआठ, परिहत, हेंगा-हेंगी, जोतल, हेंगावल, कोड़ल, खोनल, चेंखुरल, मोथा, दूब. कहां बिसुर गइले सन ई कुल शब्द. पुरनकी पीढ़ी ई देखले रहे भा ए काम में अपना के नधले राखे. मशीन के जुग में ई कुल के ना जरूरत बा आ ना एकरा से जुड़ल शब्दन के कवनो माने-मतलब रह गइल बा. केतना तेजी से अपना माटी के ई मूल शब्द हेराइल-बिलाइल जा तारे सन.

अब तनी सामाजिकता से जुड़ल कुछ शब्द पर हमनी विचार करीं. सामाजिक आचार-बेवहार के बात क लिहल जाव. बियाह (विवाह) में कोहबर, जनवासा, बरच्छा, तिलक होत रहे. बीच के सगरी रसम खत्म हो गइल. अब सीधे वियाह लोग बूझत बा. पाहुन, कनिया, बहुरिया, आजी-इया जइसन शब्द हर घर में बोलल जाव. बियाह त विवाह के अपभ्रंश बा, एह से ई बुझाइयो जाई, बाकिर केतना लोग लोग कोहबर आ जनवासा के बारे में समझा-बता सकेला कि ई कब होला आ एइमें कवन विधि पूरा कइल जाला. समय के कमी त बरच्छा आ तिलक के परंपरा ही खतम क दिहलस. कनिया केतना लोग बूझी. गांव-जवार में कवनो नया पतोह आवअ सन त ओकनी के कनिया कहल जाव. जब ले घर में कवनो नया कनिया ना आवे भा एकर संभावना खतम हो जाव त बुढ़ियो लोग के कनिया ही कह के लोग बोलावे.

गांव में बेसी घर फूस आ खपड़ा-नरिया के बनत रहे. ओमे जवन सामान इस्तेमाल होखे, ऊ पक्का मकान के दौर में खत्म हो गइल. अब केहू से ईहे पूछल जाव कि मड़ई, पलानी, बथानी, बघार, दुआर, दोगहा, चुहानी, दलान, धरन, बड़ेरी, दियरखा, छानी, निकसार, पैसार, लरही कवना चीज के नाम ह आ एकर कवन उपयोग होला, त केहू जल्दी ना बता पाई.

भोजपुरी के सब्दन में जवन संप्रेषणीयता के ताकत (एक्सप्रेशन पावर) बा, ऊ शायद दुनिया के कवनो भाषा में नइखे. जइसे हिन्दी में केहू के कहल जाव- दरवाजा बंद कर दो. भोजपुरी में केतना सांकेतिक आ मीठ अंदाज में एकरा के कहल जाई- केंवड़िया ओठंगा द. बारिश खातिर अंग्रेजी में एके गो शब्द बा- रेन, बाकिर भोजपुरी में बारिश के प्रकृति के मुताबिक कई गो शब्द बाड़ी सन- बरखा, बूनी, झींसी, कनारा. भोजपुरी में सार आ बहनोई कहला पर साफ-साफ बुझा जाई कि सार माने मेहरारू के भाई आ बहनोई माने बहिन के दुलहा. अंगरेजी में दूनू खातिर एके गो शब्द बा- ब्रदर इन ला.

दोसर भाषा के शब्द खा-पचा लिहलस भोजपुरी

भोजपुरी के ई खासियत रहल बा कि अरुआ-बसिया सब के खा-पचा लेला. एइमे अंगरेजी के नीयर शब्द से नियरे बनल बा, हिन्दी के प्राचीर शब्द से- पाचिल. प्रहर से पहर बनल बा त बांग्ला के माझ से माझिल, नेपाली नून के त सोगहग भोजपुरी अपना लिहले बिया. फारसी के फज्र शब्द के भोजपुरी फजीर बना लिहलस. भिनसार में मुगल लोग के भोजन- सेहरी के भोजपुरिया लोग सरगही बना लिहल. (ओमप्रकाश अश्क वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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