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Bhojpuri- पुण्यतिथि विशेष: काशी से मिलल सीख दुनिया भर में फइलइलन विवेकानंद

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काशी आदि काल से संतन, संन्यासिन, विद्वानन क प्रिय नगरी रहल हौ. इहां आइ के सबकर आत्मिक, अध्यात्मिक विकास भयल, सबके कुछ न कुछ मिलल. स्वामी विवेकानंद भी एही में शामिल हयन. जीवन, जीवन सीख, जीवन विस्तार, जीवन अधार, जीवन संघर्ष अउर अंत में मृत्यु क संकेत भी ओन्हय काशी में ही मिलल रहल. काशी से मिलल सीख ओनकरे जीवन क संदेश बनि गयल, जवने के उ पूरी दुनिया में फइलइलन.

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विवेकानंद क जनम 12 जनवरी, 1863 के कलकत्ता में भयल रहल. लेकिन ओनकरे जनम क कहानी बाबा क नगरी काशी से जुड़ल हौ. बाबू विश्वनाथ दत्त अउर माई भुवनेश्वरी देवी के औलाद त रहलिन, लेकिन लड़िका नाहीं रहलन. लड़िका बदे तमाम मान-मनौती चलत रहल. एक दिना सपने में शंकर भगवान क दर्शन भयल. दूनों पति-पत्नी बाबा विश्वनाथ क दर्शन करय काशी चलि देहलन. भुवनेश्वरी देवी क कवनो महिला रिश्तेदार काशी में रहत रहल. ओनही के सलाह पर उ सिंधिया घाट पर संकठा माई के मंदिर के पीछे कात्यायनी मंदिर में स्थापित आत्मवीरेश्वर महादेव क दर्शन-पूजन अउर रूद्राभिषेक कइलिन. मान्यता हौ कि इहां दर्शन-पूजन कइले से पुत्र-रत्न क प्राप्ति होइ जाला. आत्मवीरेश्वर महादेव के विश्वनाथ मंदिर से भी पुराना बतावल जाला. मान्यता हौ कि इहां बाबा विश्वनाथ क आत्मा वास करयला.

विश्वनाथ दत्त अउर भुवनेश्वरी देवी काशी तीर्थ से जब वापस कलकत्ता पहुंचलन त विवेकानंद माई के गर्भ में आइ गयल रहलन. आत्मवीरेश्वर महादेव के आशीर्वाद से लड़िका क जनम भयल त नाव भी वीरेश्वर ही रखायल. माई दुलार में वीरे कहि के बोलावय. स्कूली में नाव लिखावय क बारी आयल त रजिस्टर में नरेंद्रनाथ दर्ज करावल गयल. रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में अइलन तब संन्यासी विवेकानंद बनि गइलन.

स्वामी विवेकानंद अपने जनम के बाद पहिली बार माई-बाबू के साथे मूड़न करावय काशी आयल रहलन. आत्मवीरेश्वर महादेव के अंगना में मूड़न भयल, फिर माई-बाबू के साथे वापस कलकत्ता लउटि गइलन. रामकृष्ण परमहंस के मरले के बाद ओनकर स्वतंत्र यात्रा शुरू भइल. विवेकानंद बोधगया होत क 1887 के आसपास पहिली बार संन्यासी के रूप में काशी पहुंचलन. स्वामी द्वारकादास के आश्रम में एक हप्ता रुकल रहलन. एही दौरान एक दिना दुर्गा माई क दर्शन कइ के भदैनी (भद्र वन) होत लउटत रहलन. रस्ते में बनरन क झुंड दउड़ाइ लेहलस. विवेकानंद भागय लगलन. एही बीचे कवनो संन्यासी पीछे से अवाज देहलस -’’भागो मत, दुष्टों का सामना करो.’’ काशी में विवेकानंद के पहिली सीख मिलल. इहय ओनकरे जीवन क अधार बनि गयल. घटना क जिक्र उ न्यूयॉर्क में भाषण के दौरान कइले रहलन. विवेकानंद कहलन -’’इस घटना से मैंने निष्कर्ष निकाला कि जीवन है तो समस्याएं भी रहेंगी. लेकिन जीवन से भाग कर उनका समाधान नहीं निकाला जा सकता. उसका एक ही उपाय है कि उनका मुकाबला किया जाए.’’ विवेकानंद आपन इ संदेश पूरी दुनिया के देहलन. पहिली काशी यात्रा के दौरान ही एक दिना सिंधिया घाटे पर बाबू प्रमदादास मित्रा से अचानक भेंट होइ गइल. दूनों अइसन मिललन जइसे पुराना मित्र होयं. प्रमदादास बड़ा विद्वान रहलन. संस्कृत कॉलेज में अध्यापक. प्रमदादास गीता क अंग्रेजी में अनुवाद कइले रहलन. मैक्समूलर अनुवाद क प्रशंसा कइले रहल.

विवेकानंद दूसरी दइयां 1889 में काशी अइलन. पिचाश मोचन पर प्रमदादास के घरे ही ठहरलन. एक दिना गंगा किनारे रमटी रमाइ के बइठल रहलन, अउर शिकागो विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेवय क निर्णय लेइ लेहलन. उ प्रतिज्ञा कइलन -’’’शरीर वा पातयामि, मंत्र वा साधयामि’. यानी कि आदर्श क उपलब्धि करब, नाहीं त देही क ही नाश कइ देब. स्वामी विवेकानंद कुल पांच दइयां काशी अइलन. एक दइयां उ औरंगाबाद में सोनिया रोड पर अपने शिष्या माई बसुमति के इहां ठहरल रहलन. जवने पलंग पर विवेकानंद अराम कइले रहलन, उ आज भी सुरक्षित रखल हौ. ओकर रोज पूजा-आरती कयल जाला.

अंतिम दइयां उ 1902 में काशी अइलन. ओनकरे साथे जापानी चित्रकार ओकाकुरा, स्वामी निर्भयानंद, कुमारी मैकलाउड, अउर दुइ ठे सेवादार नरेश अउर नेड़ा भी रहलन. विवेकानंद अर्दली बजार में कालीकृष्ण ठाकुर के गोपाल लाल विला में ठहरल रहलन. इ विला आज खंडहर होइ गयल हौ. विवेकानंद बीमार रहलन, अउर काशी में लगभग एक महीना रुकल रहलन. एही ठिअन उ अपने बनारसी चेला चारु चंद्र दास के साथे बातचीत के दौरान अपने मृत्यु के बारे में बतइले रहलन. यानी विवेकानंद के अपने मृत्यु क पूर्वाभास काशी में होइ गयल रहल. उ कहले रहलन -’’ब्रह्म सूत्र का स्वयं अध्ययन करो और मूर्खतापूर्ण बातों से प्रभावित ना हो. काशी में अच्छा हूं और इसी तरह मेरा स्वास्थ्य सुधरता जाएगा तो मुझे बड़ा लाभ होगा. बौद्ध धर्म के विषय में मेरे विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है. इन विचारों को निश्चित रूप देने के लिए कदाचित मैं जीवित न रहूं, परंतु उसकी कार्यप्रणाली का संकेत छोड़ जाऊंगा. तुम्हें और तुम्हारे भातृगणों को उस पर काम करना होगा.’’ चारु ही बाद में स्वामी शुभानंद भइलन. इहां से विवेकानंद अपने चेलन, मित्रन, परिचितन के कुल सात चिट्ठी लिखलन. विवेकानंद क स्वास्थ्य लगातार बिगड़त रहल. उ काशी से बेलूर मठ चलि गइलन. चार जुलाई, 1902 के ओही ठिअन महासमाधि लेइ लेहलन. ओह समय ओनकर उमर मात्र 39 साल पांच महीना, 24 दिन रहल.

जवने दिना विवेकानंद महासमाधि लेहलन, ओही दिना काशी में ओनकर अंतिम सपना पूरा भयल. स्वामी शिवानंद के हाथे रामकृष्ण अद्वैत आश्रम क स्थापना भइल. आश्रम में वृद्ध संन्यासी लोग निवास करयलन. इ स्वामी विवेकानंद के जीवन क अंतिम संस्था हौ. एकरे अलावा काशी में मौजूद ’सेवाश्रम’ रामकृष्ण मिशन क सबसे पुराना पहिला अस्पताल हौ, जवने बदे विवेकानंद खुद अपील लिखले रहलन. काशी विवेकानंद के बहुत प्रिय रहल. काशी से ओनकर जुड़ाव जनम से लेइ के मृत्यु तक बनल रहल.

(सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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