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Bhojpuri: पारंपरिक लतरि के ओरि लवटल समय के जरूरत, पढ़ीं आखिर काहें...

जइसे-जइसे उदारीकरण बरियार होत चलि गइल, सहर के छोड़िं, गांवों एह परपंरा के भूलात चलि गइल. सबकुछ बाजारे से खरीदे के अइसन चलन सुरू भइल कि लोग अब एह काम के पिछड़ापन मानत चलि गइले. ओइसे सही माने में देखीं त ई गांवन के स्वालंबन के परंपरा रहे.

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जइसे-जइसे बारिश हो रहल बा, लरिकाईं के एगो बात खूबे यादि आ रहल बा. जइसहीं पहिलका बरखा होई, आजी-मइया लोग घर के धरनि में लटकल लउका, कोंहड़ा, तरोई-सतपुतिया के पाकल आ सुखल फर उतारत रहे लोग. ओह के तूराई होई आ ओह में से गोटगर बिया निकलत रहे. ऊ बिया जनेरा-जोन्हरी के खेत के अलावे घर के अगुआरी-पिछुआरिओ देवालि के नजदीके गाड़ि दियात रहे. जमीन के नमी पाइ के कुछु दिन में माटी में से ओह बियवन में से आंखु फूटत रहे. फेरू ओह बिरवन के सेवा-पटाई होखल सुरू हो जात रहे. चूंकि ई सभ लतर जाति के बिरवा होले स त तनकी बढ़ते उहनी के सहारा दियात रहे आ कहीं छान्हि, खपरइल भा छत पर चढ़ावे के इंतजाम कइल जात रहे. सहारा में हरेठा के झांग भा बांस खाड़ कइ दियात रहल हा..

ई बिरवा बाद में घन आ बरियार लतगर हो जात रहले स. एकही बिरवा आताना फरत रहे कि घर के छोड़िं, अड़ोस-पड़ोस के लोगन के तरकारी खात-खात मन उबिया जात रहे. तब ज्यादेतर घरन में छान्हिं-दुआर के तरकारी आ दुआर पर राखल गाइ-भंइसि के दूध बेचल बाउर मानल जात रहे. एह वजह से खइला से अधिका भइल दूध आ तरकारी पर पूरा टोला-मोहल्ला के अधिकार रहत रहे. बहरहाल बरखा के संगे लतरि लगावे के ई परंपरा सहरन के भी ओह घरन में रहे, जवना के आपन सहनि होत रहे. बाकिर जइसे-जइसे उदारीकरण बरियार होत चलि गइल, सहर के छोड़िं, गांवों एह परपंरा के भूलात चलि गइल. सबकुछ बाजारे से खरीदे के अइसन चलन सुरू भइल कि लोग अब एह काम के पिछड़ापन मानत चलि गइले.

ओइसे सही माने में देखीं त ई गांवन के स्वालंबन के परंपरा रहे. उदारीकरण स्वालंबन के एह वेवस्था के सबसे ज्यादा चोट पहुंचवले बा. भारतीय गांवन में परंपरा से खेती-किसानी के संगे बागवानी, तियन-तरकारी के घरेलू खेती आ पसुपालन खूब होत रहे. एही वजहि से करीब तीस-चालीस साल पहिले ले गांव आ छोट सहरन में बरसात के सुरूआते संगे लउका, कोंहड़ा, नेनुआ, सतपुतिया, तरोई, चचीरा, भतुआ, खीरा जइसन तरकारीन के बोआई होत रहे आ महीना-डेढ़ महीना बीतत-बीतत घर बिना खाद-पानी वाला देसी तरकारी के बाढ़ि आ जात रहे. एह खातिर लोगन के कवनो पइसा ना खरच करे के परत रहे आ बिना कवनो खरचा के घर-घर अइसन तरकारी मिलत रहे, जवना के आजु जैविक कहल जाता आ लोग महंगा दाम पर कीनता.

एह चलन से लोगन के तरकारी के काताना खरचा बांचत रहे, एह पर कबो विचारे ना भइल. भारत में करीब छह लाख गांव बाड़े स. मानि लीं कि हर गांव में अगर सइ गो घरन में ई लतरि लागल आ हर घर से औसतन पांच कुंटल भाजी के पैदावार भइल त काताना भइल. कुछु साल पहिले कृषि अनुसंधान परिषद के अंदाज रहे कि देसभर में होत घरेलू सब्जी से करीब साढ़े तीन सौ करोड़ के बचत होत रहे. एहू ले बड़ बात ई बा कि एह बचत के संगे भारतीय स्वास्थ्य वेवस्था के भी बनावे आ बचावे राखे में ई बाड़ा योगदान देत रहे.

भारतीय सभ्यता के उमिर करीब पांच हजार साल मानल जाला. एगो जमाना में भारत के सोने के चिड़िया कहल जात रहे. एकर वजहि रहे यहां के गांवन के स्वालंबन. ओह स्वालंबन के आधार रहे खेती-किसानी, गोपालन. गांवन में रहत सिल्पकार आ कलाकार बाकी काम करसु आ आपाना कला आउर हुनर से भारतीय अर्थवेवस्था में भारी सहयोग देत रहले. जुलाहा भाई कपड़ा बुनाई के उस्ताद रहले त लोहार भाई लोहा के काम के, बढ़ई भाई काठ के काम के त कोंहार भाई माटी के बरतन, खपड़ा आदि बनावे के. भारतीय गांवन के सोच रहे कि ओकरा कपड़ा आ नून के अलावा कवनो चीजु बहरी से ना मंगावे के पड़े. 1909 में लिखल आपाना किताब हिंद स्वराज में गांधी जी भी भावी आजाद भारत के गांवन के लेके अइसने सोच रखले रहले.

बाकिर आजादी के बाद ई वेवस्था ना अपनावल गइल. आजु के अर्थसास्त्री एह बात से खुस हो जाले कि गांवन के देस के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में योगदान लगातार घटि रहल बा. एह बदलाव के अर्थवेवस्था के लेहाज से बढ़िया मानल जाता. जब देस आजाद भइल रहे, तब देस के जीडीपी में खेती-किसानी के करीब 52 प्रतिशत योगदान रहे, जवन 2014 तक घटि के करीब 14 फीसद रहि गइल बा. एह बदलाव के बहुत बढ़िया बतावल जा रहल बा. कथित आधुनिकता के नाम पर एह सोच के बढ़ावा दिहल जाता. एही वजहि से गांवन के स्वालंबन घटल बा. पारंपरिक वेवस्था के पिछड़ा मानल जाता. एकर असर ई बा कि गांवन के लोग भी आपन भोजन-पानी के मोर्चा पर स्वालंबन भुलात जाता. लतरि वाली तरकारीन के घर-घर बोवाई के भुलाइल एही सोच के विस्तार ह. एह वजहि से लोगन के बाजार पर निर्भरता बढ़ल जाता. रासायनिक खाद आ कीटनाशक के सहयोग से होखे वाली पैदावार पर भरोसा बढ़त गइल आ ओकर नतीजा ई भइल कि लोग तरह-तरह के बेमारियो से ग्रस्त होत गइले.

लतरि के बोवाई के भुलइला के वजहि से कचरा के ढेर बढ़त जाता. पहिले घर से निकलल कचरा के घरहिं में सराके खाद बना दियात रहल आ ओकर इस्तेमाल लतरि आदि के जड़ि में हो जात रहे. अब, जब लतरिए नइखे त लोग कचरा के इस्तेमाल कहवां करी, सिवा सड़कि भा कूड़ा में फेंकला के.

अइसन में जरूरत ई बा कि हमनी के आपना परंपरा के ओरि लवटि जा. लतरि लगावे आ पारंपरिक बिया बोवे के छिटफुट कोसिस जारी बा. ओह में हमनीं के भी आपन सहयोग दी जा. आ कम से कम सब्जी के मोर्चा पर स्वावलंबी बनीं जा. एह से सेहत के रक्षा त होखबे करी, पर्यावरण के भी बचाव होई. (उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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