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Bhojpuri में पढ़ें- अभिओ तिलकहरू के इंतजार होता?

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शादी-बियाह के लगन शुरू होते तिलकहरू लोग मंडराए लागेला. का गांव, का कस्बा आ का शहर! जेकरा-जेकरा घरे शादी-बियाह जोग नवही ...अधिक पढ़ें

इहो कहाला कि वर आ कनिया के जोड़ी ऊपरे से बनिके आवेला. बाकिर केहू-ना-केहू मिलावेवाला त चाहीं. ओइसे एगो लोकोक्तिओ कहाला-राम मिलवलन जोड़ी,एगो आन्हर, एगो कोढ़ी!

जब बियाह जोग लइका का दुआर पर कवनो तिलकहरू आवेला, त अइसन लागेला जइसे कवनो कंगाल के भागि खुलि गइल होखे आ लाटरी के टिकट पर इनाम मिले वाला होखे.तिलकहरू के आगम से अइसन जनाला जइसे कवनो किसान के फसिल के उचित मोल लगावेवाला महाजन आ गइल होखे.ओइसे तिलकहरू आ नसीब के कवनो ठेकान ना होला कि कब आके टपकि परे आ बाट जोहत बबुआ के माथे मउरि चढ़ि जाउ,हाड़े हरदी लागि जाउ!

तिलकहरू जब बेटहा के दुआर पर जाला त ओकर भेसभूषा देखते बनेला. भलहीं घर में भूंजी भांग ना होखे, बाकिर ठाट-बाट बनाके ऊ लइका देखे जाई.कहलो जाला कि भेखे भीख मिलेला, ए से भाड़ा के गाड़ी होखे भा किराया के कपड़ा-लत्ता, कवनो हाल में बेटहा के दिल जीतल ओकर मकसद होला.काम परेला त गदहो के बाप कहहीं के परेला.इहां त बेटहा से किछु सांच आ किछु झूठ बोलिके आपन बेटी देबे के बा,कनियादान करे के बा.जंग आ परेम में सभे किछु जायज होला नू?

बाकिर तिलकहरू लइका खोजे अकेले ना जाला. ओकरा संगें एगो बिचवानो होला, जवना के अगुवा कहल जाला.अगुवा नांव के जीव लइकीवाला आ लइकावाला-दूनों से कवनो-ना-कवनो किसिम से जुड़ल होला.दूनों पच्छ के अंदरूनी हालात से ऊ बखूबी वाकिफ होला.खूबी आ खामी-दूनों के चीन्हिके ऊ मोलभाव करेला.दरअसल अगुवा अइसन तरजूई होला, जवना के एगो पलड़ा पर बेटिहा आ दोसरा प बेटहा जोखाला.अगुवे दूनों पलड़ा के संतुलित करे में अगहर भूमिका निबाहेला.हालांकि आगा चलिके दूनों पच्छ रिश्ता में आइल कवनो झोल खातिर अगुवे के दोषी ठहरावेला आ आखिरकार ओकर हाल सांप-छुछूंदर के हो जाला-ना घोंटते बनेला,ना उगिलते.मियां-बीवी राजी,त का करिहें काजी!

जब हीत-नात नीमन मिलि जाला त ओकर श्रेय तिलकहरू लोग खुद के देला आ जदी कनिया के ससुरा में सांसत भा दुख-तकलीफ झेले के परेला त अगुवा के कोसे, गारी-फजीहत देबे-करे के अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाला.ओने बेटहो हर फरमाइस पूरा ना भइला पर अगुवे के दोषी ठहरावेला.तिलक का दिनहीं गीत गावेवाली मेहरारुन के सुर फूटेला-

सोना के जेवर करार कियो रे अगुवा बैमान,
पीतर के जेवर चढ़ा दियो रे अगुवा बैमान!
ठग लियो लड़का हमारा रे अगुवा बैमान!

तिलक चढ़ावे खातिर पहुंचल तिलकहरुओ के कहां छोड़ल जाला! अइसन लागेला जइसे ऊ बेबोलवले अचके धमकि परे वाला मेहमान होखे.गीतगवनी लोग फरमावेला-

अइसन आन्हीं धुक्कड़ में
तिलकहरू साला आयो रे!

तिलक चढ़ावे गइल लरिकी पच्छ के मए लोग तिलकहरू कहाला आ तिलक का दिने ओह लोग के खूब खातिरदारी होला. कहां उठाईं, कहां बइठाईं! जलखई से लेके खानपान ले बढ़ि-चढ़िके आवभगत होला. हीत-नात आ गांव-जवार के लोगो खातिरदारी में इचिको कोताही ना बरते. तड़क-भड़क आ झूठ-सांच देखाके बेटिहा पच्छ से अधिका से अधिका रस निचोड़े के दियानत जे रहेला! दुधारि गाय के दूगो लातो भला!

पहिले जब तिलकहरू लोग तिलक चढ़ावे पहुंचे त नगद आ दहेज के तय रकम ओही दिने चढ़ावल जात रहे.कई बेर लइकी के बाप वादा कइल रकम से कम रकम के जोगाड़ बइठा पावत रहे आ ओइसना हाल में कमे तिलक चढ़ा देत रहे,तबो बीच-बचाव कऽके ममिला सलटि जात रहे आ दूनों के गणमान्य लोग के समुझावल-बुझावल बात बेटहा मानि जात रहे.किछु देरी ले रंग में भंग भलहीं होत रहे,बाकिर आखिरकार हंसी-खुशी से तिलकहरू लोग के विदाई होत रहे.अंत भला तऽ सब भला!

बाकिर जब से तिलक-दहेज के खिलाफ सख्त कानून बनल,तिलकहरू लोग के मुसीबत अउर बढ़ि गइल आ बेटहा के अउर आसानी हो गइल.अब लइका-लइकी के बियाह तय होत कहीं कि मुकम्मल तय तिलक-दहेज के रकम अगवढ़े गिना लिहल जाता.चेक-ड्राफ्ट का जगहा एकदम नगद.तूं डाढ़-डाढ़, त हम पात-पात! जदी अइसे ना,त लइकिएवाला होटल बुक करे,बैंड-बाजा,गहना-गुरिया, जनवासा, सजावट,केटरिंग,स्वागत-सतकार, कपड़ा-लत्ता से लेके आवागमन, नाश्ता-भोजन सहित पंडित-पवनी के खरच-बरच ले,ए से जेड-तमाम इंतजाम करे.वर पच्छ ठाट से बरियात लेके जाई,पिकनिक मनाई, ना हाथ मइल ना गोड़ मइल, बस रोआब झारत रही.बेटीवाला लरिकी जनमाके जब अपराध(!)कइले बा,त ओकर खामियाजा के भोगी? हालांकि बेटी-बेटा सभका बा,बाकिर बेटा के बाप ई बात भुला जाला कि ऊहो कबो बेटी के बियाह के बखत सांसत झेलले रहे आ ए से ऊ बेटीवाला के पीरा के एहसास करो.उलुटे ऊ बदला लिहल चाहेला आ जतना खरच कइले रहे,ओसे कई-कई गुना वसूलेला.मोका मोका के बात ह.कबो गाड़ी नाव पर, त कबो नाव गाड़ी पर! आजुकाल्ह जब नेह-नाता बैपार हो गइल बा,त वर-कनिया के रिश्ता जोड़हूं खातिर किसिम-किसिम के बैपार खूब फरत-फूलत बा.शगुन के विचार करेवाला कम्प्यूटरीकृत जोतिसी से लेके मैरेज ब्यूरो नियर दलाल,मैरेज हाॅल, मंडप,केटरर वगैरह जवन किछु चाहीं,घर बइठल हाजिर बा.बस,पइसा फेंकऽ,तमासा देखऽ!

अब तिलकहरू के भला का जरूरत बा.
लइका-लइकी ‘आइ लव यू’ के राग उचरले,
डेटिंग कइले आ चट मंगनी पट शादी हो गइल.हर्रे लागल ना फिटिकिरी आ रंगो चोखा हो गइल.बाकिर अइसन कई गो बियाह बियाधि बनि जाता आ चार दिन के चाननी साबित होता.लइकी के मनमाफिक चाह जब पूरा नइखे होत, त तनी-तनी बात के लेके ममिला पुलिस थाना आ कचहरी में चलि जात बा आ लइका का संगें ओकर बाप-महतारी,समूचा परिवार गहूं का संगें घुन लेखा पिसात बा.जिनिगी नरक बनि जात बा आ एक-दोसरा से पिंड छोड़ावे खातिर खूब मोलभाव होत बा.तबे बियाह के मजा ओह मथुरा के पेड़ा नियर आवता, जेकरा के खइलो प पछतावा आ ना खइलो प पछतावा.

आजु के नेह-नाता के बैपारी पारम्परिक बियाह आ तिलकहरू के मरम का बुझिहें! गांव में आजुओ तिलकहरू के महातम बा. जेकर बबुआ पढ़ि-लिखिके बढ़िया रोजी-रोजगार में लागल बाड़न, उन्हुका इहां तिलकहरुन के तांता लागल बा आ जेकर लइका बेरोजगार बा, ओकर उमिर ढललो पर तिलकहरू के नजर ओने नइखे जात.

आजुओ तिलकहरू बेटहा किहां जाके नीमन-नीमन मिठाई चाभऽ तारन, लइका के राशि के नांव लेके पंडीजी से लरिका-लरिकी के गनना मिलवावत बाड़न, जानल चाहत बाड़न कि कतना गुन गनना बनत बा, गोत्र आ नाड़ी मिलत त नइखे? कई बेर गनना त छत्तीसो गुन मिलता,बाकिर मन ना मिलला से निरासा हाथे लागत बा.आखिर कब ले शादी-बियाह में माल-गोरू लेखा कीने-बेचे के आ एक-दोसरा के ठगे के सिलसिला चलत रही आ वर-कनिया कोट-कचहरी के चक्कर में अपना-अपना जिनिगी के सोनहुला समय-सपना बरबाद करत रहिहन? समझौतावादी नजरिया अपना के एक-दोसरा के समुझे आ बिसवास जीतिके सुखमय जिनिगी जीए के सबक तिलकहरुओ देलन,अगुवो देलन आ कोटो-कचहरी के मध्यस्थो देलन, बाकिर वरे-कनिया एह दिसाईं गठजोड़ाव के अटल आ अटूट बना सकेलन.बहरहाल, फेरु कतने जवान नर-नारी के शगुन चरचरा रहल बा, तिलकहरू लोग के धूम मचल बा, सगाई, तिलक,बरियात, बैंड बाजा आ शहनाई के मीठ सुर में माहौल खुशनुमा हो उठल बा.रउओं एह सरसता में डुबकी लगाईं आ गीत-संगीत के आनंद लेत नेग देबे-लेबे में शामिल होत मुबारकबाद आ शुभकामना दिहीं-लिहीं.

(भगवती प्रसाद द्विवेदी स्वतंत्र पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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