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Bhojpuri: गठिया भइला पर पुरनिया लोग का खात रहल ह

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एगो कहाउत ह- “जबसे मनुष्य बा, तबसे गठिया रोग बा”. कहल जाला कि राजा से लेके रंक तक गठिया रोग केहू के ना छोड़े. एकर कष्ट ओकरा से पूछीं जे भोगता. उठला, बइठला, चलला- फिरला से लेके ढेर देर खड़ा भइला तक ई रोग रोआ मारेला. जेकरा पयखाना में अंग्रेजी सिस्टम के कमोड नइखे, ओकरा खड़े- खड़े हगे- मूते के परेला.

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मेहरारुन के घर के काम कइल दूभर हो जाला.  दुनिया भर के करोड़न लोग एकरा से परेशान बा. गठिया भा अर्थराइटिस (Arthritis) जोड़ में अकड़न आ दर्द करा देला. आमतौर पर ई रोग बुढ़ापा में होला. बाकिर अब चालीस के उमिर पार करते कई लोगन के चपेट में ले लेता. मरद, मेहरारू के हू के नइखे छोड़त. हमनी के हर जोड़ पर लचीला आ नरम कोशिका रहेली सन जौना के कार्टिलेज कहल जाला. चले- फिरे का समय ईहे कार्टिलेज कौनो तरह के धक्का भा प्रेसर के रोक लेला. बाकिर उमिर का संगे जब शरीर के हड्डी कमजोर हो जाली सन त ई कार्टिलेजवा सूखि जाला, कमजोर हो जाला आ चले- फिरे में दिक्कत होखे लागेला. जोड़ में सूजन आ जाला. मोट भा स्थूल काया वाला आदमी के गठिया जल्दी धरेला. ढेर मोट आदमी के वजन ओकर घुटना भा ठेहुन बर्दास ना क पावेला. त गठिया आ सूजन के बहुत गहिर संबंध स्थापित हो जाला.

त हमनी के पुरनिया बहुते सतर्क रहत रहल ह लोग. रोग होते परहेज शुरू क दी आ आयुर्वेदिक दवाई शुरू क दी लोग. पहिले घर के देवालिन पर दशमूलारिष्ट के खूब प्रचार होखी. दशमूलारिष्ट गठिया के दवाई ह. अब त आयुर्वेदिक दवाइयन के ओतना प्रचार नइखे होखत. गठिया वाला बुजुरुग अजवाइन के सेवन करी, अदरख के सेवन करी. कइसे? त अजवाइन डालल सतुआ के चोखा, मसाला में अजवाइन के आधिक्य क के खइला से गठिया कंट्रोल में रही. अदरख के चाय नियर उबाल के पीयत रहल ह लोग आ अदरक के सिलवट पर पीस के घुटना पर भा जहां दर्द होता लगावत रहल ह. दशमूलारिष्ट दस को औषधीय पौधन के जड़ के सत से बनावल जाला. ई कुल हम देखल चीज कहतानी. कौनो भी दवाई खाए के पहिले डाक्टर से जरूर पूछ लेबे के चाहीं. पुरनिया लोग गठिया में बिना चोकर वाला गेहूं, जौ के आटा, सूजी आ बेकरी वाला ब्रेड ना खात रहल ह. दूनो बेरा भात भा चाउर के रोटी खात रहल ह. अब रउरा कहब कि ब्रेड त पुराना जमाना में ना रहल ह. त सरकार, बेकरी वाला पावरोटी आ ब्रेड आज से 60 साल पहिले हमनी का देश में आ चुकल रहे. सबसे पहिले गोआ में एगो पुर्तगाली शुद्ध आटा (मैदा से ना) से पावरोटी बनवलस. बाद में ओकरा रेसिपी के अउरियो लोग नकल क लिहल आ पावरोटी के उदय हो गइल. आजकाल के डाक्टर लोग त गठिया भइला पर नूडल्स, पिज्जा, बेकरी के कुल सामान खाए से मना क देता लोग. जेकरा गठिया बा ऊ बिना चोकर वाला जौ- गहूं के रोटी, मैदा से बनल चीज भा सूजी लगातार खा ली त जोड़ के दर्द बढ़ि जाई. त पुरनिया लोग गठिया भइला पर दही के दूनो बेरा खूब सेवन करत रहल ह, हरियर तरकारी आ फल खूब खात रहल ह आ जब कबो आटा के रोटी खाए के मन करी त आटा में खूब चोकर मिला के रोटी बनवावत रहल ह. आधा आटा आ आधा चोकर वाला रोटी अइसहूं कब्ज के तूर देला. हं, दूध ना पियत रहल ह लोग. काहें से कि गठिया में दूध के सेवन ठीक ना कहाला. रात खान दही के जगह पर मट्ठा पियत रहल ह. मठवा तनी गाढ़ रही. गठिया वाला पुरनिया लोग अन्नानास, सेव, संतरा, नींबू के सेवन करत रहल ह. लौकी आ बीन के तरकारी ओह लोगन के प्रिय रहल ह.

कबो- कबो खूब तीत आ चटक तरकारी बनवा ली लोग. काहें से कि सादा खाना खात- खात केहू के मन उबिया जाई. जीभ चटक चीज खातिर तरसे लागी. त पुरनिया लोगन के हफ्ता में दू दिन सनीचर आ अतवार चटक- मटक चीज खाए वाला दिन रहल ह. एगो बात अउरी, भले लोग कहेला कि सलाद के कानसेप्ट हमनी के देश में अंग्रेज लोग ले आइल. बाकिर हमनी के पुरनिया लोग भी सलाद के शौकीन रहल ह. गठिया में सलाद बड़ा फायदा करेला. त पुराना जमाना में कंकरी, तरबूज, पियाज के सलाद बना के ओमें तनी काली मिर्च, नींबू आ काला नमक देके सलाद रूपी स्वादिष्ट चीज के खूब खात रहल ह. हरियर चना भी खूब खात रहल ह. अउरी का खात रहल ह लोग? त लहसुन के गठिया खातिर रामबाण कहात रहल ह. त लहसुन के चटनी भा साबुत लहसुन के जवा खात रहल ह. नया जमाना में भी लहसुन के गठिया में बहुते उपयोगी कहल जा रहल बा. लहसुन सूजन कम करा देला. एकरा अलावा पालक, बथुआ, अंगूर वगैरह खात रही लोग. गठिया के रोगी के ई कुल खूब खाए के चाहीं. अच्छा ई त भइल कि का खाए के चाहीं. बाकिर का ना खाए के चाहीं? का मना बा? त पुरनिया लोग कही कि मांस, मदिरा, घीव- तेल में खूब तलल- भुनल चीज, टमाटर भा टमाटर डालल सलाद, आलू आ बैंगन एकदम छुअत ना रहल ह. चटक तरकारी बनी त ओमें टमाटर भा आलू ना डालाई. अब जे मिठाई के शौकीन बा आ गठिया रोग ओकरा ध लेले बा, ऊ दिल कठोर क लेउ. पुरनिया लोग मिठाई खाइल छोड़ दी. चाय, काफी एघरी मना कइल जाता, बाकिर ओघरी चाय- काफी के कौनो चलन ना रहे. सबेरे लोग उठते चाय ना पीए. सौंफ के अइसन रस पीयत रहल ह, जौना में मीठा ना डालल होखे. पुरनिया लोग गठिया भइला पर ऊपर से नमक ना लेत रहल ह.

मान लीं दाल में भा तरकारी में रसोई बनावे वाला नमक डालल भुला गइल बा, त पुरनिया लोग ओहीतरे खा ली. ऊपर से नमक ना डाली. ऊपर से नमक डलला के कच्चा नमक कहात रहल ह. त कच्चा नमक गठिया में मना रहे. आज भी देखतानी डाक्टर लोग नमक सीमा के अंदर खाए के कहता. अच्छा पुरान लोग एगो बात पर एकमत ना रहल ह. ओमें से कुछ लोग कही कि गठिया में हरियर मरिचा खात रहे के चाहीं, त कुछ लोग कही कि हरियर मरिचा गठिया में नोकसान करेला. एही एक बात पर पुरनिया एक राय ना रहले ह. आधुनिक विज्ञान का लगे हो सकेला एकर कौनो स्पष्ट राय होखे.

पुरनिया लोग कही कि गठिया भइला पर एक ही पोजीशन में देरी ले खड़ा ना रहे के चाहीं. एकही पोजीशन में लगातार ना बइठे के चाहीं. पोजीशन बदलत रहीं. एक घंटा बइठि गइनी त तनी टहर- घूम लीं. खड़ा हो जाईं. एसे जोड़ के अकड़न ना बढ़ी. त पुरनिया लोग खाए- पीए के शौकीन होते हुए भी सतर्क रही लोग. कहीं भी अति ना करी लोग. उमिर भइला पर अधिकांश लोगन के घुटना/ठेहुन कमजोर होइए जाला. त एमें परेशान होखे के जरूरत नइखे. परहेज करीं आ दवाई- बीरो खात रहीं. डाक्टर कुछ कसरत बतावे त ऊहो करत रहीं. बाकिर गठिया के लेके चिंतित मत रहीं. काहें से कि गठिया के रोगी पूरी दुनिया में मिल जइहें. जब मये संसार गठिया के मैनेज क लेता त हमनियो का मैनेज क लेब जा.

(विनय बिहारी सिंह भोजपुरी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Article in Bhojpuri, Bhojpuri

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