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Bhojpuri: गदह पचीसी केकरा खातिर कहल बा, पढ़ीं अउर जानीं एकर मतलब

पुरनिया लोग बड़ा अच्छा मुहावरा बनवले रहे लोग, अब जइसे “गदह पचीसी” के लीं. कहात रहल ह कि 16 से 25 साल के उमिर के दायरा वाला नौजवान जब फालतू काम में व्यस्त रही त ऊ गदह पचीसी के शिकार बा.

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हमनी के पुरनिया लोग बड़ा सोच- समझि के कौनो मुहावरा बनवले बा. अब जइसे “गदह पचीसी” के लीं. कहात रहल ह कि 16 से 25 साल के उमिर बड़ा कांच ह. एमें जे सतर्क ना रही ऊ भोग- बिलास आ प्रपंच के खाई में गिर जाई. जे सतर्क रही ऊहे जीवन में सफल होई. एकदम साफे लउकता कि आजुओ ई मुहावरा बड़ा सार्थक बा. एकर एगो अउरी अर्थ बा. उमिर के एह दायरा वाला नौजवान जब फालतू काम में व्यस्त रही त ऊ गदह पचीसी के शिकार बा.

दिन भर व्हाट्स एप, फेसबुक आ इंस्टाग्राम के चक्कर लगावता आ एको मिनट फोन से अलगा नइखे होखत, कौनो प्रतियोगी परीक्षा के तेयारी नइखे करत, कौनो उद्यम नइखे करत. दिन भर टीवी देखता ना सूतल रहता. नीमन- नीमन चीज केतरे खाईं एकरे फेर में परल रहता त एमें कौनो दू राय नइखे कि अइसन लइका गदह पचीसी के शिकार हो गइल बा. त ठीके कहल बा कि गदह पचीसी में फंसल माने जीवन भर खातिर कांट का जंगल में अझुराइल. पुरनिया लोग उदाहरण देत रहल ह कि वेदव्यास जी के पुत्र शुकदेव जी 12 साल के उमिर में कुल वेद- उपनिषद के श्लोक आ ओकर तात्विक अर्थ जानि लेले रहले आ परम विद्वान हो चुकल रहले. जब वैराग्य में ऊ घर से निकलले त रास्ता में एगो पोखरा परल जहां कुल युवा मेहरारू लंगटे नहात रहली सन.

शुकदेव जी के देखि के ई कुल मेहरारू बिना लजइले प्रणाम कके आसिरबाद मंगली सन. शुकदेव जी के खोजत वेदव्यास जी जब ओह पोखरा पड़ी गइले त लंगटे नहात मेहरारू लुका गइली सन. वेदव्यास पुछले कि तहनी लोग हमरा लइका से ना लजइलू ह, आ हमरा से काहें लजातारू? त मेहरारू कहली सन कि शुकदेव महाराज वैराग्य में बाड़े. उनुका ई ज्ञान नइखे कि के लंगटे बा आ के कपड़ा पहिनले बा, के मरद ह आ के मेहरारू ह. बाकिर रउरा ओह मानसिक अवस्था में नइखीं. रउरा मन में स्त्री- पुरुष के भेद बा. त एही से हमनी का लुकाइल बानी जा. त शुकदेव जी से गदह पचीसी डेरात रहे. उनुकर त कुल इंद्रिय ब्रह्माग्नि से रूपांतरित हो गइल रहली सन.

आ चैतन्य महाप्रभु? ऊ त 24 साल के उमिर में संन्यास ले लिहले. आ स्वामी विवेकानंद? एलएलबी करते मन में वैराग्य समाए लागल. त रउरा कहब कि सब चैतन्य महाप्रभु आ स्वामी विवेकानंद ना नू हो जाई! महानता वाली घटना रेयर बाड़ी सन. त सरकार ठीक कहतानी, बाकिर ई बताईं, सामान्य गृहस्थ के लइकन में का अइसन जवान नइखन स जौन दिन- रात मेहनत कके आपन आ अपना परिवार के आर्थिक स्थिति सुधारे के प्रयास करतारे सन? जरूर बाड़े सन. आंकड़ा बतावतारन स कि पिछला 20-25 सालन में आईएएस के परीक्षा में सफल होखे वाला विद्यार्थियन में ग्रामीण पृष्ठभूमि के युवा के संख्या ढेर बा. नइखे बिसवास होत त वेबसाइट पर जाके चेक क लीं. ई काहें होता?

एसे कि ग्रामीण पृष्टभूमि के लइका अपना गरीबी, अभाव आ माता- पिता के पीड़ा समझतारे सन, महसूस करतारे सन. ओकनी के मन में छटपटाहट बा कि कइसे एह गरीबी के दुष्चक्र से बहरा निकलल जाउ. हालांकि गांवों में गदह पचीसी के शिकार युवा बाड़न स. बाकिर अब गांव के युवा चेतना में बदलाव देखल जा सकेला. छटपटाहट देखल जा सकेला. त सचेतन युवा मन- प्राण से प्रतियोगी परीक्षा के तेयारी करतारे सन, कुछ उद्यम करतारे सन. बाकिर जौन लइका कुल सुख- साधन से संपन्न बाड़े सन. बाप- महतारी ओकरा हर इच्छा के पूर्ती क देता, त ऊ काहें प्रतियोगी परीक्षा खातिर कड़ा परिश्रम करी. ऊ त बाप- दादा के कमाइल संपत्ति पर नजर गड़वले बा. ओकरा त लागता कि ई सुख चलत रही. ऊ फेसबुक आ ट्विटर पर बेकार के राजनीतिक बहस में उलझल बा, ह्वाट्सएप पर कुल मैसेज आ वीडियो फारवर्ड करता.

ना, कुल शहरी लइका अइसन नइखन स. बाकिर एहतरे के फालतू गतिविधि में लिप्त रहे वाला शहरी आ महानगरीय युवा वर्ग के संख्या कम नइखे. शहरी भा महानगरीय परिवेश वाला लइकन में भी छटपटाहट बा. लेकिन ओकनी के संख्या गदह पचीसी वालन से कम बा. कतने युवा त खाओ, पीयो, मौज करो वाला बाड़े. त गदह पचीसी के भूत केकरा धइले बा, ई जांचे के परी. के जांची? त महतारी- बाप जांची. ई जांच लइकाइए से करेके परेला. ना त लइका भा लइकी के जवान भइला पर हमनी के चेकिंग ढेर फायदा ना करी. जवान सुग्गा ठीक से ना सिखी. जब सुगवन के आदमी के बोली सिखावे के रहेला त ओकनी के लइकाइएं से सिखावल जाला. तब ऊ हजारन रुपया में बिकाले सन.

अब देखल जाउ कि रिहाबिलिटेशन सेंटर पर कतना प्रतिशत युवा बाड़न स. सन 2015 के आंकड़ा कहता कि हर साल नशा मुक्ति केंद्र पर 2 करोड़ से ज्यादा युवक नशा छोड़े खातिर अइलन स. 2021 के आंकड़ा अउरी बढ़ि गइल बा. छोट शहर में भी हेरोइन आ चरस के शिकार युवा देखल जा सकेलन स. नशा करे खातिर ऊ घरे के कौनो सामान चोरा के बेंचि देता. ईहे असली गदह पचीसी ह. पूरा जवानी नशा में बिता दिहले. बाकी जवानी नशा मुक्ति आ अपना के सुधारे में. एगो मशहूर फिल्म अभिनेता भी एगो जमाना में नशा के शिकार रहले. बाकिर उनकर पिता उनुका के सुधार दिहले. ढेर लोग सुधरि जाला. जेकरा ई ज्ञान हो गइल कि नशा, नाश के जड़ ह, बस ऊ नशाखोरी छोड़ि दी. ई त भइल हेरोइन आ चरस के नशा. बाकिर कुछ अदृश्य नशा भी होलन स. जइसे पढ़े के बेरा नींद आवे लागी आ इंटरनेट कनेक्शन वाला फोन बा त ओकरा पर रात भर जागे लागी. परिणाम- दिन- रात व्यर्थ के काम में लिप्त रहिके आपने जीवन बिगाड़ल. एकरा अलावा घूमे के नशा, प्रपंच बतियावे के नशा आ ना जाने कतना प्रकार के गलत आदतन के नशा.

दोसर केहू के जीवन में अनावश्यक रुचि लेबे के नशा आ हर आदमी के जज करेके नशा. सबकर कमी देखि के ओकरा पर घंटन बतियावे के नशा आ आपन कमी देखे में कौनो रुचि ना. ईहो गदह पचीसी ह. आ ई गदह पचीसी, पचीस बरिस के उमिर के बादो जारी रहि सकेला. त हम त पुरनिया लोगन के प्रणाम करतानी कि ऊ लोग गदह पचीसी के लेके शोध- मंथन कइल आ जीवन के चार गो आश्रम में बांटि दिहल - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आ संन्यास. अब ऊ नियम आज के परिस्थिति में त ना अपनावल जा सकेला बाकिर बदलल परिस्थिति में एह चारो आश्रम व्यवस्था के पर्यायवाची सामने राखिके अपना जीवन के संतुलित त कइले जा सकेला. (विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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