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Bhojpuri Spl: किसान आंदोलन के नाम पर ई सब का भईल दिल्ली में? बदनामी के अलावा का मिली?

आखिर किसान लोग एह हिंसक प्रदर्शन के जरिए का देखावल चाहत बा?
आखिर किसान लोग एह हिंसक प्रदर्शन के जरिए का देखावल चाहत बा?

आखिर जवन आशंका रहें उहे भइल. पूरा देश दिल्ली के राजपथ पर 72वां गणतंत्र के जश्न मनावत रहे, ओने दिल्ली के आईटीओ चौक पर पुलिस आ किसानन के बीच गुरिल्ला युद्ध चलत रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 26, 2021, 9:25 PM IST
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ंआखिर जवन आशंका रहें उहे भइल. पूरा देश दिल्ली के राजपथ पर 72वां गणतंत्र के जश्न मनावत रहे, ओने दिल्ली के आईटीओ चौक पर पुलिस आ किसानन के बीच गुरिल्ला युद्ध चलत रहे. देश में कबो अइसनो स्थिति पैदा होइ, एह खातिर ना गणतंत्र के स्थापना भइल रहे, न अइसन उम्मीद रहे. एक तरफ देश के स्वाभिमान के रक्षा खातिर शौर्य पराक्रम के प्रदर्शन तो दूसरी ओर लगभग दो महीने से ज्यादा समय से दिल्ली के बार्डर पर चल रहल किसानन के शान्तिपूर्ण प्रदर्शन के अचानक ऐन 26 जनवरी के दिन हिंसक प्रदर्शन में तब्दील हो गइला के वजह. का एह साल साल के गणतंत्र दिवस के एहि रूप में याद करेके सपना गणतंत्र के विधाता लोग देखले रहे? का अइसन स्थिति में आपसी संवाद अउर सहमति से कवनों समस्या के समाधान निकल सकता?

शायद अइसने अनहोनी आ लोकतंत्र के विद्रूपता के ख्याल करिके भोजपुरी के कवि रामविचार पांडे जी लिखले रहिनि कि ऐ हमार छब्बीस जनवरी, बाकी बाटे का कुछ अउरी. ई अवसर कुछ नया संकल्प लेके आगे बढ़े के रूप में याद कइल जाला. दुनिया के नजर में देश के छबि के नुकसान पहुंचा के जवन कुछ भी हासिल होई ओकर भरपाई अनाज पर एमएसपी के कवनों कीमत, चाहे कानून के कवनों गारंटी से त ना पूरा कइल जा सकेला. अभी अपना देश के लोकतंत्र में अतना गुंजाईश बा कि बातचीत से कवनो समाधान निकल सकेला. इहे लोकतंत्र के खूबसूरती भी ह. लेकिन आज दिल्ली के सड़क पर जवन डरावना दृश्य देखात, ओकरा के देखी के ई लागत बा कि मुठ्ठीभर लोग अपना मनमउजी तरीका से देश में लोकतंत्र के नया रूप देबे के कोशिश करत बा. खासकर अइसन अवसर पर जब देश एकओर कोरोना के संकट से उबरे के कोशिश में लागल बा, त देश के सीमा पर चीन के साथ मुब्तिला बा.

संकट चौतरफा बा. समाधान खाली सरकार के मुहँ जोहला से ना होई.समाज के आगहूं आवे के होई, आ देश के मौजूदा संकट से उबरे खतिर समझ भी बढ़ावे के होई.खाली जिद,हठ आ हिंसा से कवनों आंदोलन के बदनामी आ अराजक होखे के खतरा बढ़ जाला, जवन 26 जनवरी के राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर देखाइल.जवन बात पहिले खाली चर्चा में रहें, ओकर प्रत्यक्ष परदर्शन हो गइल.अबतक किसानन के आ राज्य के धैर्य के परीक्षा होत रहें.अब कहीं ताकत के आजमाइश होई, तब नतीजा का निकली? एकर आसानी से अनुमान कइल जा सकेला. तब राज्य कानून के हवाला देकर कवना हद तक जाइ,एकर कल्पना ना कइल जा सके. फिर संविधान में कवनों संसोधन, परिवर्तन के संभावना ना रहीं.खेती किसानी पर त पहिले ही से संकट बढ़ल बा, किसानन के वर्गीय एकता पर भी सवाल खड़ा हो जाई.



किसान आंदोलन के नेता लोगन के ई बात हमेशा ध्यान में रखें के चाहीं कि देश के आजादी बड़ा कुर्बानी के बाद हासिल भइल बा, एह आजादी पर कवनो संकट तब पूरा देश एक साथ खड़ा हो जाई, पूरा बैर, भय, भेद भुला के. ई सवाल एह से महत्वपूर्ण बा कि तिरंगा के आन-बान-शान की रक्षा के खातिर राष्ट्रीय पर्व मनावल जाला, आ मार्च पास्ट,सैलूट के जरिये देश के सेना के शौर्य पराक्रम के दिल्ली के राजपथ पर आ पदेशन के राजधानी,जिला तहसील से लेकर गांव गांव तक तिरंगा फहरावल जाला. तिरंगा के आड़ में तिरंगा के चुनौती देला के मतलब देश के आजादी आ देके संविधान के राष्ट्रीयपर्व पर खलल मानल जाइ. ई देश के इतिहास में जरूर दर्ज होई.बाकी एगो काला अध्याय के रूप में. आखिर सन् 1929 में रावी के तट पर पूर्ण स्वराज हासिल करके लक्ष्य आ 26 जनवरी के हर साल स्वाधीनता दिवस के रूप में मनावे संकल्प अइसने दिन देखे खातिर त न लिहल रहें.
एह देश संविधान के व्यवस्था बा, लोकतंत्र के मर्यादा बा तबे एक सामान्य आदमी देश के उच्च से उच्च पद प्राप्त कर सकेला,आपन बात कहीं सकेला,लागू कर सकेला मनवा सकेला. का आज दुनिया की बड़ी ताकत चीन में भी राष्ट्रीय पर्व के कवनों अवसर पर राजधानी बीजिंग में अइसन हिंसक प्रदर्शन इजाजत हो सकेला? सन्1989 थेयाँनमान चौक पर लोकतंत्र के समर्थन में भइल धरना प्रदर्शन के का हश्र भइल? दुनिया भूला गइल. दुनिया के मानल जानल उद्योग पति जैक मां चीन कइसे निपटत बा ई दुनिया के लो देखत नइखे?हांगकांग, आ ताइवान के लेके चीन के विस्तारवादी रवैया से दुनिया परचित नइखे?अपने देश में किसानन जइसन हिंसक प्रदर्शन के नजारा दिल्ली के बॉर्डर आ टी ओ चौक पर 26 जनवरी राष्ट्रीय पर्व के दिन दिखाई दिहल ओकरा के देखि के एगो कविता के पंक्ति याद आवत बा के लोकतंत्र का अंतिम क्षण हैं , कहकर आप हंसे.किसान सघर्ष समिति जवन कल तक सरकार के हार आ किसानन के जीत के रूप में आपन बात मानला के प्रदर्शन 26 जनवरी के कइल चाहत रहल हा ओकरा के कवना रूप में दर्ज कइल जाइ?

अपना सत्य खातिर मर मिटे के संकल्प भारतीय शास्त्रन में उपलब्ध बा, बाकी झूठ आ वादा खिलाफी के का सजा मुकर्रर कइल बा ?ओकर सजा भुगते खातिर किसान संघर्ष समिति के नेता लोगन के तैयार रहें के चाही.ना त पिछला दू महीना से अधिका समय से शांतिपूर्ण तरीका से चलत आवत आंदोलन उहे हश्र होई जवन अबतक के किसान आंदोलनन के भइल बा.बातचीत के रास्ता आ दबाव खातिर हिंसक प्रदर्शन दूनो एक साथे ना चल सकें.एह बात के जतना जल्दी एहसास किसान संघर्ष समिति के नेता लोगन के हो जाइ, उतने किसानन के हित में अच्छा रहीं.दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद महात्मा गांधी के सत्याग्रह की कठिन परीक्षा तीन कठिया नील के खेती के मुद्दे को लेकर भइल गांधी जी के संकल्प के पूरा जीत भइल. खेड़ा किसान आन्दोल, बरदोल किसान आंदोलन, बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में अवध किसान आन्दोल अपना मूल चरित्र में किसान सत्याग्रह आ अहिंसा के बदौलत सफलता अर्जित भइल रहें.

गांधीजी के सत्याग्रह से भी इहे सबक लिहल जा सकेला कि अगर विरोधी बीस बार वादा खिलाफी करें, तब भी बातचीत की गुंजाइश बरकरार रहें के चाहीं. गांधीजी के इहो विचार रहें किसान कभी किसी का गुलाम नहीं रहा हैं.यह भी अहिंसा की नीति सबसे कारगर तरीका से किसान आ महिलाओं के बीच लागू हो सकता हैं.परसवाल बा कि आज दिल्ली राष्ट्रीय पर्व के दिन किसानन के जवन रूप देखाई दिहल हा ओकरा के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के किसानन के बारे में जवन विचार रहें ओकरा आलोक जायज ठरावल जा सकेला? का किसान सघर्ष समिति के नेता लोग किसानन के अइसन धतकरम खतिर माफी माँगी? बहुत दिन तक वादाखिलाफी करके गणतंत्र के चेहरा पर कालिख पोते के ई प्रयास भुलाइल ना जा सकें. एह जख्म भरे के जिम्मेदारी अब किसान आंदोलन का किसान नेता लोगन पर बा.इहे ना अब भविष्य के कवनों किसान आंदोलन के सामने ई सवाल तारी रहीं. (लेखक मोहन सिंह जी वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
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