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Bhojpuri Spl: हिंसा या शांति? जानीं अगर ई किसान आंदोलन बिहार में भइल रहित तs का होइत

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बिहार कए गो ऐतिहासिक आंदोलन के गढ़ रहल बा, लेकिन कवनो में हिंसा ना भइल. अगर बिहार में किसान आंदोलन भइल रहित तs का एतना हूल गड़ापा भइल रहित?

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2021, 7:09 PM IST
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गोइंठा के आड़ा बोझाइल रहे. आग सुनगे के अभी शुरउए भइल रहे. लिट्टी गढ़ा के तैइयार रहे. आज रामखेलावन चा के दलान पs लिट्टी- पाटी रहे. भुनेसर चा हमरा से कहले, जा खेत में से भंटा-टमाटर तूरले आवs. ओहिजे दू चटाई में लहसुन, धनिया अउर मिरचाई लगइले बानी. उहो ले ले अइहs. तले गनौरी चा गमछी में आलू बन्हले पहुंच गइले. पछेया ललकरले रहे. सर्दी के मारे बुझाए कि हाथ-गोड़ सुन्न हो जाई. एह ठंडी में आग तपला के मजा रसगुल्ला खइला से कम ना रहे. आग के लपट अउर धुआं कम भइल तs भुनेसर चा खुरपी से आड़ा के पसाल देले. आग पs लिट्टी रखाए लागल.

गनौरी चा लिट्टी के उलट-पलट के पकावे लगले. दोसरा आड़ा पर आलू-भंटा- टमाटर पाकत रहे. ओही घरी फुलहा डूभा में घीव ले ले परमेसर चा आ गइले. घीव फरके राख उहो आड़ा भिरी बइठ गइले. परमेसर चा लमहर किसान रहन. उ कहले, आज देखलs लोग नू कि दिल्ली में किसान आंदोलन के नांव पs का भइल ? आपन मांग खातिर धरना प्रदर्शन तs ठीक बा लेकिन लाल किला पs चढ़ाई कइला के का जरूरत रहे ? रामखेलावन चा कहले, किसान कभियो हिंसा ना कर सकेले, अगहन-पूस में भला किसान के आंदोलन करे के टाइम बा ? पता ना खेती-बारी छोड़ के कइसे अतना लोग दिल्ली में डेरा जमइले बाड़े.

अगर बिहार में आंदोलन भइल रहित का होइत ?
लिट्टी दूनो देने सींझ गइल तs परमेसर चा ललहुन गोइंठा में लिट्टी के तोप देले. पांचे मिनट में सभ लिट्टी केवाल के माटी जइसन फाट गइल. गनौरी चा गमछी में लिट्टी बोटर के झारे लगले. हमरा के चोखा बनावे के काम देले रहे लोग. आलू छिलत-छिलत हम रामखेलावन चा से पूछनी, अगर बिहार में किसान आंदोलन भइल रहित तs का एतना हूल गड़ापा भइल रहित ? हमार सवाल पs रामखेलावन चा कुछ सोचे लगले. उनका के चुप देख के भुनेसर चा, परमेसर चा, गनौरी चा कहले, हं ! हं ! बोलs, लइका वाजिबे सावल पूछले बा. रामखेलावन चा कहले, बिहार के किसान तs भारत के तकदीर बदल देले. ई बिहार के किसाने के महिमा बा कि गांधी जी महात्मा गांधी कहाये लगले. बिहार के किसान खातिर गांझीजी के शुरु कइल सत्याग्रह आंदोलन पूरे देश के आजादी के लड़ाई के हथियार बन गइल.
बिहार के किसान आंदोलन के इतिहास में बहुत ऊंचा असथान हासिल बा. महान किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती तs रहे वला रहन गाजीपुर के लेकिन उनकर किसान आंदोलन के जमीन बनल रहे बिहार. बिहारे देश में पहिला राज्य रहे जहां जमींदारी प्रथा के उन्मूलन कइल गइल रहे. बिहार के किसान आंदोलन से ही देश में भूमि सुधार के रास्ता तैइयार भइल रहे. अगर आज के दौर में ई किसान आंदोलन अगर बिहार में भइल रहित तs अइसन उपद्रव ना होइत. जेपी आंदोलन के समय भी बिहार देखवले रहे कि शांतिपूर्ण आंदोलन से बदलाव कइसे कइल जाला.



बिहार के नामी किसान आंदोलन
घीव में डूबल लिट्टी . आलू-भंटा के चोखा. आड़ा के मधीम आंच. खाए में माजा आ गइल. खात-खात रामखेलावन चा कहले, चम्पारण के किसान राज कुमार शुक्ला जी ही गांधी जी के बिहार बोलवले रहन. ओह घरी अंग्रेज तीनकठिया प्रथा लागू कइले रहन सs . सभ किसान के अपना एक बिगहा खेत में से तीन काट्ठा में नील के खेती कइल जरूरी रहे. जे बात ना माने ओकरा के अंग्रेज बहुत सतावत रहन सs. 1917 में चम्पारण अइला के बाद गांधी जी किसान के हक में सत्याग्रह आंदोलन शुरू कइले. एकरा बाद उनका के महात्मा गांधी कहे जाए लागल. स्वामी सहजानंद सरस्वती आज से 92 साल पहिले किसान सभा के स्थापना कइले रहन. सहजानंद सरस्वती प्रांतीय किसानसभा के अध्यक्ष रहन तs श्रीकृष्ण सिंह ओकर महामंत्री रहन. दूनो जना मिल के जमींदारी के जुलुम के खिलाफ आंदोलन चलवलस लोग. आजादी के बाद जब श्रीकृष्ण सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बनले तब 1950 में ऊ राज्य में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू कइले. ई बिहार के किसान आंदोलन के बहुत बड़ सफलता रहे. बिहार देश में पहिला राज्य रहे जहां जमींदारी खतम करे वला कानून लागू कइल गइल रहे.

दिल्ली के किसान आंदोलन
रामखेलावन चा के बात सुन के परमेसर चा कहले, समय केतना बदल गइल बा. किसान के गति-मति भी बदल गइल बा. किसान आंदोलन के नांव पs दिल्ली में जवन तोड़फोड़ अउर हिंसा भइल ओकरा के कवनो तरीका से जाइज ना कहल जा सकेला. किसान आंदोलन के अगुआ रहल योगेन्दर जादव के माफी मांगे के पड़ल. 26 जनवरी के दिन टैक्टर परेड में जवन हिंसा भइल ओकरा खातिर ऊ मांफी मंगले बाड़े. अगर कृषि कानून किसान के खिलाफ बा तs ओकरा के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देल जा सकेला. अगर कोर्ट के नजर में ई कृषि कानून, किसान के हकामारी करे वला होई तs ऊ एकरा के रद्द भी कर सकेला. प्रजातंत्र में शांतिपूर्ण विरोध के ही सही कहल जा सकेला. अगर कवनो आंदोलन से आम-अवाम के दिक्कत अउर परेशानी होई तs ओकर केहू समर्थन ना कर सकेला. सरकार भी अपना बात पs अड़ल बिया. लेकिन अड़ला भिड़ला से केहू के फैदा ना होई. अगर बात से सुलह नइखे होत तs फैसला कोर्ट पs छोड़ देवे के चाहीं. बतकही होते रहे कि भुनेसर चा कहले, खाली बतिइबे मत करs जा, घीव अनघा बा, लिट्टी के फार-फार के घीव पियाअव लोग. तब देखs एकर माजा. भुनेसर चा के बात सुन के सभे ठठा के हंस देल.
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