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Bhojpuri: जब कांग्रेसी मुख्यमंत्री संपूर्णानंद लिखलन सोशलिस्ट पार्टी क घोषणा-पत्र

प्रजा सोशलिस्ट पार्टी अगले चुनाव क तइयारी करत रहल. पार्टी के घोषणा-पत्र क जरूरत रहल. सबके दिमाग में रहल कि घोषणा-पत्र नरेंद्र देव खुद लिखिहय. ओनके जेतना विचारवान, नीतिवान अउर विद्वान ओह समय पार्टी में दूसर केव नाहीं रहल. लेकिन आचार्य जी क तबीयत थोड़ी खराब चलत रहल. ओनसे पूछल गयल कि घोषणा-पत्र क काम कहा तक पहुंचल त उ कहलन कि संपूर्णानंद घोषणा-पत्र लिखत हउअन. इ बात सुनि के सबकर कान खड़ा होइ गयल.

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राजनीति में अइसन भी होइ सकयला कि दूसरे पार्टी क नेता अपने विरोधी पार्टी क घोषणा-पत्र लिखय? उ भी मुख्यमंत्री रहते? आज के जमाने में न त इ संभव हौ अउर न अतीत क इ घटना आज केहू के गले उतरी. लेकिन इ घटना सौ फीसदी सही हौ. उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद आचार्य नरेंद्र देव के कहले पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी क घोषणा-पत्र लिखले रहलन. इ बात तब क हौ जब नरेंद्र देव कांग्रेस से अलग होइ गयल रहलन. फिर सोशलिस्ट पार्टी क जे.बी. कृपालानी के नेतृत्व वाली किसान मजदूर प्रजा पार्टी के साथ विलय भयल अउर 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी अस्तित्व में आयल.

आजादी के बाद पं. गोविंद वल्लभ पंत उत्तर प्रदेश क पहिला मुख्यमंत्री बनलन. लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 1954 में ओन्हय केंद्रीय मंत्रिमंडल में बोलाइ लेहलन. एकरे बाद 28 दिसंबर, 1954 के डाॅ. संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री बनलन. संपूर्णानंद नेहरू विरोधी खेमा क मानल जायं. लेकिन ओह समय उत्तर प्रदेश क राजनीति बनारस से तय होय, अउर संपूर्णानंद बनारस क सबसे कद्दावर कांग्रेसी रहलन, जवने के नाते ओन्हय मजबूरन मुख्यमंत्री बनावय के पड़ल.

प्रजा सोशलिस्ट पार्टी अगले चुनाव क तइयारी करत रहल. पार्टी के घोषणा-पत्र क जरूरत रहल. सबके दिमाग में रहल कि घोषणा-पत्र नरेंद्र देव खुद लिखिहय. ओनके जेतना विचारवान, नीतिवान अउर विद्वान ओह समय पार्टी में दूसर केव नाहीं रहल. लेकिन आचार्य जी क तबीयत थोड़ी खराब चलत रहल. ओनसे पूछल गयल कि घोषणा-पत्र क काम कहा तक पहुंचल त उ कहलन कि संपूर्णानंद घोषणा-पत्र लिखत हउअन. इ बात सुनि के सबकर कान खड़ा होइ गयल.

संपूर्णानंद समाजवादी सोच क रहलन, समाजवाद शीर्षक से एक किताब भी लिखले हउअन, 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में भी ओनकर काफी योगदान रहल. लेकिन एह समय उ उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सरकार का नेतृत्व करत रहलन. नरेंद्र देव के साथ के लोगन के इ बात अटपटा लगल कि विरोधी पार्टी के आदमी के घोषणा-पत्र लिखय क जिम्मेदारी आचार्य जी काहें देहलन. उ घोषणा-पत्र के साथ न्याय कइसे कइ सकयलन. लेकिन आचार्य जी क निर्णय रहल त केव मुंह नाहीं खोललस. तीन महीना बाद हाथे से लिखल कगजे क बंडल नरेंद्र देव के पास पहुंचल. इ बंडल संपूर्णानंद भेजले रहलन. नरेंद्र देव उ बंडल बिना देखले सीधे छपय बदे भेजि देहलन. ओही घोषणा-पत्र पर पार्टी 1957 क आम चुनाव लड़लस. उत्तर प्रदेश विधानसभा में 44 सीट के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर रहल. जबकि लोकसभा में 19 सीट के साथ कांग्रेस अउर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बाद तीसरे नंबर पर.

राजनीति में जहां विरोधी एक-दूसरे क गरदन तक काटय बदे तइयार हयन, उहां भरोसा क अइसन मिसाल दूसर देखय के नाहीं मिलत. संपूर्णानंद वाकई भरोसा वाला आदमी रहलन. जनता क भी ओनके ऊपर भरोसा रहल. उ कभौ जनता के बीच वोट मांगय न जायं. पर्चा भरि देय अउर चुनाव जीति जायं. बनारस शहर दक्षिणी सीट से उ दुइ दइया विधायक बनलन. पहिली बार 1952 में फिर 1957 में. हलांकि अजादी के पहिले भी दुइ दइयां 1926 अउर 1937 में उ विधानसभा बदे निर्वाचित भयल रहलन, अउर शिक्षामंत्री, वित्तमंत्री गृहमंत्री रहि चुकल रहलन.

संपूर्णानंद बदे राजनीति जनता के सेवा के अलावा कुछ नाहीं रहल. पूरे प्रदेश में ओनकर इहय निर्विवाद छवि रहल. ओनके एही छवि के कारण ओन्हय राज्य क मुख्यमंत्री बनावल गयल रहल. लेकिन नेहरू के ओनके छवि से चिढ़ भी रहल, जवने के नाते उ चंद्रभानु गुप्ता अउर कमलापति के मदद से संपूर्णानंद के उत्तर प्रदेश के राजनीति से दूर कइ देहलन. सात दिसंबर, 1960 के संपूर्णानंद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देइ देहलन. फिर 16 अप्रैल, 1962 के ओन्हय राजस्थान क राज्यपाल नियुक्त कयल गयल, जहां उ 16 अप्रैल, 1967 तक काबिज रहलन. फिर बनारस अइलन अउर राजनीति से संन्यास लेइ लेहलन.

संपूर्णानंद खाटी बनारसी रहलन अउर भांग क शौकीन भी. हर शाम भांग छानय. राजस्थान क राज्यपाल बनले के बाद भी बनारस क लोग भांग लेइ के उहां बराबर पहुंचल रहयं.

बनारस के विकास में संपूर्णानंद क बहुत योगदान रहल हौ. गंगा किनारे पक्का घाट क पुनर्निर्माण होय, चाहे संस्कृृत विश्वविद्यालय क स्थापना, सब संपूर्णानंद क ही देन हौ. संपूर्णानंद बनारस क अधिकारिक नाम काशी रखय चाहत रहलन, लेकिन जवाहरलाल नेहरू दबाव बनाइ के वाराणसी कराइ देहलन. राज्य में हिंदी के बढ़ावा देवय में अउर हिंदी के अधिकारिक भाषा बनावय में संपूर्णानंद क बड़ा योगदान रहल. महात्मा गांधी क पहिली जीवनी कर्मवीर गांधी संपूर्णानंद ही लिखले रहलन.

अजादी मिलले के बाद 1948 के दौर में बनारस में कांग्रेस क दुइ गुट रहल. एक गुट रघुनाथ सिंह क अउर दूसर गुट कमलापति त्रिपाठी क. राज्य कमेटी में भी दुइ गुट रहल. एक गुट पुरुषोत्तम दास टंडन क अउर दूसर गुट रफी अहमद किदवई क. टंडन गुट में गोविंद वल्लभ पंत, संपूर्णानंद अउर चंद्रभानु गुप्ता रहलन. बाकी नेता किदवई गुट में. बाद में संपूर्णानंद क पत्ता काटय बदे चंद्रभानु गुप्ता अउर कमलापति एक होइ गइलन. जबकि संपूर्णानंद काशी विद्यापीठ में कमलापति के पढ़उले रहलन अउर कमलापति भी ओन्हय आपन गुरु मानय. लेकिन राजनीति में कब चेला गुरु बनि जाई, एकर अंदाजा लगाइब कठिन हौ.

अध्यापन, लेखन अउर संपादन संपूर्णानंद क प्रिय विषय रहल. शुरू में वृृंदावन अउर बीकानेर में पढ़उलन. फिर बाबू शिवप्रसाद गुप्त के आग्रह पर बनारस लौटि अइलन अउर ज्ञानमंडल प्रकाशन क काम देखय लगलन. इहां मर्यादा नामक पत्रिका क संपादन कइलन. फिर अंग्रेजी दैनिक टूडे क कुशल संपादन कइलन. शिवप्रसाद गुप्ता के ही आग्रह पर काशी विद्यापीठ में पढ़ावय लगलन. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)