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Bhojpuri Special: भरल मीटिंग में इंदिरा गांधी के विरोध कइले रहन मासूम रजा, मुस्लिम होके भी लिखलें महाभारत!

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राही मासूम रजा (Rahi Masoom Raza) विचारधारा से वामपंथी, पढ़ल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से. बाकिर गुन अइसन कि सभे मुग्ध रहे. त डॉ रजा बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहले ह.

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लोकप्रिय सीरियल “महाभारत” में “ माता श्री”, “पिता श्री”, “भ्राता श्री” और “भांजे” के संबोधन जरूरे रउवां सभे के याद होई. एह पवित्र संबोधन के लुप्त हो चुकल परंपरा के फेर से जीवंत कइले मशहूर लेखक राही मासूम रजा. महाभारत सीरियल लिखला का बाद एगो इंटरव्यू में राही मासूम रजा कहले कि हम अतीत के वर्तमान से जोड़े खातिर महाभारत सीरियल के लिखे के जिम्मा लिहनीं. हम बतावल चहनीं कि चार हजार साल पुरान घटना आधुनिक युग संगे कइसे कनेक्ट हो सकेला. बीआर चोपड़ा 104 एपीसोड वाला एह सीरियल के बनावला का बाद कहले कि जब डॉ रजा महाभारत के पहिला एपीसोड के स्क्रिप्ट लिखि के हमरा के सुनावत रहले त पहिला लाइन हमरा के मुग्ध क दिहलसि- “मैं समय हूं.”

पूर्वी उत्तर प्रदेश में जनम लेबे वाला डॉ रजा कहत रहले ह कि गंगा जी हमरा नस में बाड़ी. हमरा भीतर बहतारी. लोग हिंदू- मुसलमान के बात कहेला. बाकिर डॉ रजा त मुसलमान रहले आ ऊ हिंदू धर्म के महान धर्मग्रंथ महाभारत में अइसन डूबि के स्क्रिप्ट आ डायलॉग लिखले कि दर्शक पर जादू हो गइल. विचारधारा से वामपंथी, पढ़ल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से. बाकिर गुन अइसन कि सभे मुग्ध रहे. त डॉ रजा बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहले ह. उनुकरा विराट व्यक्तित्व आ कृतित्व के मूल्यांकन जतने कइल जाउ, अधूरे रही.

राही मासूम रज़ा ( जन्म- 1 सितंबर, 1927- मृत्यु- 15 मार्च 1992) के जनम गाजीपुर जिला के गंगौली गांव में भइल रहे आ प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एगो मुहल्ला में भइल रहे. जब ऊ 11 साल के रहले त उनुका टीबी (ट्यूबरकुलोसिस) रोग हो गइल. फेर पोलियो हो गइल. एह कारन उनकर पढ़ाई कुछ साल खातिर छूटि गइल, बाकिर इंटरमीडियट कइला का बाद ऊ अलीगढ़ आ गइले आ एइजा से एमए कइला का बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. कइले. बचपन में पोलियो झेलला के कारण चलत का बेर हलका सा लंगड़ात रहले ह.

पीएच.डी. कइला के बाद डॉ राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गइले. ओही घरी ऊ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बनि गइले. विचारधारा साम्यवादी रहे. जबकि उनुकर पिता बशीर हसन आबिदी कांग्रेसी रहले. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी डॉ रजा के मन ना लागल. काहें से कि ऊ नान कंप्रोमाइजिंग (हर बात के ना माने वाला) रहले ह. एकरा कारन अलीगढ़ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में उनुकर कई गो विरोधी हो गइल रहे लोग. नतीजा ई भइल कि उनुका अलीगढ़ छोड़े के परल. करीब 40 साल उमिर होत- होत 1967 में ऊ बंबई आ गइले. शुरू में बंबई में उनुका बहुत दिक्कत झेले के परल. एइजा हिंदी के दूगो लेखक उनुकर मदद कइल लोग- “धर्मयुग” के संपादक धर्मवीर भारती आ “सारिका” के संपादक कमलेश्वर. ई दूनो पत्रिका टाइम्स आफ इंडिया समूह के रहली सन.

अलीगढ़ में ही उनुकर मुलाकात नय्यरा जी से भइल आ आखिरकार डॉ रजा आ नय्यरा जी शादी क लिहल लोग. बंबई में साहित्य लेखन के साथे ऊ फिल्मन खातिर पटकथा/ संवाद भी लिखे लगले. फिल्म से उनुकरा शुरू से प्यार रहे. छात्र जीवन में डॉ रजा खूब फिल्म देखत रहले. एगो फिल्म के तीन- तीन बार देखसु आ फिल्म पर नोट लिखसु. त बंबई में उनुका स्ट्रगल में दूगो हिंदी साहित्यकारन के साथ रहे. दूनो लोग कहानी लिखे के पहिलहीं एडवांस पेमेंट क देत रहल लोग. एसे डॉ रजा के आर्थिक स्थिति बिगड़े ना पावे. तबो हाथ तंग त रहबे कइल. बाद में उनुकर दोस्ती बीआर चोपड़ा आ राज खोसला नियर बडका फिल्मकारन से हो गइल. ओह लोगन के फिल्म डॉ रजा लिखे लगले. कुछे दिन बाद उनुकर गिनती चोटी के पटकथा लेखक के रूप में होखे लागल.

ई ढेर लोग ना जानत होई कि डॉ रजा, सन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद भइल वीर अब्दुल हमीद के जीवनी- “छोटे आदमी की बड़ी कहानी” लिखले बाड़े. “आधा गांव”, “नीम का पेड़”, “कटरा बी आर्ज़ू”,” टोपी शुक्ला”, “ओस की बूंद”, “दिल एक सादा कागज” उनकर प्रसिद्ध उपन्यास हउवन स. राही मासूम रजा का बारे में एगो घटना सुनीं- 'फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन' एक बार इंदिरा गांधी आ इमर्जेंसी के समर्थन में एगो प्रस्ताव पास करवावे के कोसिस कइलस. राही मासूम रज़ा अकेले लेखक रहले जे एकर विरोध कइले. बाकी सब लोग इमरजेंसी के समर्थन कइल, डॉ रजा विरोध में खड़ा रहले. सब लोग कहल कि रउवां विरोध में मीटिंग से बाहर चलि जाईं. त डॉ रजा कहले कि ना मीटिंग में रहब आ इमर्जेंसी के विरोध करब.

डॉ रजा के रिश्तेदार नदीम हसनैन कहत रहलन ह कि जब डॉ रजा कहीं बाहर जात रहले ह त हमेशा शेरवानी आ अलीगढ़ी पाजामा पहिरत रहले ह. उनकर शेरवानी कभी रंगीन ना रही. हमेशा ऊ क्रीम कलर के शेरवानी पहिरत रहले ह. चश्मा हमेसा काला रही. हालांकि उनुकरा आंख में कौनो समस्या ना रहल ह. ऊ कभी चौकी/पलंग भा चटाई पर ना बइठत रहले ह, खड़ा होके आपन रचना पढत रहले ह. उनुकर लगाव मनुष्य आ मनुष्यता से रहल ह. एगो समय ऊहो रहे जब डॉ रजा “आफ़ताब नासिरी” के नाम से जासूसी उपन्यास लिखत रहले. बाकिर ई बात बंबई आवे के पहिले के ह.

राही के बेटा नदीम खां, खुद एगो बड़ सिनेमा फ़ोटोग्राफ़र रहि चुकल बाड़े, ऊ बतावत रहले ह कि बंबई में बैंड स्टैंड में जहां ऊ लोग रहत रहे, ओइजा उनुकर छोट भाई रहे लागल. ऊ अढाई कमरा के फ़्लैट रहे. डॉ रजा के ख़ास बात ई रहे कि उनकर दरवाज़ा 24 घंटे खुला रहत रहे. दुपहरिया में दस्तर-ख़्वान बिछा दिहल जात रहल ह. जे आइल होखे 10 लोग होखे चाहे 15 लोग, सबका के खाना खियावल जात रहल ह. माने रोज अधिके खाना बनी. पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में नदीम खां के सहपाठी मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह आ ओमपुरी भी कई बार कवनो बहाना से खाना खाए आ जात रहल ह लोग. फिल्म निर्माता लोग दोसरा लेखकन के आपन फिल्म लिखे खातिर होटल में कमरा बुक क देत रहल ह, शराब के इंतजाम क देत रहल ह. बाकिऱ डॉ रजा होटल में ना जइहें. अपना घरहीं रहि के लिखत रहले ह. अपना घर के हाल में तकिया पीठ पर क के लेट जात रहले ह आ लिखे लागत रहले ह. ऊ एके साथे चार- पांच गो स्क्रिप्ट पर काम करत रहले ह. लोग आवता- जाता बाकिर उनुकर लेखन निरंतर चलत रही. उनुका पत्नी के कव्वाली सुने के शौक रहल ह. ऊ कव्वाली के कैसेट बजावत रहिहें बाकिर डॉ रजा लिखे में डूबल रहिहें. कौनो चीज के उनुका पर असर ना परी.
शुरू में महाभारत लिखे खातिर राही मासूम रजा तेयार ना भइले. कुछ लोग डॉ रजा के नांव पर विरोध भी कइले. अगिले दिने डॉ रजा बीआर चोपड़ा के फोन कइले- चोपड़ा साहब, महाभारत के स्क्रिप्ट हम्हीं लिखबि. बीआर चोपड़ा कहि चुकल बाड़े कि राही मासूम रजा भारतीय संस्कृति आ सभ्यता के बहुत बड़ अध्येता हउवन. ओह घरी डॉ रजा जीयत रहले. अंतिम दिनन में बंबई में भीतर से अकेला महसूस करत रहले. उनुका लागे कि सब अपना काम से उनुका लगे आवता. काम भइल आ ऊ आदमी नापाता. प्रेम आ चुंबकीय संबंध खतम होत जाता. एही पर ऊ एगो कविता लिखले-
खड़ी दोपहर दरवाजे पर

मन के अंदर रात

गूंगा आंगन, गूंगे कमरे

करे न कोई बात

किस आवाज की टहनी पर हम

दिल की बात उतारें

किस डाली पर झूलें

किस पोखर को पत्थर मारें

सारे रस्ते याद हैं मुझको

हम कैसे खो जाएं.......

(लेखक विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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