Bhojpuri: “चाहे कतनो दिक्कत होखे, भाई पारस के तs पढ़ाइब खगड़िया में !”

रामविलास पासवान देश अउर दुनिया में खगड़िया के नांव रोशन कइले रहन. खगड़िया में ही रामविलास पासवान के पढ़ाई-लिखाई भइल रहे. जात-पात , भेदभाव अउर गरीबी से लड़ के रामविलास जी जवन ऊंचाई पs पहुंचले ऊ अचंभा से कम नइखे. बहुत मेहनत से लोजपा के खाड़ा कइले लेकिन आज आपसी लड़ाई में पाटी टूट फूट के बरबाद हो रहल बा.

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खगड़िया के राजेनदर चौक पs एगो बहुत पुरान कपड़ा के दोकान रहे. दोकान के मालिक बालगोबिंद अब बुजर्ग हो चलल बाड़े. मास्टर कैलाशनाथ आज बहुत दिन पs कपड़ा खरीदे अइले तs बालगोविंद उनके से बतियावे लगले. एने ओने के बात बतिवला के बाद रामविलास पासवान के चर्चा होखे लागल. चर्चा होखो काहे ना ! रामविलास पासवान देश अउर दुनिया में खगड़िया के नांव रोशन कइले रहन. खगड़िया में ही रामविलास पासवान के पढ़ाई-लिखाई भइल रहे. बालगोबिंद कहले, का माट साहेब ? आज लोजपा के हाल देख के रामविलास जी के आतमा जरूर कचोटत होई. जात-पात , भेदभाव अउर गरीबी से लड़ के रामविलास जी जवन ऊंचाई पs पहुंचले ऊ अचंभा से कम नइखे. बहुत मेहनत से लोजपा के खाड़ा कइले लेकिन आज आपसी लड़ाई में पाटी टूट फूट के बरबाद हो रहल बा. मास्टर कैलानाथ कहले, आज पशुपति कुमार पारस अउर चिराग पासवान में घमासान मचल बा. लेकिन एक जमाना उहो रहे जब रामविलास जी पशुपति पारस के लइका नियन मानत रहन.

पढ़ाई खातिर कष्ट ही कष्ट
दोकान में गंहकी बढ़ गइले तs बोलगोबिंद अउर मास्टर कैलाशनाथ दुमंजिला पs आ गइले. बालगोबिंद मलकिनी के हांक लगा के चाह बनावे के भी कह देले. मास्टर कैलाशनाथ कहले, कुछ दिन पहिले हम प्रदीप श्रीवास्तव के लिखल किताब- रामविलासा पासवान : संकल्प, साहस और संघर्ष पढ़ले रहीं. ई किताब में रामविलास पासवान के जीवन के बहुत रोचक कहानी लिखल गइल बा. रामविलास पासवान के जनम खगड़िया जिला के शहरबन्नी गांव में भइल रहे. शहरबनन्नी गांव चार नदी के बीच में बसल बा. गांव में प्राइमरी अस्कूल भी ना रहे. रामविलास पासवान के बाबूजी जामुन दास बहुत पूजापाठ करे वला अदिमी रहन. नियम धरम से आपन खाना अपने बनावत रहन. रामचरित मानस के चौपायी सुना के जब ऊ रामकथा सुनावत रहन तs सुने वला मंत्रगुग्ध हो जात रहे. जामुन दास आपन लइका रामविलास के बढ़ावे के बीड़ा उठवले. बहुत कष्ठ उठा के रामविलास पासवान के पढ़ाई शुरु भइल. दू नदी के पार कइला के बाद अस्कूल जाये के पड़त रहे. मेघौना सरकारी अस्कूल से मिडिल तक के पढ़ाई भइल. एकरा बाद हाईअस्कूल के पढ़ाई के सावल आइल. अठवां के पढ़ाई खातिर खगड़िया शहर जाये के रहे. साधारण दलित परिवार के लइका के खगड़िया शहर में रह के पढ़ल बहुत मोसकिल बात रहे.

स्कॉरलशिप के पइसा से पढ़ाई
मास्टर कैलाशनाथ कहानी शुरु कइले. ओह घरी दलित समुदाय के लइकन के शहर में रह के पढ़े खातिर बिहार सरकार कल्याण छात्रावास बनवले रहे. (ई बेवस्था आजो बा) छात्रावास में रह के पढ़े वला छात्र के 10 रोपेया के सकौलरशिप मिलत रहे. छात्रावास में सरकार देने से रसोइया बहाल रहे. लइका लोग के घर से चाउर-दाल देवे के पड़त रहे. तेल, मसाला, सब्जी के खरच 10 रोपेया एसकौलरशिप में से कटत रहे. खगड़िया में कल्याण छात्रावास के स्थिति ठीक तs ना रहे लेकिन रामविलास पासवान के मन में पढ़े के लालसा जाग गइल रहे. ऊ हर तकलीफ झेल के भी पढ़े खातिर तइयार रहन. रामविलास पासवान के नांव खगड़िया के प्रिंस ऑफ वेल्स हाईस्कूल के अठवां कलास में लिखाइल. ई सरकारी हाईअस्कूल रहे. रामविलास पासवान छात्रावास में रह के मन लगा के पढ़े लगले. ऊ जब नउंवा कलास में गइले तs उनका के छात्रावास के पिरफैक्ट बना दिहल गइल. दू-तीन साल के बाद एसकौलरशिप दस रोपेये से बढ़ के बीस रोपेया हो गइल. रामविलास पासवान जब हायरसेंकेंडरी (इंटर) में रहन तs टूशन पढ़ा के ऊपरी अमदनी भी करे लगले.

रामविलास पासवान के नजर में पशुपति पारस
मास्टर कैलाशनाथ तनी दम धर के कहले, रामविलास पासवान भिरी कई तरह से थोड़मोड़ पइसा आवे लागल. एसकौलरशिप बीस रोपेया हो गइल रहे. टूशन पढ़ावे से भी दस रोपेय महीना मिलत रहे. घर से चाउर-दाल बेसी आवत रहे. मेस के खरचा से बांच जाए तs ओकरा के बेंच के नगद पइसा बना लेस. 1960-61 में रामविलास पासवान जब खगड़िया के कोशी कौलेज में बीए के पढ़ाई खातिर नांव लिखवले तs उनका मन में अपना घर-परिवार के फिकिर होखे लागल. तब ले उनकर छोट भाई पशुपति कुमार पारस मिडिल स्कूल पास कर लेले रहन. ऊ पशुपति पारस के बहुत मानत रहन. ऊ सोचले कि चाहे जेतना भी दिक्त होखे, पशुपति पारस के भी खगड़िया में राख के पढ़ाइब. ऊ गांव से पारस के खगड़िया ले अइले. अपना साथे छात्रावास में रखले. पारस के भी नांव हाईअस्कूल में लिखाइल. पारस के रहन-सहन, खान-पान के सभ खरचा रामविलास पासवान उठावत रहन. ऊ पारस के एतना दुलार से राखत रहन कि उनका घर के इयाद ना आवे.

भाई हो तो रामविलास पासवान जैसा
रामविलास पासवान के अपना दूनो भाई से अटूट प्यार रहे. बड़ भाई के कहल बात पशपुति पारस अउर रामचनदर पासवान खातिर बरह्मा के लकीर रहे. ऊ अपना दूनो भाई लोग के राजनीति में आगा बढ़ावे खातिर कइसनो आरोप के परवाह ना कइले. जवन भी कइले, सीना ठोक के कहले. 2015 में एक टीबी पोरगराम में रामविलास पासवान से सवाल पूछल गइल, आप पर परिवारवाद का आरोप है, आप खुद केन्द्रीय मंत्री हैं, आपने एक भाई को विधायक बनावाया, एक भाई को संसद बनवाया, पुत्र को भी संसद बनाया, ऐसे में जनता के बीच क्या संदेश जाएगा ? तब रामविलास जी जबाब देले, मैं राजनीति में ऊपर चढ़ कर महल में रहूं, और अपने भाई को खेत में कम करने के लिए छोड़ दूं ? क्या आप यही चाहते हैं ? मैं अपने भाइयों को बेहाल नहीं छोड़ सकता. ये काम मैं नहीं कर सकता. ये काम सिर्फ लालू जी ही कर सकते हैं. एकरा बादो रामविलास जी चुप ना भइले. कहले, पशुपति पारस के हम एक बेर 1977 में टिकट दियावे में मदद कइनी. लेकिन एकरा बाद ऊ अपना मेरिट से सात बेर चुनाव जीतले. अगर जनता के समरथन ना रहित तs पारस का सात बेर चुनाव जीत सकत रहन ? अगर परिवार में मेरिट वला आदिमी के आगा बढ़े के मौका देनी तs का गलती कइनी ? एतना कह के मास्टर कैलाशनाथ रुक गइले. तब बोलगोबिंद कहले, हां ई बात तs सहिये बा कि रामविलास पासवान अपना भाई लोग के बहुत आगा बढ़वले. के का कही, एकर तनिको परवाह ना कइले. आज सवारथ के जमाना में अइसन तेयाग मोसकिल बा. (अशोक कुमार शर्मा वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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