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Bhojpuri Special: आखिर काहे कवनो बाप अपना बेटा के नइखे सिखावल चाहतs खेती किसानी?

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जे समझदार बा, एजुकेटेड बा, टैलेंटेड बा उ नोकरी करी, बिजनेस करी बाकिर खेती ना करी. हमनी के देश के पहचान गाँव बा बाकिर गाँव में जीये-मरे वाला युवा के जल्दी हाड़े हरदी ना लागी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 19, 2021, 10:09 PM IST
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भारत कृषि प्रधान देश ह बाकिर टू वन जा टू आ टू टू जा फ़ोर वाला जेनरेशन के ई पते नइखे कि गेहूँ आ धान के बाल में का अंतर बा. मुरई आ गाजर जमीन के ऊपर लटकेला कि नीचे. कादो भारत के आत्मा गाँव में बसेला आ भारत के भविष्य ‘यूथ’ शहर में.

कवनो बाप के मंजूरे नइखे कि ओकर बेटा गाँव में रहो आ खेती-किसानी सीखो. पढ़-लिख गइल बा त गाँव में रहल अउरो गुनाह बा.
त गाँव में के रही? जे बेकार बा, अनपढ़ बा, लाचार बा आ बेरोजगार बा. त खेती के करी? जे बेकार बा, अनपढ़ बा, लाचार बा आ बेरोजगार बा.

जे समझदार बा, एजुकेटेड बा, टैलेंटेड बा उ नोकरी करी, बिजनेस करी बाकिर खेती ना करी. हमनी के देश के पहचान गाँव बा बाकिर गाँव में जीये-मरे वाला युवा के जल्दी हाड़े हरदी ना लागी. उ तिलकहरू लोग खातिर तरस के रह जाई.
सबका पता बा कि आदमी नोट ना खाई. खाई रोटिये. बाकी रोटी पैदा करे वाला सबसे बुरबक, सबसे गँवार. अंडरस्टीमेटेड ...निकम्मा.


अद्भुत देश बा ई.

देश के राजधानी दिल्ली में किसान बिल के लेके लगभग डेढ़ महिना से आन्दोलन चलsता. टीवी प डिबेट चलsता. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचल बा. चारो तरफ खेती-खेती, किसानी-किसानी, किसान बिल के शोर सुनाई देता त हमार ध्यान शहर में भारी बस्ता के बोझ ढोवत लइकन प गइल ह. आपनो बचपन ईयाद आइल ह. जदि गाँव में ना रहल रहितीं त पते ना चलित कि घेंवड़ा छान्ही प फरेला आ कटहर गाछ पर.
मतलब एजुकेशन में खेती के लेके कवनो सीरियसनेस नइखे भले भारत कृषि प्रधान देश ह.

एजुकेशन, हेल्थ, राजनीति, सिनेमा, क्राइम सबके कवर करे वाला पत्रकार, अखबार आ टीवी पर कार्यक्रम देखले-सुनले बानी बाकिर ओह सीरियसनेस के साथ खेती के लेके कुछ नइखीं देखले भले भारत कृषि प्रधान देश ह.
शहर त शहर हम गाँव में भी युवा लोग के पोलिटिक्स, क्रिकेट, सिनेमा प गॉसिप भा बतकही भा डिबेट करत देखले-सुनले बानी बाकिर खेती प ना भले भारत कृषि प्रधान देश ह.
देश के आत्मा गांव में बसेला आ किसान के आत्मा दहार, सुखार, पाला भा कर्ज के सामना करत-करत फांसी के फंदा प भले भारत कृषि प्रधान देश ह.

साँचो, ई देश कृषि प्रधान ह. लोकतंत्र के मंदिर से हर साल बजट में कृषि क्षेत्र के विकास आ किसान के कल्याण अउर गांव के विकास खातिर लाम-चाकर घोषणा होला, करोड़ो-अरबो में रुपयो आवंटित कइल जाला बाकिर आजो गांव में लइका जवान भइल ना कि दिल्ली, सूरत, पंजाब, मुंबई जाये के तइयारी क लेला. काहे भाई ?

आज ले कृषि, एह कृषि प्रधान देश में प्रतिष्ठा के विषय काहे ना बन पावल ? कमाई के विषय काहे ना बन पावल ?
कबो कहल जात रहे कि -
उत्तम खेती मध्यम बान।
निषिद चाकरी भीख निदान।।

घाघ जी कहले रहलें कि खेती सबसे अच्छा काम ह. व्यापार मध्यम ह, नौकरी निषिद्ध ह आ भीख माँगल त सबसे बुरा काम ह.
त ई सब कब आ कइसे उलट गइल. नोकरी सबसे बढ़िया कब बन गइल जवना के बारे में अक्सर बूढ़-पुरनिया कहेला कि नोकरी माने कुक्कुर के तरह दुम हिलावल.
का रउरा ई नइखे लागत कि ई नोकरी प्रधान देश हो गइल बा. हर बाप अपना औलाद के नोकरी पावे खातिर पीछे पड़ल बा. बचपन से नोकरे बने खातिर उकसावल, जोश जगावल आ पढ़ावल-लिखावल जाता.

कबो मैथिली शरण गुप्त जी कहले रहीं कि –
शिक्षे तुम्हारा नाश हो, जो नौकरी के हित बने
लेकिन इहाँ त गाँव के गाँव खाली बा. नोकरी खातिर सभे गाँव से शहर का ओर भागल बा आ सरकार सूतल बा आ सूतत रहल बा. धन्य बा ई कृषि प्रधान देश.

हमरा गजल के कुछ शेर बा–
जब से शहर में आइल तब से बा अउँजियाइल
रोटी बदे दुलरुआ खूंटा से बा बन्हाइल

गदहो के बाप बोले, दिनवो के रात बोले
सुग्गा बनल ई मनई पिंजड़ा में बा पोसाइल

शूगर बढ़ल रहत बा, बी.पी. चढ़ल रहत बा
ग़जबे के जॉब बाटे किडनी ले बा डेराइल

पेटवे से बा कनेक्शन एह जॉब के, एही से
सहमल बा शेर अउरी गीदड़ बा फनफनाइल
एह सब मजबूरी, विवशता के बाद भी खेती से मोहभंग बा आ नोकरी से मोह.

ध्यान से देखीं. हर दुआर से बैल गायब बाड़न स आ आदमी शहर में जाके कोल्हू के बैल बनल बा. कोरोना काल में ई लोग-बाग के सबसे बेसी एहसास भइल ह.
साथहीं शहर में जहर खात-खात ई एहसास भइल ह कि हमनी कि आपन खेतियो खराब कर लेले बानी जा. यूरिया आ पोटास छीट-छीट जहर उगावत बानी जा आ जहरे खात बानी जा.
बैल गायब त दुआर प गोबर वाला खाद गायब. उ खेती गायब. भारतीय खेती गायब. जैविक खेती गायब. जवना में गोबर गौमूत्र के मिटटी में डलला से करोड़ो सूक्ष्म जीव के पेट भरे, मिट्टी के उर्वरा क्षमता बढ़े आ अमृत पैदा होखे. अब जाके धीरे-धीरे फेर लोग के आँख खुलता, जब छिहत्तर गो बेमारी धरे लागल बा.

दुनिया के नक्शा प नज़र डालल जाव त उपज के मामला में ब्राजील दुनिया में सबसे अधिका अन्न उपजावे वाला देश बा त इजराइल अपना तकनीक के बल प कम जमीन में अधिका उपज वाला देश. हिंदुस्तान के भी प्रेरणा लेवे के होई. अधिक से अधिक टैलेंट के कृषि में झोंके के होई. एह कृषि प्रधान देश में तकनीक आ वैज्ञानिकता के सबसे बेसी अभाव कृषि के क्षेत्र में हीं बा. कृषि आ पशुपालन एक दूसरा से जुड़ल बा.
पहिले जब गाय बाछा बियात रहे त परिवार के बुझाव कि घर में एगो सवांग बढ़ गइल बा, बाकिर समय बदलल आ एह सवांग के उपयोगिता खतम होत गइल. ट्रैक्टर के चलन बढ़ल आ बैल के काम खतम हो गइल. नतीजा भइल कि खेत में खादर के बजाय, यूरिया-पोटाश झोंकाइल आ जिनिगी में जहर.
जिनगी में खुशहाली ले आवे के बा त खेती-किसानी के बारे में गंभीरता से सोचे के होई.

भोजपुरी कवि विश्वनाथ शैदा जी के एगो गीत बा
साँचे किसान हवन तपसी तियागी मेहनत करेलें जीव जान से
जेठो में जेकरा के खेते में पइबs जब बरसेले आग आसमान से
दुनिया कायम बा किसान से ...
एह गीत के लोक गायिका चन्दन तिवारी आपन स्वर देले बाड़ी आ पत्रकार निराला तिवारी बिदेसिया संगीतबद्ध कइले बाड़न.

गीतकार भोलानाथ गहमरी जी के भी किसान पर एगो गीत बा –
लेके सुरुजवा किरिनिया के लाली, भोरवा लुटावेली सोनवा के थाली
मारे टहनिया लहर पुरवइया, पीपरा के पतवा बजावेला ताली
पनघट-पोखरिया पर झांझर बजेला, बगिया में नाचे बिहान हो
गोरी झुकी-झुकी काटेली धान...

एह गीत के लोक गायिका अनुभा राय आपन स्वर देले बाड़ी आ लोकसंगीत मर्मज्ञ अतुल कुमार राय संगीतबद्ध कइले बाड़न.
एने लोकगायिका संजोली पाण्डेय भी नीरज पाण्डेय के लिखल आ सचिन अमित के संगीतबद्ध कइल किसान गीत गवले बाड़ी जवना के बोल बा - खेतवा में सोहे किसान हो जब लहरे सिवनवा
उम्मीद कइल जाय कि आवे वाला समय में सरकार जागी, देश जागी आ देश के एक-एक नागरिक जागी आ साँचहूँ सिवान लहरी आ खुशी नाची सबका घर-आँगन में.
( लेखक मनोज भावुक सुप्रसिद्ध भोजपुरी कवि हैं )
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