Bhojpuri में पढ़ें, चैतन्य महाप्रभु के पत्नी के सांप कांहें कटलस!

चैतन्य महाप्रभु के जनम सन 1486 के फागुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के पश्चिम बंगाल के नवद्वीप नामक गांव में भइल रहे जौना के अब मायापुर नांव बा. प्रकांड विद्वान ज्योतिषी कहले कि- देखीं ए लइका के दू गो बिया ह होई. बाकिर एह लइका के जीवन साधु के जीवन रही.

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चैतन्य चरितामृत के अनुसार चैतन्य महाप्रभु के जनम सन 1486 के फागुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नदिया) नामक गांव में भइल रहे जौना के अब मायापुर नांव बा ( जनम- 18 फरवरी 1486 देहांत- 1534). इनकर जनम सांझ खान सिंह लग्न में चंद्र ग्रहण के समय भइल रहे. इनकर पिताजी के नांव जगन्नाथ मिश्र आ माता के नांव शचि देवी रहल. एगो किंवदंती बा कि जब चैतन्य महाप्रभु के जनम भइल त एगो परिचित प्रकांड विद्वान ज्योतिषी कहले कि- देखीं ए लइका के दू गो बिया ह होई. बाकिर एह लइका के जीवन साधु के जीवन रही. ई लइका का रूप में एगो सिद्ध पुरुष रउरा घरे जनमल बा. ई हरिनाम के प्रचार करी आ अमर संत के रूप में संसार एकरा के याद करी.

शचि माता लइका के घर के नांव रखली- निमाई. एकरा पहिली पत्नी के नांव ल अक्षर से रही आ ओकर मृत्यु सांप कटला से होई. माता शचि देवी भगवान के परम भक्त रहली ऊ ज्योतिषी से पुछली कि महाराज, सर्पदंश के वजह? त ज्योतिषी कहले कि राउर पहिलकी बहू के पूर्व जनम के कुछ कर्म रहि गइल बा हालांकि ऊ कई जनम से साध्वी के जीवन जियले बिया. एह जनम में ओही बांचल कर्म के काटे खातिर सांप काटी. एगो ज्योतिषी बतवले कि पूर्व जनम में लक्ष्मीप्रिया के घर में एगो सांपिन अंडा दिहलस. अंडा से जब सांप के बच्चा निकलले सन त ओमें से एगो बच्चा गलती से लक्ष्मीप्रिया के गोड़ से दबा के मरि गइल. ओही के कारण एह जनम में उनुका के सांप काटी. शची देवी एह मामला में अपना छाती पर पत्थर राख लिहली. लक्ष्मीप्रिया नदिया जिला के विख्यात विद्वान वल्लभाचार्य के बेटी रहली. त वनमाली नांव वाला एगो ज्योतिषी से निमाई (चैतन्य महाप्रभु) के माता शचि देवी कहली कि अब हमार लइका 16 साल के हो गइल बा. एकरा शादी खातिर कौनो योग्य लड़की बताईं. चैतन्य महाप्रभु के सुंदरता पूरा इलाका में प्रसिद्ध रहे. गोरा रंग आ चेहरा का संगे शरीर भी सुंदर. उनुका के लोग देखे त देखते रहि जाउ. त वनमाली पहुंचि गइले वल्लभाचार्य किहां आ उनुका से कहले कि हम रउरा सुंदरी बेटी खातिर एगो वर देखले बानी. वल्लभाचार्य खुश हो गइले आ पुछले कि ऊ वर के ह? वनमाली कहले कि शचि देवी के पुत्र निमाई. लक्ष्मीप्रिया अत्यंत सुंदरी. जेतरे निमाई सुंदरता के चरम उदाहरण रहले ओहीतरी लक्ष्मीप्रिया भी परम सुंदरी रहली.

वल्लभाचार्य के लागल कि ई जोड़ी एकदम ठीक रही. निमाई आ लक्ष्मीप्रिया में के ढेर सुंदर बा, एकर फैसला कइल मुश्किल रहे. त वल्लभाचार्य खुदे निमाई आ लक्ष्मीप्रिया के कुंडली मिलवले. कुंडली दिव्य ढंग से मिलत रहे. पिता वल्लभाचार्य जानत रहले कि लक्ष्मीप्रिया के सर्पदंश से मृत्यु होई. बाकिर कौनो उपाय ना रहे. लिखन्त के के टारी. खूब धूमधाम से बियाह भइल. लक्ष्मीप्रिया के देखि के माता शचि बड़ा खुश भइली. चैतन्य महाप्रभु के घर में आके लक्ष्मीप्रिया भी धन्य भइली. दिन बीते लागल. निमाई दिन- रात सत्संग आ नामकीर्तन में बितावसु. सन 1505 आइल त लक्ष्मीप्रिया के पिता वल्लभाचार्य सतर्क हो गइले. एही साले लक्ष्मीप्रिया के सर्पदंश के योग रहे. ऊ बेटी का लगे संदेश भेजववले कि सतर्क रहिह. का जाने कुछ दिन बांचि जा. होनी हो के रहल. लक्ष्मीप्रिया के सांप काटि दिहलस. देखते- देखते उनुकर पूरा शरीर नीला परि गइल. वनमाली कहले- लक्ष्मीप्रिया के कुल कर्म कटि गइल. अब उनुका के स्वर्ग में स्थान मिली. दिन बीतल. एने लक्ष्मीप्रिया के चिंता भइल कि उनुकर वंश कइसे चली. नवद्वीप के एगो अउरी प्रकांड पंडित रहले सनातन. उनुकर पुत्री विष्णुप्रिया रहली. विष्णुप्रिया भी अपूर्व सुंदरी रहली. पंडित सनातन का लगे जब वनमाली निमाई के बियाह के प्रस्ताव लेके गइले त पंडित सनातन तुरंते तेयार हो गइले. भगवान के कृपा देखीं कि विष्णुप्रिया भी भगवान में लीन रहे वाली विद्वान स्त्री रहली. ऊ निमाई का घरे सुख से रहे लगली.

जब निमाई कीर्तन करसु त लागे जइसे भगवान के गहिर प्रेम से बोलावतारे. जब निमाई २४ बरिस के भइले त गृहस्थ आश्रम छोड़ि के सन्यास लिहले. सन 1510 में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास के दीक्षा लिहला का बाद निमाई के नांव कृष्ण चैतन्य देव हो गइल. बाद में ईहे नांव चैतन्य महाप्रभु हो गइल. उनुकर एगो अउरी नांव परि गइल गौरांग. संन्यास लिहला का बाद जब गौरांग पहिला बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचले, त भगवान के मूर्ति देखिके ऊ एतना भाव विभोर हो गइले कि उन्मत्त होके नाचे लगले नाचत- नाचत मूर्छित हो गइले. संयोग से ओइजा प्रकांड पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य खड़ा रहले. चैतन्य महाप्रभु के प्रेम-भक्ति से प्रभावित होके उनुका के अपना घरे ले गइले. घर पर शास्त्र-चर्चा शुरू भइल, जौना में पंडित सार्वभौम आपन पांडित्य के प्रदर्शन करे लगले. तब चैतन्य महाप्रभु भक्ति के महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध कइले आ पंडित सार्वभौम के भगवान श्रीकृष्ण के षड्भुजरूप के दर्शन करवले. सबसे पहिले चैतन्य महाप्रभु के दूगो शिष्य भइल लोग-नित्यानंद प्रभु आ अद्वैताचार्य महाराज. ई दूनों शिष्य चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन के चरम पर पहुंचावे में बहुत मेहनत कइल लोग. चैतन्य महाप्रभु अपना एह दूनो शिष्यन के मदद से ढोलक, मृदंग, झांझ आ मंजीरा वगैरह के साथ मस्ती में नाचि-गा के हरि नाम संकीर्तन करे शुरू कइले. हरिकीर्तन रहे-

हरे-कृष्ण, हरे-कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण, हरे-हरे. हरे-राम, हरे-राम, राम-राम, हरे-हरे॥

एकरे के चैतन्य महाप्रभु महामंत्र के संज्ञा दिहले आ कहले कि जे भी एह मंत्र के संपूर्ण श्रद्धा से मन, प्राण से जाप करी, ऊ भगवान के परम कृपा पाई. चैतन्य महाप्रभु कई गो चमत्कार कइले बाड़े ताकि लोगन के भगवान में विश्वास दृढ़ होखे. एमें नेत्रहीन के आंख स्वस्थ कइल, कठिन रोग से पीड़ित लोगन के स्वस्थ कइल आ मुए अंटकल आदमी के जिंदा कइल शामिल बा. रोग- व्याधि दूर करे के अलावा चैतन्य महाप्रभु बहुत लोगन के ईश्वर के ज्योति दर्शन भी करवले.

सन 1515 में जब पूरा देश के भ्रमण कइला का बाद जब चैतन्य महाप्रभु जंगल का रास्ता जाए लगले तो उनुकर कीर्तन सुनि के जंगल के कुल जीव-जंतु मस्ती से नाचे लगले सन. जात- पात तूरि के चैतन्य महाप्रभु सबका के भक्ति के अमृत पियवले. बाद में अपना छव गो प्रमुख अनुयायियोन के वृंदावन भेजिके वृंदावन में सप्तदेवालय बनववले. चैतन्य महाप्रभु गौड़ीय संप्रदाय के स्थापना कइले. गौड़ीय संप्रदाय भक्ति आंदोलन के व्यवहारिक स्वरूप लोगन का सामने रखले बा. (विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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