Bhojpuri में पढ़ें, वेद आ उपनिषद के पुनरावलोकन काहें जरूरी बा

जे वेद- पुराण, उपनिषद के अध्ययन नइखे कइले ऊहे वेद- पुराण के निंदा करता. वेद त अमृत हउवन स. अब हमनीं का आंखि बंद क लीहीं जा त अन्हार त होखबे करी. वेद हमनी के संस्कार सिखवले बाड़े सन. मनुष्यता सिखवले बाड़न सन. लोग के बीच एकरा के पहुंचावे खातिर पुनरावलोकन जरूरी बा.

  • Share this:
हमनी का लगे वेद के रूप में अमृत तत्व बा. जेकरा ई अमृत पीए के बा, ऊ पीयता आ जे आंखि मूंदले बा, ऊ वंचित बा. ऋगवेद के पुरुष सूक्त में का बा? त सरकार एमें विराट पुरुष यानी कि ब्रह्म के विस्तार से व्याख्या बा. कौना वाक्य से शुरू बा, देखीं- “सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्.…” त शुरूआते अद्भुत बा. कइसे? त संस्कृत में सहस्र के प्रयोग अनंत खातिर कइल गइल बा. जइसे भगवद्गीता के ग्यारहवां अध्याय में भगवान के विश्वरूप दर्शन के वर्णन भइल बा त ओमें भगवान के एह रूप के प्रकाश के तुलना सहस्र सूर्य के प्रकाश से कइल बा. त वेद में भा उपनिषद में “सहस्र” शब्द अनंत के मेटाफर ह, एगो रूपक ह. सहस्रशीर्षा हजारों सिर, माने अनंत सिर. त भगवान सर्वव्यापी बाड़े. सहस्राक्ष- हजार गो आंखि माने अनंत आंखि बा- सर्वद्रष्टा. सहस्रपात- माने हजार गो पैर बा- अनंत गोड़ (पैर) माने हर जगह उपस्थिति बा. त भगवान विराट पुरुष बाड़े. अनंत बाड़े, अनादि बाड़े.

त रउरा जानते बानी कि ऋग्वेद के प्राचीनतम ग्रंथ कहल जाला. एमें ईश्वर के स्तुतिपरक मंत्र बाड़े सन. एही से ऋग्वेद के ऋचा संग्रह के रूप में परिभाषित कइल जाला. त ऋग्वेद में स्तुति के जौन ऋचा बाड़ी सन ऊ अपना प्रभाव में एतना सघन बाड़ी सन कि मंत्र अपने आप एगो सशक्त वाइब्रेशन पैदा क देता, स्पंदन पैदा क देता. एकर नांव पुरुष सूक्त काहें परल बा? त सरकार ब्रह्म के भा ईश्वर के एइजा विराट पुरुष कहल गइल बा. एही विराट पुरुष के हजार गो सिर, आंखि आ पैर बा. एमें एह प्रश्न के उत्तर खोजे के प्रयत्न बा कि जब कुछऊ ना रहे त का रहे? सत- असत भा रात- दिन भा अंधकार- प्रकाश कुछू ना रहे त का रहे? त प्रकारांतर से ई संकेत दिहल जाता कि जब द्वैत ना रहे त का रहे? काहें से कि जौन द्वैत माने दृश्य बा, इंद्रिय अनुभूति के भीतर बा ऊ ना रहे त का रहे. पूर्ण ब्रह्म के अस्तित्व रहे. हिरण्यगर्भ के अस्तित्व रहे. हिरण्यगर्भ माने उत्पत्ति के स्थान. माने ब्रह्म. त देखीं कतना खूबसूरती से ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में आदि, अनंत भगवान के व्याख्या भइल बा. पुरुष सूक्त के बात आइल त ऋग्वेद के अउरुओ कुल सूक्तन के छू लिहल जाउ.

वेदांत में भी हिरण्यगर्भ के बड़ा सुंदर व्याख्या कइल बा. ठीक एहीतरे. त स्पष्ट हो गइल कि हिरण्यगर्भ सब प्राणिन के उत्पत्ति के स्थान ह. अच्छा एइजा एक मिनट रुकीं. हिरण्यगर्भ का खाली प्राणी मात्र के उत्पत्ति स्थान ह? ना. हिरण्यगर्भ मूर्त, अमूर्त, प्राणी, जड़ आ समस्त सृष्टि के उत्पत्ति स्थान ह. अच्छा ऋग्वेद के ऋचा मिलिके, एक संगे सामंजस्य बनावे के कहतारी सन. संज्ञान सूत्र कहतारे सन कि सब हृदय एक संगे बोली, जीव समुदाय के हित में काम करी त सकारात्मक ऊर्जा बनी. जब सामूहिक प्रार्थना होई, सामूहिक मंगल कामना होई त ओकर विराट प्रभाव परी. आजकाल त कई जगह एकही परिवार में पचास तरह के सोच रहता. त सामंजस्य कइसे होई. ऋग्वेद हर स्थिति में सामंजस्य आ सौहार्द्र के रास्ता देखावता. अक्ष सूत्र में परिश्रम के विशेष महत्व दिहल गइल बा. सार्थक परिश्रम करेके चाहीं आ आलस्य, विकर्म के त्याग क देबे के चाहीं. पुरुष सूक्त के अलग- अलग विद्वान अलग- अलग व्याख्या कइले बा लोग. सब ऋग्वेद से अभीभूत बा. एमें स्त्री तत्व के परिवार में आदरणीय कहल बा. बाकिर ईहो बता दिहल बा कि स्त्री के कर्तव्य का ह. बड़ा खूबसूरती से स्त्री के कर्तव्य आ ओकरा आदरणीयता के कनेक्ट कइल गइल बा. पढ़े वाला ई अर्थ निकालता कि स्त्री अपना कर्तव्यन के निर्वाह ना करी त ओकर आदरणीयता प्रभावित हो जाई. देखीं ऋग्वेद में संतुलन के कतना बड़ उपाय बतावल बा. त ऋग्वेद में अलौकिक से लेके लौकिक ज्ञान तक के ब्रह्म ज्ञान से जोड़ल बा. लेकिन कुल वर्णन जाके फाइनली कनेक्ट होखता ब्रह्म के सर्वव्यापकता, सर्वशक्तिमानता आ सर्वज्ञाता शक्ति से.

वेदकालीन ऋषि- मुनि लोग देव अराधना के केंद्र में रखले बा. अब देखीं- वैदिक काल में इंद्र आ अग्नि के स्तुति में ढेर मंत्र पढ़ल जात रहल ह. इंद्र, इंद्रिय के स्वामी के भी कहल गइल बा. त जे इंद्रिय समुदाय के वश में क लीहल आ प्राणशक्ति के इंद्रिय का ओर ना बहवा के सहस्रार चक्र (कपार के सबसे ऊपरी भाग पर स्थित चक्र) का ओर बहवा ले गइल, ऊ इंद्र के पदवी पा लिहल. माने जे प्राण शक्ति के धारा नीचे का ओर ना बहवा के ऊपर का ओर बहवा ले गइल, ऊ इंद्रियातीत अवस्था के प्राप्त क लिहल. अच्छा अग्नि के स्तुति पर काहें जोर बा? त सरकार जे निराग्नि रही, ओकरा जीवन के का अर्थ बा. जेकरा में उत्साह के अग्नि, साधना के अग्नि, कर्तव्य पालन खातिर परिश्रम करेके प्रवृत्ति (अग्नि) ना रही, ओकरा जीवन के का अर्थ बा? ऊ त निरर्थके जीवन नू जीयता. ऋग्वेद में ज्ञानसूक्त बा आ ज्ञानसूक्त सर्वोच्च ज्ञान का ओर जाएके प्रेरणा देता. कथी के ज्ञान? त हम के हईं, ब्रह्म के ह आ एह संसार के का अर्थ बा, ईहे ज्ञान जब हो जाई त भंवर- जंजाल से मुक्ति मिल जाई.

पुरुष सूक्त के व्याख्या में विद्वान लोग कहले बा कि जे ईश्वर के प्रति चेतन नइखे ऊ एह संसार में शूद्र बा. भले ओकर माता- पिता कौनो जाति के होखे. आ जे ईश्वर के प्रति चेतन बा ऊहे ब्रह्म के नजदीक बा. जे देह पिंजर में आसक्त बा, ऊ सब लोग शूद्र बा. एतना गहिर व्याख्या रउरा कहीं ना पाइब. अब जे जातिवाद करता ऊ ऋग्वेद का लगे आके फेल हो जाई. एइजा देहासक्त सब लोग शूद्र बाड़े. "जन्मना जायते शूद्र: संस्कारात् भवेत् द्विजः (मनुस्मृति)” माने जन्म से सब शूद्र बा, अपना कर्म से ब्राह्मण होई. त हमनी ऋषि- मुनि लोग भेदभाव वाला ना रहल ह लोग, जे वेद- पुराण, उपनिषद के अध्ययन नइखे कइले ऊहे वेद- पुराण के निंदा करता. वेद त अमृत हउवन स. अब हमनीं का आंखि बंद क लीहीं जा त अन्हार त होखबे करी. वेद हमनी के संस्कार सिखवले बाड़े सन. मनुष्यता सिखवले बाड़न सन. पाशविक प्रवृत्ति से छुटकारा पावे के उपाय बतवले बाड़न सन. तबो कान में तेल डालि के आंख बंद क के सूति जाईं जा त वेद का करी? एही से वेद के पुनर्पाठ, पुनरावलोकन जरूरी हो गइल बा. (विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.