Bhojpuri: शनिदेव काहें भइलन करिया, जयंती पर पढ़ीं कथा

कथा के अनुसार, कश्यप मुनि क वंशज भगवान सूर्यनारायण क महरारू सवर्णा यानी छाया भगवान शिव क कठोर तपस्या कइलिन. तपस्या के बाद जेठ महीना में अमावस के दिना ओन्हय शनिदेव के रूप में पुत्र-रत्न क प्राप्ति भइल. लेकिन रंग काला काहें भइल, पढ़ीं...

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सवर्णा जइसन माई अउर सूरज जइसन बाबू के शनिदेव जइसन करिया लड़िका कइसे भयल? एकर जवाब पुराण में एक कथा से मिलयला. कथा के अनुसार, कश्यप मुनि क वंशज भगवान सूर्यनारायण क महरारू सवर्णा यानी छाया भगवान शिव क कठोर तपस्या कइलिन. तपस्या के बाद जेठ महीना में अमावस के दिना ओन्हय शनिदेव के रूप में पुत्र-रत्न क प्राप्ति भइल. जेठ क अमावस एह साल 10 जून गुरुवार के हौ. तपस्या के दौरान तेज धूप अउर गर्मी के नाते पेटे में ही शनि क रंग करिया होइ गयल रहल. अमावस तिथि करियई में अउर योगदान कइलस. लेकिन माई सवर्णा के तप के कारण शनि के पास अपार शक्ति रहल.

स्कंद पुराण के काशीखंड के अनुसार, सूर्यनारायण क बियाह दक्ष क बिटिया संज्ञा से भयल रहल. लेकिन संज्ञा सूर्य क तेज बर्दाश्त नाहीं कइ पावत रहलिन. जब बर्दाश्त से बहरे होइ गयल तब उ अपने तीनों लड़िकन -मनु, यमराज अउर यमुना- क देखरेख करय बदे सवर्णा नाम क आपन प्रतिरूप बनइलिन अउर अपुना नइहरे आइ गइलिन. इ बात सूर्य के पता नाहीं चलि पइलस. सूर्य सवर्णा के ही संज्ञा समझयं. प्रतिरूप रहले के नाते सवर्णा के छाया भी कहल जाला. छाया से ही शनि क जनम भयल. एही के नाते शनि के छाया ग्रह भी कहल जाला.

शनि के भइले के बाद एक बार सूर्यनारायण सवर्णा से मिलय गइलन. सूर्य के तेज के नाते शिशु शनि आपन आंख बंद कइ लेहलन. सूर्यदेव अपने दिव्यदृष्टि से देखलन कि ओनकर लड़िका शनि त एकदम करिया बा. ओनके मन में विचार आयल कि जब माई-बाबू दूनों गोर, तब लड़िका करिया कइसे होइ सकयला, यानी शनि हमार लड़िका नाहीं हौ. सूर्यदेव आपन इ संदेह छाया के सामने भी जाहिर कइ देहलन. शनि के जब इ बात पता चलल तब उ अपने बाबू से बहुत नाराज भइलन अउर ओनकर संबंध ओनसे खराब होइ गयल. सूर्यदेव भी शनि से कभौ प्यार नाहीं कइलन. बाप से उपेक्षित शनि भगवान शिव क कठोर तपस्या कइलन.

शनि के तपस्या से प्रसन्न भगवान शिव वरदान मांगय बदे कहलन तब शनि कहलन कि हमार बाबू हमरे माई क हमेशा अपमान कइलन, बहुत प्रताड़ित कइलन, एह के नाते आप हमय वरदान द कि हम सूर्य से अधिक शक्तिशाली अउर पूज्य होईं. भगवान शिव कहलन कि तू सभी ग्रहन में सबसे श्रेष्ठ रहबा, सबसे बड़ा न्यायाधीश भी रहबा, तोहरे पास मनुष्य से लेइके देवता तक, सबके दंड देवय क पूरा अधिकार रही. मनुष्य, देवता, असुर, सिद्ध, नाग, गंधर्व सब तोहरे नाम से डरिहय.

लेकिन लंका क राजा रावण भी शिव क बहुत बड़ा भक्त रहल. भक्ति के बल पर उ शिव से अपार शक्ति हासिल कइ लेहले रहल. ओही शक्ति के बल पर उ देवतन से ओनकर राज्य छीनि लेहले रहल. कुल ग्रहन के कैद कइ लेहलस. जब मेघनाद क जनम होवय वाला रहल तब रावण कुल ग्रहन के अपने उच्चस्थान में रहय क आदेश देहलस. लेकिन शनि मेघनाद के जनम से ठीक पहिले आपन राशि बदलि लेहलन. जवने के नाते मेघनाद अपराजेय अउर दीर्घायु नाहीं होइ पइलस. रावण के जब इ बात पता चलल तब उ क्रोध में शनि के पैर पर गदा से हमला कइलस. एही के नाते शनि क चाल धीमी होइ गइल. शनि के सबसे धीमी चाल वाला ग्रह मानल जाला.

शनिदेव अमावस के दिना पैदा भयल रहलन, खुद करिया रहलन, एह के नाते ओन्हय करिया समान चढ़ावय क प्रथा हौ. लेकिन शनि के तेल काहें चढ़ावल जाला? एकर एक अलग कथा हौ. आनंद रामायण में मौजूदा कथा के अनुसार, भगवान शिव से दंडाधिकारी होवय क वरदान मिलले के बाद शनिदेव के अहंकार होइ गयल. मनुष्य से लेइके देवता तक के उ कर्म के अधार पर दंड देवय लगलन. उ अपुना के सर्वशक्तिमान समझय लगलन. लंका पर हमला करय बदे भगवान राम वानर सेना के मदद से जब समुद्र पर सेतु क निर्माण कइलन, तब सेतु के सुरक्षा क जिम्मेदारी हनुमान के सौंपि देहलन. शनिदेव जब अपने नियमित भ्रमण पर निकललन तब समुद्र पर बनल सेतु देखि के दंग रहि गइलन. उ देखलन कि हनुमान जी उहां ध्यानमग्न बइठल हयन. शनिदेव के इ देखि के बहुत गुस्सा आयल. उ हनुमान क ध्यान तोड़य क कोशिश करय लगलन. लेकिन हनुमान जी पर शनिदेव क कवनो असर नाहीं भयल. शनि क गुस्सा अब बहुत बढ़ि गयल.

अंत में शनिदेव हनुमान के चुनौती देइ देहलन. हनुमान जी विनम्रता से कहलन कि एह समय हम अपने अराध्य स्वामी भगवान राम क ध्यान करत हई, एह के नाते हमय परेशान मत करा. लेकिन शनि मानय के तइयार नाहीं भइलन. एकरे बाद हनुमान जी शनि के अपने पोंछी में लपेटि के पथरे पर पटकय लगलन. शनिदेव खून से लथपथ होइ गइलन. अब ओन्हय अपने गलती क अहसास भयल. उ गलती बदे माफी मांगय लगलन. हनुमान जी ओन्हय छोड़ि देहलन. लेकिन पूरे देही में घाव भइले के नाते शनिदेव के बहुत दर्द होत रहलन. हनुमान जी के दया आइ गइल अउर उ ओन्हय तेल देहलन अउर कहलन कि इ तेल लगइले से तोहार दर्द दूर होइ जाई, लेकिन अब दुबारा अइसन गलती मत करिहा. तेल लगइले के बाद शनिदेव क दर्द वाकई दूर होइ गयल. मान्यता हौ कि तबय से शनिदेव के तेल चढ़ावय जाए लगल.

एह साल शनि जयंती पर सूर्यग्रहण भी लगत हौ. लेकिन भारत में ग्रहण न देखाई. ग्रहण क प्रभाव भी भारत पर न पड़ी. शनि जयंती पर शनिदेव के पूजा क खास महत्व हौ. खासतौर से जेकरे ऊपर शनि क साढ़ेसाती अउर शनि क ढइया चलत हौ, ओहके शनि क पूजा कइले से खास लाभ मिली. एह समय धनु, मकर अउर कुंभ राशि पर शनि क साढे़साती चलत हौ. जबकि मिथुन अउर तुला पर शनि क ढइया हौ. मान्यता हौ कि शनि जयंती के दिना हनुमान चालीसा अउर सुंदरकांड क पाठ कइले से मनोकामना पूरा होला. शनिदेव के मंदिर जाइ के तेल, काला तिल अउर काली उड़द क अर्पण, दान कइले से भी लाभ मिली. (सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)