Bhojpuri: बनारस में बीएचयू के बाद विद्यापीठ काहे स्थापित भयल, पढ़य अनकही कहानी

शहर में एशिया क सबसे बड़ा शिक्षा संस्थान शुरू भइले के तत्काल बाद एक दूसर संस्थान क भी सुगबुगाहट शुरू भयल अउर 10 फरवरी, 1921 के काशी विद्यापीठ क स्थापना होइ गयल. सवाल इ हौ कि बीएचयू जइसन बड़ा शिक्षा संस्थान रहले के बाद भी काशी विद्यापीठ काहे खुलल? एकरे पीछे एक अनकही कहानी हौ, जवने के बारे में बहुत कम लोगन के पता हौ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 29, 2021, 3:05 PM IST
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बनारस पुराने जमाने से शिक्षा, संस्कृति क केंद्र रहल हौ. देश-दुनिया क लोग शिक्षा ग्रहण करय बनारस आवय. प्राचीन काल से इहां शिक्षा क गुरुगुल व्यवस्था चलत रहल, लेकिन देश में अंगरेजन के अइले के बाद जब शिक्षा क स्वरूप बदलल तब बनारस भी अपुना के बदललस अउर इहां आवय वाले विद्यार्थीन के आधुनिक शिक्षा देवय बदे चार फरवरी, 1916 के काशी हिंदू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू क स्थापना भयल. बीएचयू में 30 हजार विद्यार्थीन बदे व्यवस्था रहल, जवन आज बढ़ि के लगभग 40 हजार होइ गयल हौ.

शहर में एशिया क सबसे बड़ा शिक्षा संस्थान शुरू भइले के तत्काल बाद एक दूसर संस्थान क भी सुगबुगाहट शुरू भयल अउर 10 फरवरी, 1921 के काशी विद्यापीठ क स्थापना होइ गयल. सवाल इ हौ कि बीएचयू जइसन बड़ा शिक्षा संस्थान रहले के बाद भी काशी विद्यापीठ काहे खुलल? एकरे पीछे एक अनकही कहानी हौ, जवने के बारे में बहुत कम लोगन के पता हौ.

जाहिर बात इ हौ कि बीएचयू क स्थापना स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद पंडित मदनमोहन मालवीय कइले रहलन. अउर काशी विद्यापीठ क स्थापना स्वतंत्रता सेनानी, लोकोपकारी समाजसेवी शिवप्रसाद गुप्त कइले रहलन. लेकिन इ बात बहुत कम लोगन के पता हौ कि बीएचयू के पीछे क सूत्रधार भी शिवप्रसाद गुप्त ही रहलन. शिवप्रसाद गुप्त बनारस क सबसे बड़ा धनी व्यक्ति रहलन. जेतना ओनके पास धन-दौलत रहल, ओहसे बड़ा ओनकर दिल रहल. महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप के सिद्धांत क ओनके ऊपर एतना असर रहल कि उ परोपकार बदे आपन सबकुछ न्योछावर करय में देर न लगावय. बनारस में कबीरचौरा क मंडलीय अस्पताल, भारत माता मंदिर शिवप्रसाद गुप्त क ही बनवावल हौ. देश में जब पहिला गांधी आश्रम खोलय क बात आइल त शिवप्रसाद गुप्त अकबरपुर में मौजूद आपन डेढ़ सौ एकड़ जमीन एक झटका में दान कइ देहलन. बनारस में 1028 में कांग्रेस के अधिवेशन क पूरा खर्च उहय उठइले रहलन. स्वतंत्रता आंदोलन में मदद बदे 1920 में देश क पहिला हिंदी दैनिक अखबार आज शुरू कइलन. शिवप्रसाद गुप्त के दानवीरता के कारण महात्मा गांधी ओन्हय राष्ट्ररत्न क उपाधि देहले रहलन.

शिवप्रसाद गुप्त जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई करत रहलन, ओही दौरान मदन मोहन मालवीय से ओनकर परिचय होइ गयल रहल. बाद में कांग्रेस से जुड़ाव के नाते दूनों क संबंध प्रगाढ़ भयल. शिक्षा के क्षेत्र में बनारस क योगदान बरकरार रखय बदे शिवप्रसाद गुप्त शहर में शिक्षा क एक बड़ा आधुनिक केंद्र खोलय चाहत रहलन. मालवीय क शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता देखि के शिवप्रसाद गुप्त ओन्हय बनारस लेइ अइलन अउर विश्वविद्यालय खोलय बदे प्रेरित कइलन. मालवीय तइयार होइ गइलन अउर काम में जुटि गइलन. एनी बेसेंट इहां पहिलय से सेंट्रल हिंदू कॉलेज चलावत रहलिन. एही कॉलेज के विस्तार देइ के विश्वविद्यालय क रूप देवय क योजना बनल. विश्वविद्यालय बदे एक लाख एक हजार रुपिया क पहिला चंदा शिवप्रसाद गुप्त देहलन. काम शुरू भयल अउर विश्वविद्यालय के हर काम में शिवप्रसाद गुप्त मालवीय के साथ रहलन. कुल पचास लाख रुपिया चंदा जुटावल गयल. तत्कालीन काशी नरेश प्रभुनारायण सिंह विश्वविद्यालय बदे 1300 एकड़ जमीन देहलन. एशिया क सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय बनि के तइयार भयल.
विश्वविद्यालय बनय के दौरान ही शिक्षा पद्धति, रीति-नीति, स्वरूप अउर शिक्षा के माध्यम के लेइके मालवीय अउर गुप्त के बीच मतभेद होवय लगल. दूनों कांग्रेस क बड़ा नेता रहलन अउर शिवप्रसाद गुप्त बहुत विनम्र अउर त्यागी पुरुष रहलन. मालवीय से जब मतभेद जादा बढ़य लगल तब उ विनम्रता के साथ विश्वविद्यालय से अपुना के अलग कइ लेहलन. एही के साथ काशी विद्यापीठ क योजना बनल. शिक्षा क एक अइसन केंद्र जवन सरकारी नियंत्रण अउर मदद से पूरी तरह मुक्त रहय अउर उहां विशुद्ध भारतीय परिवेश में भारतीय भाषा में उच्च कोटि क शिक्षा देहल जाय अउर उहां से निकलय वाले विद्यार्थी उच्च कोटि क विद्वान नागरिक बनय, ताकि उ राष्ट्र के निर्माण में योगदान कइ सकय.

विश्वविद्यालय क काम तेजी से शुरू भयल अउर असहयोग आंदोलन के दौरान 10 फरवरी, 1921 के महात्मा गांधी बनारस में शिक्षा के एक नए आधुनिक केंद्र क उद्घाटन कइलन. विद्यापीठ बहुत जल्द ही राष्ट्रीय आंदोलन क केंद्र बनि गयल. एक लंबे समय तक इ विद्यापीठ समाजवादी लोगन क तीर्थ रहल. इहां पढ़य वाला विद्यार्थी खादी कुर्ता-पाजामा में ही देखाई देय. विद्यापीठ खुलले के बाद उ तमाम विद्यार्थी इहां नाम लिखइलन, जवन असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर सरकारी विद्यालय अउर महाविद्यालय के छोड़ि देहले रहलन. अइसन विद्यार्थीन के सूची में लाल बहादुर शास्त्री, चंद्रशेखर आजाद, कमलापति त्रिपाठी, रामकृष्ण हेगड़े आदि लोग शामिल रहलन.

विद्यापीठ में शिक्षा क प्रमुख माध्यम हिंदी रहल अउर एह माध्यम के मजबूती प्रदान करय बदे शिवप्रसाद गुप्त उच्च दर्जा क पाठ्यपुस्तक हिंदी में छपवउलन. काशी विद्यापीठ देश क पहिला आधुनिक विश्वविद्यालय रहल, जवन सरकारी नियंत्रण अउर मदद से दूर पूरी तरह जनता के द्वारा संचालित अउर प्रबंधित रहल. विश्वविद्यालय क पहिला कुलपति भगवान दास रहलन अउर अध्यापकन में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ल शिक्षाविद आचार्य नरेंद्र देव, डाॅ. राजेंद्र प्रसाद, जीवतराम कृपालानी, बाबू श्रीप्रकाश अउर डाॅ. संपूर्णानंद जइसन लोग रहलन.



विद्यापीठ के पहिले प्रबंधन मंडल में महात्मा गांधी, लाला लाजपत राय, जमनालाल बजाज, जवाहर लाल नेहरू, शिवप्रसाद गुप्त, आचार्य नरेंद्र देव, कृष्णकांत मालवीय, अउर पुरुषोत्तमदास टंडन शामिल रहलन. विद्यापीठ के स्थापना समारोह में पंडित मोतीलाल नेहरू, मौलाना मोहम्मद अली अउर मौलाना अबुल कलाम आजाद उपस्थित रहलन. स्थापना समारोह क शुरुआत वेदमंत्र के साथ ही कुरान के आयत के पाठ से भयल रहल. राष्ट्रीय आंदोलन क हर बड़ा नाम काशी विद्यापीठ से कवनो न कवनो तरह से जुड़ल रहल, लेकिन मदनमोहन मालवीय शुरू से अंत तक विद्यापीठ से दूर रहलन.

जवने प्रस्ताव के जरिए विद्यापीठ क स्थापना भइल रहल, ओहमे विद्यापीठ के सरकारी मदद अउर सरकारी मान्यता से दूर रहय क बात शामिल रहल. लेकिन 1963 में यूजीसी विद्यापीठ के डीम्ड विश्वविद्यालय क दर्जा देइ देहलस. बाद में जब कमलापति उत्तर प्रदेश क मुख्यमंत्री बनलन तब उ 15 जनवरी, 1974 के एक सरकारी प्रस्ताव के जरिए विद्यापीठ के वैधानिक विश्वविद्यालय क मान्यता देइ देहलन. बाद में 1995 में एकर नाम बदलि के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ होइ गयल. आज के तारीख में विश्वविद्यालय में कला, विज्ञान, वाणिज्य, कानून, कंप्यूटर अउर प्रबंधन क पढ़ाई होला. विश्वविद्यालय के बी प्लस दर्जा प्राप्त हौ. (लेखक सरोज कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)
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