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Bhojpuri में पढ़ीं- माघ क पाला जेठ क धूप...

Bhojpuri में पढ़ीं- माघ क पाला जेठ क धूप...

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एगो कहावत हिय.....माघ क पाला जेठ क धूप, बड़ी कसाला होले उख...... पुरनका लोग इ खिस्सा कहत रहलन ह. माघ बहुत ठंढा दिन होखेला जईसे कि जेठ में खूब तपन होले. इ दूनो ढेर गरमी आउर ढेर ठंढा खातिन जानल जाला. ऊख क फसल माघ-पूस की समय होखे ले. जाड़ा में ऊख काटल, छिलल आउर पेरल जाले. अब एतनी ठंढी में ऊख के हाथ लगावल बड़ा मेहनत वाला काम होला. हाथ कठुआ जाला. पाला की मारे अंगूरी फूल जाले. लेकिन मेहनत से किसान भाग जाई त फसल घरे कईसे आई.

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ऊख फागुन की आसपास बोवाले आउर जेठ में अमोला हो जाले. कुछ लोग आलू आउर पियाज में ऊख बो देलन. तईयार भईले पर आलू-पियाज खोद लिहल जाला आउर ऊख रह जाले. ओकरा बाद ऊख में एगो-दूगो पानी दिहले की बाद ओके कोड़ला जाला. कोड़ले क काम जेठ में होला. जेठ की तपन में ऊख कोड़ल केतना कठिन काम ह. एकर अनुमान आप येह बात से लगा सकीला कि ऊख कोड़त क ओकरी धारदार पतई से गोड़-हाथ चीरा जाला. ओमे जब पसीना जाला त बहुत छरछराला. एक ओर गरमी आउर दूसरी ओर इ छरछरायल. जेकर चाम कमजोर रहेला ओकर त खून निकले लगेला. अईसन लोग ऊख कोड़े जालन त लुंगी सोहराय के पहिर के जालन. भरबहियां सैट चाहे कुरता पहिर के ऊख क कोड़ाई होखे ले. बहुत कम लोग होलन जे ऊख दो बार कोड़ पावेलन. नहीं त एके बार कोड़ले में उ उप्पर निकल जाले. ठेघुना से ऊपर निकलल ऊख कोड़ल सबसे टेढ़ काम होला. हाथ गोड़ कपड़ा से तोपु लिहले पर कोड़ल ना बने ला. एसे कि जब मनई कोड़े झुकेला त ऊख क पतई चाहे डाटी से आंख चिरयिले आउर खोदयिले क डर रहेला.

जेठ क मेहनत पूस-माघ में सम्हने आवे ले. जाड़ा में ऊख काट के छिलाले, पेराले आउर फिर करहा में चढ़ा के झुकाले. तब जाके भेली बनेले. गुर बनेला. माहिया मारल जाले. महिया से पहिले बरद महिया होखेले. ओकरा के गोरु खालन. ऊख क गेड़ा आउर गेल्ही गोरू खा के अघा जालें. खोइया खाना बनवले आउर हाथ गोड़ सेंकले की काम आवेले. ऊख कटले आउर छिलले की काम में गांव-पुर क अदमी मदद करेलन. एसे सहयोग त होई जाला, सब लोग अपनी गोरू खातिन लेहना क जोगाड़ क ले लेलन जा.

ऊख से भेली गुर बनावल बहुत बारीक कलाकारी वाला काम ह. तनिको पाग चढ़ गयल त गुर आउर भेली बनले की जगह पट्टी हो जाला. पट्टी क मतलब की उ गरम खाय के ख़तम करे चीज बन गयील. ठंढा भईले पर उ गड़ास से काट के खायल मुश्किल हो जाला. हमहन क छोट रहलीं जा त मनावल जाव की गांव में केहू क पाग चढ़ जाव. एसे कि अईसे केहू करहा में से भेली ना लेवे दे. लईकन के त बिलकुल नाही. लेकिन जब पट्टी हो जाय त गांव की लईकन क चांदी रहे. खूब पट्टी खायल जाव. आप इस समझीं कि येह बेला में सबसे बढ़िया जवन काम होखे उ पट्टी वाला काम रहे. पट्टी एतना बढ़िया रहे कि लईका ओकर लर बनाय के खांय. बुढ़ पुरनिया लोगन की बस क त रहेना. लईका खूब सधावें आउर एक दूसरे के बतावें कि हम केतना खयिलीं.

ऊख कचरस खातिन जानल जाले. जाड़ा में कचरस बहुत ठंढा होखेला. लेकिन लोग गोईठा में भूजल आलू आउर सजाव दही डालल कचरस खाके दिनभर काम करें. केहू के कबो कवनो हारी-बीमारी ना होखे. आज लोग शारीर में चिन्नी बढ़ले से परशान हव. लेकिन तब लोग एतना मेहनत करें की इ कुल दिक्कत ना रहे. अब क लोग ठंढा लगले की डरन जाड़ा में न त मंठा पियेलन आउर नाही दही डालल कचरस पियेलन. पहिले कचरस में दही डाल के पियले पर आधा दिन खईले क जरूरत ना पड़े. बहुत गंभीर करे. ओकरा से पाचन ठीक रहे. कवनो समान टटका खाईब नोकसान नहिये करी. बासी खईले पर दिक्कत होले.

भोजपुरी खित्ता में कचरस का बखीर आउर दल भरुई पूड़ी खईले क रिवाज ह. रमनऊमी पर इहे चढ़ावल जाला. अब त चिन्नी क जमाना आ गयल ह. पहिले चिन्नी क केहू नाव लेवे वाला ना रहे. जबले ऊख रहे तबले पीड़ीया से लेके रमनऊमी ले कई बार कचरस क बखीर खाए के मिले. अईसन ह की जे खईले ह उ बता सकेला कि कचरस क मिठास चिन्नी आउर भेली में ना मिली. उ सवादे अलगा होला. अब त टटका खाना की नांव पर लोग मैदा उबाल के खात हवन त कचरस क मजा कहाँ से पता चली.

येह महीना में जाड़ा खूब पड़ेले. इ सबसे ढेर बुढ़-पुरनिया लोगन के परशान करेले. लोग बतावें की घाघ येह जाड़ा के लेके खिस्सा कहें- ‘लईकन के छुअब ना, जवनका लगे भाई. बुढ़वा केतनो ओढ़े रजाई, जड़िया दवर-दवर के जाई.’ लेकिन लोग रस, गुर, तिल्ली, सोंठ खाय के मजबूत रहें. जवाईन क हलुवा खईले क रिवाज रहे. मेथी के खिचड़ी आउर ढूंढी बना के लोग खांय. बजड़ा क रोटी चाहे भात बना के खईले क जमाना रहे. मुरई, हरियर ईमीली, हरियर मारीचा, लहसुन, हरदी डाल के लोग पन्ना बनावें आउर ओही में भात डाल के सान के खांय. लोग इहे कुल खाय के बहुत पोढ़ रहें. गाजर आउर पलकी/बथुआ/चन्ना क साग/ केराव क साग खूब खायल जाव. इहे कुल खा के लोग शतकवीर बन जायं. अब त खान-पान बदल गयल. लोग आगे बढ़ले की चक्कर में जियल-खायल भुला गईलन. अब जेके देखा उहे व्यस्त बा. ताजा समान खाए के मिलत नाहीं. बासी-तिवासी खाय के लोग जियत ह. खाना मिल जाय, ओही के लोग नियामत समझत हवें.

आप देखीं कि बढ़ पहिले बड़-बुढ़ खईले जिय्ले क तरीका सिखावें. कुछ खायं त ओकर फयदा बतावें. इ बतावें की कईसे खायल जाला आउर काहें खायल जाला. लेकिन अब त केहू बतावे वाला हईये ना ह. केहू होबो करी त अब केहू जल्दी सुनेला नाहीं. त जाड़ा में आपो कचरस खायीं आउर उख क गुन गायीं.

(रामशंकर कुशवाहा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Bhojpuri Articles

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