Bhojpuri Spl: महिला दिवस विशेष- भोजपुरी सिनेमा में भी गढ़ाइल बा औरत खातिर दमदार किरदार

औरत के सम्मान देबे वाला, ओकरा के फिल्म में महत्वपूर्ण स्थान देबे वाला भोजपुरी सिनेमा औरत के सामान बना देहले बा. आधुनिक दौर के अधिकांश फिल्म औरत खातिर गाली बा, ई साँच बा लेकिन अइसनो नइखे कि नारी प्रधान फिल्म भा स्त्री के अस्मिता आ संघर्ष के देखावे वाला फिल्म नइखे बनल.

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  • Last Updated: March 8, 2021, 10:13 PM IST
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भोजपुरी सिनेमा के ऊपर अश्लीलता के जवन लांछन पिछला दू दशक में लागल बा उ अइसन बा जइसे सफेद चादर में लागल करिखा. चादर के चक चक सफेदी उ करिया दागी के पीछे अलोत हो गइल बा. भोजपुरी सिनेमा आपन स्वर्णिम काल देखले बा जब भारतीय सिनेमा के धुरंधर लोग एकर निर्माण कइल, एमें काम कइल. एमें एक से एक कहानी लिखाइल बा, अद्भूत किरदार गढ़ाइल बा, सदाबहार गीत-संगीत के निर्माण भइल बा. बाकिर उ सब कइल-धइल माटी में मिल गइल बा जबसे भोजपुरी सिनेमा के आधुनिक दौर आइल बा. औरत के सम्मान देबे वाला, ओकरा के फिल्म में महत्वपूर्ण स्थान देबे वाला भोजपुरी सिनेमा औरत के सामान बना देहले बा. आधुनिक दौर के अधिकांश फिल्म औरत खातिर गाली बा, ई साँच बा लेकिन अइसनो नइखे कि नारी प्रधान फिल्म भा स्त्री के अस्मिता आ संघर्ष के देखावे वाला फिल्म नइखे बनल.

आज महिला दिवस पर हम आधुनिक दौर के अइसने कुछ फिल्म आ किरदारन पर बात कर रहल बानी. आधुनिक दौर के शुरुआती फिल्म जेकरा बाद लोग के ध्यान मृतप्राय भोजपुरी फिल्म उद्योग के जगावे के ओर गइल, नारी संघर्ष के इर्द गिर्द घूमत कहानी पर बनल. फिल्म के नाम रहे कन्यादान आ एह फिल्म के कहानी बेटी के साथे हो रहल भेदभाव पर आधारित रहे. कइसे एगो बड़ जमींदार बेटियन से एतना नफरत करsतारे कि ओकनी के जन्म के बाद नदी में फेंकवा देत बाड़ें. एक बार संतान के जन्म देत में उनके पत्नी के मृत्यु हो जाता आउर जवन संतान पैदा होतिया, उ बेटी बिया. ठाकुर ओकरा के अपना आँखिन से ओही छन दूर कर देतारें बाकिर ओकरा के उनकर नौकर आ नौकरानी पोसत बाड़ें. एगो समय आवsता जब ठाकुर साहब के आपने लोग धोखा देके उनके जमीन जायदाद छीन के रास्ता पर छोड़ देता त उहे त्यागल बेटी आके उनके सहारा बनsतिया. ई फिल्म बहुत चर्चित भइल रहे.

नारी के केंद्र में रख के बहुत फिल्म लिखाइल आ बनल बाकिर कुछ फिल्म जवन अपना कंटेन्ट के साथे बिजनेस भी कइलस आ अवॉर्ड भी जितलस ओमें दू तीन गो फिल्मन के जिक्र जरूरी बा. भोजपुरी के बेहतरीन निर्देशक असलम शेख के फ़िल्म बिदाई आइल रहे. इ फिल्म भोजपुरी के कल्ट क्लासिक मानल जाले. फिल्म के कईगो अवॉर्ड मिलल आ आलोचक से लेके दर्शक तक के प्यार मिलल. फिल्म एगो बाप बेटी के कहानी रहे जे में बाप एगो निम्न मध्यम वर्ग के कर्मचारी बाड़ें आ अपना बेटी के जनमे से बहुत प्यार दुलार देतारें. उ एगो कॉलेज के साथी से प्यार करतिया लेकिन लड़की के प्यार कइल आ अपना पसंद के बियाह कइल समाज खातिर बदनामी के बात बा, एहीसे उ अपना मोहब्बत के कुर्बान करके बाप के नाक बचावे खातिर बियाह कर लेतिया. लइका के घर वाला दहेज के लोभी बाड़sसन एहीसे ओकनी का लड़की पर खूब अत्याचार करत बाड़sसन. अंत में तंग आके लड़की अपना मायके चल आवत बिया. इहाँ भी समाज ओकरा के चैन से नइखे जिए देत, ताना मार मार के ओकरा के एतना हलकान कर देत बा कि उ आत्महत्या कर ले तिया. फिल्म समाज में नारी के अस्तित्व के संकट पर सवाल करत बा.



एही क्रम में बिदाई के ही अभिनेत्री रिंकू घोष के दू गो आउर फिल्म बा जवन स्त्री के ऊपर पुरुषवादी मानसिकता आ समाज के दिवालियापन के प्रदर्शित करत बा. रिंकू घोष भोजपुरी के एगो क्लासिक अभिनेत्री के रूप में जानल जाली जे हमेशा दमदार भूमिका के साथही फिल्मन में अइली. उनके फिल्म औरत खिलौना नहीं में रिंकू के ऑपोजिट मनोज तिवारी रहलें. फिल्म के कहानी तीन गो सहेली के इर्द गिर्द बुनल बा जेकरा जीवन के आपन आपन संघर्ष बा. एगो दरिंदा जयकाल सिंह कइसे तीनू सहेलियन के जिनगी में तूफान लिआवत बा आ ओकनी के जिनगी के साथे मन मुताबिक खेलत बा अउरी समाज मूक दर्शक बन के देखत बा. फिल्म के क्लाइमैक्स में महिला दिवस के ही समारोह में जयकाल सिंह के मुख्य अतिथि बना के नाटक के माध्यम से समाज के असली चेहरा देखावे वाला आ विलेन के महिषासुर के जइसे वध करावे वाला दृश्य काफी मार्मिक आ झकझोरे वाला बा जवन ई संदेश देत बा कि औरत ही दुर्गा आ, रणचंडी हई, रानी लक्ष्मी बाई हई अउरी ओकरा से खेले वाला के विनाश निश्चित बा. फिल्म कोठा भी महिला के अवैध तरीका से फंसा के देह के धंधा करे पर मजबूर करे वाला गैंग आ ओकरा से संघर्ष करत औरत के कहानी बा. कइसे फिल्म के नायिका कोठा से निकले के सोचत बिया आ एगो नेक दिल इंसान के मिलला पर ओकर हिम्मत बढ़त बा फेर ओकरा के रोके खातिर कोठा के मालकिन अउर दबंग गुंडा साथे मिलत बाड़े सन. फेर कोठा पर इ गंदा धंधा में फँसल लड़कियन के बचावे खातिर एगो महिला पत्रकार मुहिम छेड़त बाड़ी आ कहानी अंजाम तक पहुंचत बा सब लड़की रेस्क्यू होत बाड़ी.
मिला जुला के जेतना फिल्म के जिक्र ऊपर कइल बा ओहमें नारी आपन अस्मिता आ अस्तित्व के रक्षा खातिर समाज से लड़त ही दर्शावल गइल बाड़ी. हालांकि सिनेमा समाज के आईना ह आ समाज में अइसने होत भी आ रहल बा. एकर ई माने नइखे कि समाज में कुछ सकारात्मक नईखे होत, आ नारी पुरुष के बराबरी में भा ओकरा से आगे नइखी निकलत. इ सबकुछ होत बा बाकिर भोजपुरी फिल्मन में एह तरह के सफल नारी आ सफलता के राह पर बढ़त नारी के उत्सव मनावत किरदारन के निर्माण कम भइल बा. कुछ फिल्मकार आ लेखक नारी के केवल फिलर आ फ़ैन्सी सामान के रूप में देखवला के इतर दबंग आउर मजबूत भूमिका भी देहले बा लोग, जेमें रानी चटर्जी के कुछ फिल्म उल्लेखनीय बा. रानी अपना निजी ज़िंदगी में भी बोल्ड निर्णय आ कवनो विषय पर राय रखे खातिर जानल जाली. उनके फिल्म छोटकी ठकुराइन में उनके किरदार अपना पति के ही जुल्म के खिलाफ खड़ा हो जात बा आ अंत में उनका के जीवन जिए के सबक भी सिखावत बा. रानी के ही फिल्म रानी बनी ज्वाला में उनके पुलिस के किरदार, दुर्गा में उनके बदला लेत प्रेमिका के किरदार महिला के दमदार अउरी मध्य में रखल भूमिका बाटे. हालांकि महिला के दमदार किरदार वाला कुछ आउर भोजपुरी फिल्म बनल बाटे लेकिन ओमें स्टीरियोटाइप कहानी ज्यादा बा भा हिन्दी आउर साउथ सिनेमा से प्रेरित कहानी. महिला के मुख्य भूमिका में रख के गढल मौलिक कहानी वाला भोजपुरी फिल्मन के काफी कमी बा आ महिला अस्मिता आ सम्मान के उत्सव मनावत फिल्मन के काफी स्कोप बा.

समय बदलत बा. भोजपुरी सिनेमा भी वर्तमान समय के साथे कदमताल करी, अइसन उम्मीद बा.
अंत में सिनेमा से इतर नारी अस्मिता पर लिखल अपना एगो गीत के कुछ अंश से बात ख़तम करत बानी जवन नारी दुर्दशा से व्यथित होके लिखाइल आ पर- परियार साल गाँधी संकल्प यात्रा के दौरान चंपारण से शुरू होके पूरा बिहार में घूम-घूम गवाइल-
( अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर मनोज भावुक की लोकप्रिय गीत के कुछ अंश )
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
आने दो रे आने दो, उन्हें इस जीवन में आने दो

चीरहरण का तांडव अब भी
चुप बैठे हैं पांडव अब भी
नारी अब भी दहशत में है
खेल रहे हैं कौरव अब भी
हे केशव! नारी को ही अब चंडी बनकर आने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

मरे हुए इक रावण को
हर साल जलाते हैं हम लोग
जिन्दा रावण-कंसों से तो
आंख चुराते हैं हम लोग
खून हुआ है अपना पानी, उसमें आग लगाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

नारी शक्ति, नारी भक्ति
नारी सृष्टि, नारी दृष्टि
आंगन की तुलसी है नारी
पूजा की कलसी है नारी
नेह-प्यार, श्रद्धा है नारी
बेटी, पत्नी, मां है नारी
नारी के इस विविध रूप को आंगन में खिल जाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
(लेखक मनोज भावुक सुप्रसिद्ध कवि व फिल्म समीक्षक हैं.)
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