भोजपुरी विशेष - विश्व गौरैया दिवस : कहां हेरइलीं इ चिरई

विश्व गौरैया दिवस

विश्व गौरैया दिवस

पहिले घरे क बड़का बुजुर्ग चिरइयन खातिर लड़िकन के सहेजत रहलन कि दाना पानी दे दा, पुन्य मिली. अब त बड़ा बुजुर्ग खुदे तरस जालन कि केहू पानी पूछि ले. नतीजा भइल कि अब गउरइया करीब 80 फीसदी कम हो गइलीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2021, 4:05 PM IST
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आज के भागदउड़ भरी ज़िंदगी में इंसान के पास समय कम हवे अउर काम जियादा. एक दूसरे के हालचाल पूछे खातिर व्हाट्सएप अउर मोबाइल के जरूरत पड़ ता. जउने जउने चीज से हमार लगाव रहल, उ आज के जमाना में हमसे दूर हो जा रहल बा. पहिले माता पिता से दूरी बनल त मदर्स डे फादर्स डे मनावल शुरू कइलन लोग. फिर हिंदी भासा से दूरी बढ़ल त हिंदी दिवस मनावे के जरूरत आन पड़ल. पर्यावरण बिगड़ल त पर्यावरण दिवस क शुरुआत भइल अउर एही तरह जब चिरई मने गउरइया हम सबसे दूर भइल त विश्वस्तर पर गउरइया दिवस के शुरुआत भइल. यानि गउरइया के चिता करे खातिर एक दिन तय हो गइल 20 मार्च. लेकिन केवल एक दिन हेराइल गउरइया के बारे में सोचे से कुछ ना होई. एकरा खातिर हर दिन सोचे के पड़ी, हर दिमाग के सोचे के पड़ी कि गउरइया के अस्तित्व बचवले के लिए कुछ न कुछ करब जरूरी हो गइल बा. पहिले त सोचे के परी कि एकर कारन का हवे.

आज के जमाना के बात छोड़ी द त पहिले के जमाना के केहू लड़िका अइसन न होई जे चिरई के पीछे ना भागल होई. ना धूप देखीं ना जरत जमीन, घर के आंगन हो कि दुआर, खिड़की रहै या कउनो पेड़ पौधा.. लड़िके जहां कहूं चिरई देखलेन नाहीं कि भागे लागलें ओकरे पीछे पीछे. लेकिन ए भागादउड़ी से न त चिरई कबहूं परेसान भइल अउर न त लड़िके कबहूं थकलें. भले चिरई हाथ न आवे, बाकि दउडेके बा. इ समय हर लड़िका के जिंदगी में आइल होई, जब आगे आगे गौरइया फुदकद होई अउर पीछे पीछे हम अउर आप दउड़त रहलीं. लेकिन आज के जमाना में न त लड़िकन के पास मोबाइल अउर कंप्यूटर के गेम से फुरसत हवे कि चिरई के पीछे पीछे भागैं अउर ओहसे बड़ी बात कि जब चिरइये ना देखालीं त केकरे पीछे भागीं.

पहिले समय में चिरई के मौजूदगी हर जगह रहल. बाग बगइचा से दुआरे मोहारे तक, मकान के रोशन दान से आंगन अउर गलियारे में. न गउरइया के हमसे कउनो डर रहल अउर न गउरइया के दाना पानी खातिर दूर जाए के परत रहल. चिरइयन के हर जरूरत घरहीं पूरी हो जात रहल. रहे खातिर रोशनदान मिल जात रहल अउर खाए खातिर रसोईं में बचल खुचल दाना. लेकिन अबके मकानन में न त रोसनदान के जरूरत रहेला अउर दरवाजो हरदम बंद रहेगा. ई मजबूरी हौ काहे कि बहुमंजिली इमारतन में पहिले जइसन बड़ा अउर खुला घर अब ना मिलेला. फ्लैट कल्चर वाले शहरन में अब न त खाली जमीन देखाला अउर न त पेड़ पौधा. जंगल अउर पेड़ कम भइलन त चिरई के रहे के समस्या होवे लागल. घरन में पहुंच बंद भइले से दानों पानी के समस्या बढ़ि गइल. प्रदूषण बढ़ले से चिरई के जिंदगी मोहाल हो गइल. ओकरे ऊपर मोबाइल टावर से निकलल तरंग गउरइया की ज़िंदगी में नासूर बन गइल. नतीजा भइल कि चिरई हमरे जिंदगी से दूर हो गइल. अह न गउरइया देखालीं अउर न ही कउवा. सुबह शाम अब न त चिरइयन के चहंचहाहट सुनाई परेला अउर न ही एनके दर्सन हो पावेला.

दुनिया भर में गउरइया के 26 प्रजाति हवे लेकिन भारत में केवल छ: प्रजाति के गउरइया मिलेलीं जइसे हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, डेड सी स्पैरो, ट्री स्पैरो अउर रसेट स्पैरो. गउरइया ‘पासेराडेई‘ परिवार क सदस्य हवे. एकर लंबाई 16 सेंटीमीटर तक होला अउर वजन 25 से 35 ग्राम. गउरइया के संकट काफी पहिले से शुरु भइल रहल लेकिन जब 2010 में दुनिया क ध्यान गइल तब 20 मार्च के विश्व गउरइया दिवस मनावे के शुरुआत भइल. पक्षी वैज्ञानिकन मानलें कि अब समय आ गइल बा कि गउरइया के बसावे खातिर अपने घर अउर आसपास माहौल बनावे के पड़ी. ओनकरा खातिर घर बनावे के पड़ी. कुछ स्वयंसेवी संस्था आगे आ के एनके खातिर काम करत हवीं. लोगन के जागरूक करत हवीं कि चिरई के फिर घर आंगन में बुलावे के हौ. स्पैरो हाउस मने चिरई के कृतिम घर लोगन के बांटल गइल हौ. निवेदन करल गइल बा कि चिरई खातिर कुछ दाना पानी रखेके चाहीं. चिरई जइसन सुंदर सीधा अउर सरल पक्षी के बचावे खातिर आज आपौ के प्रण करेके चाहीं कि अपने घर में कहूं सुरक्षित जगह चिरई के घर बनावे के हौ अउर दाना पानी का व्यवस्था करे के हौ. तबे अपने घर आंगन में चिरई के चहंचहाहट दोबारा सुनल जा सकेला. फेर बचपन के खेलउना के आंगन में लउटावल जा सकेला. ( डिसक्लेमर- लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)
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