Bhojpuri में पढ़ें, गोस्वामी तुलसीदास के जीवन के दू गो रोचक प्रसंग

गोस्वामी तुलसीदास अमर ग्रंथ “रामचरितमानस” के रचयिता रहन. उनका जीवन से संबंधित एतना प्रसंग बाड़े सन कि हर कोई ओकरा के बार- बार सुनल चाहेला. आज हम रउआ के दो ओइसही रोचक प्रसंग के बारे में बता रहल बानी.

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अमर ग्रंथ “रामचरितमानस” के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास के जीवन से संबंधित जतना प्रसंग बाड़े सन, ओकरा के बार- बार सुने के मन करेला. एही में से दू गो प्रसंग रउरो सुनीं. एक बेर तुलसीदास के मन में पुरी जाके भगवान जगन्नाथ जी के दर्शन करे के इच्छा जागल. तुलसीदास पहुंचि गइले पुरी. मंदिर में गइले त देखले कि ई त भगवान के बिना हथेली- पंजा वाली काठ के मूर्ति बिया. हाथ ठूंठ आ पैर ठूंठ. परम प्रिय राम के मूर्ति त नइखे. भगवान के आंख गोल- गोल बा. ई कइसन मूर्ति? भगवान राम के मूर्ति त एइजा नइखे.

दर्शन कइला का बाद मंदिर से बाहरा निकलले आ दुखी मन से एगो पेड़ के नीचे गमछा बिछा के बिना कुछु खइले- पियले लेटि गइले. थोरहीं देर में उनुकरा नींन लागि गइल. नींन टूटल त सांझे हो गइल रहे. भूख नियर लागल बाकिर फेर पानी पीके आ भगवान राम के ध्यान धइले. रात के आठ बजे देखतारे कि एगो छोट खूब सुंदर लइका हाथ में भोजन परोसन थरिया लेके आ कहता- तुलसीदास के ह? तुलसीदास चिहुंकले. कहले कि हम हईं तुलसीदास. लइका कहलस कि लीं भगवान जगन्नाथ रउरा के भोग भेजले बाड़े. तुलसीदास कहले कि बचवा, हम त अपना रामजी के प्रसाद चढ़ा के भोजन करेनीं. ई भोजन त जगन्नाथ जी के जूठ ह. कइसे खाईं?

लइका कहलस कि तब रउरा रामचरितमानस में भगवान का बारे में काहें लिखले बानीं-
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना. कर बिनु करम करइ बिधि नाना..
आनन रहित सकल रस भोगी. बिनु बानी बकता बड़ जोगी..

तुलसीदास अवाक. उनुका लागि गइल कि ई लइका केहू साधारन लइका ना ह. ऊ लइका के गोड़ छू के प्रणाम कइले आ कहले कि हे प्रभु रउवां के हईं? लइका अंतर्ध्यान हो गइल आ आवाज आइल- तोहार प्रिय ईष्टदेव “राम”. तुलसीदास तत्काल भोजन प्रारंभ क दिहले आ हंसि के सोचे लगले- भगवाने के कृपा से हम रामचरितमानस लिखलीं. उनहीं के कृपा से पुरी आइल बानी. तब हमरा मन पर भगवान ई परदा काहें डलले ह? उनुका लागल कि कान में केहू कहता- अपना भक्त का संगे, अइसन कुल खेल करे में हमरा मजा आवेला. ई ना रहे त आनंद कइसे आई? तुलसीदास तृप्त होके भोजन कइले आ रात भर भगवान के प्रेम रस में गोता लगवले. बिहान भइला उनुका लागल कि ई प्रेम रस अनंत काल खातिर उनुका के मिलल बा. ई खतम ना होई. पुरी दर्शन बाद तुलसीदास बनारस खातिर प्रस्थान कइले.

अब दोसरका प्रसंग.

तुलसीदास बनारस में एगो राम मंदिर में रहत रहले. ओह मंदिर में सोना के बर्तन में प्रसाद चढ़ावल जाउ. सोना के बर्तन मंदिरे में रहे आ मंदिर चौबीस घंटा खुलल रहे. एगो चोर के मन में आइल कि जब आधा रात होई त मंदिर में ढुकि के सोना के बरतन चोरा लेब. जब आधा रात भइल त चोरवा मंदिर पर पहुंचल. दुआरी पर गइल त का देखता कि दू गो सुंदर किशोर उमिर के लइका धनुष- बाण लेके मंदिर के दुआरी पर पहरा देता लोग. चोर डेरा के भागल. बिहान भइला चोरवा भक्त के रूप धके तुलसीदास से कहलसि कि बाबा रउरा मंदिर पर रात के के पहरा देला? तुलसीदास कहले कि केहू ना. रात के त अकेले हम्हीं रहेनीं आ अपना कुटी में सूते चलि जानीं. मंदिर अइसहीं खुला रहेला. त चोरवा कहलस कि ना बाबा, रात खान हम आइल रहुईं त देखुवीं कि मंदिर के दुआरी पर धनुष- बाण लेले दू गो लइका खड़ा रहुअन स. तुलसीदास बुझि गइले कि भगवान स्वयं आके मंदिर पर पहरा दे रहल बाड़े. ऊ रोए लगले- प्रभु, हम रात के सूततानी आ रउवां मंदिर पर पहरा देतानी? अब हम जागब आ मंदिर के देखभाल करब. रउवां पहरा मत दीं. तुलसीदास के प्रार्थना भगवान कइसे टारसु. ओह रात के चोर आइल त सचहूं केहू पहरा ना देत रहे. तुलसीदास चोर के आहट पवले. उठि के बइठि गइले. चोर मंदिर में गइल, सोना के बर्तन उठवलस आ अपना झोरी में डालि के निकलि गइल.

तुलसीदास राहत के सांस लिहले. सोचले कि चल सोना के बर्तन भक्ति का मार्ग में बाधा रहल ह. ई बाधा खतम भइल. तले देखतारे कि एगो सोना के कटोरी चोर छोड़ि देले बा. ओकरा के लेके चोर के देबे खातिर तुलसीदास दउरले. चोर जनलस कि तुलसीदास ओकरा के धरे के चाहतारे. ऊ अउरी जोर से दउरल. एह दौरा- दौरी में चोर एक जगह भदाक दे गिर गइल. तुलसीदास दउरि के ओकरा के ध लिहले आ कहले कि- ले तें हई कटोरी छोड़ि आइल रहले ह. चोर त अवाक. ई का. लोग त चोर के धके मारेला. आ ई तुलसी बाबा कहतारे कि- ले हइहो ले जो. चोरवा तुलसीदास के गोड़ पर गिर परल आ कहलसि- “बाबा, जब रउरा सोना के बर्तन के कुछु नइखीं बूझत त जरूर रउरा लगे एकरा से ढेर कीमती कुछु होई. हमरा के ऊहे कीमती चीज दीं. हई कुल सोना के बरतन ले जाईं. हमरा के एकरा ले ऊ मूल्यवान चीज दीं, जौन सोना से भी कीमती बा.” तुलसीदास कहले कि ऊ कीमती सामान लेबे खातिर तोहरा चोरी छोड़े के परी. चोर कहलसि कि ठीक बा, एही छन से हम चोरी छोड़ि दिहनी. लीं हई आपन सोना के बर्तन. भगवान के भोग एही में लागी. बाकिर हमरा के ऊ चीज देदीं. तुलसीदास ओकरा के अपना कुटी में ले अइले आ कहले कि बिहान भइला ऊ कीमती चीज तोहरा के मिली. चोर आराम से सूति गइल. बिहान भइला तुलसीदास ओह चोर के रामनाम के दीक्षा दिहले आ ऊ चोर साधु का रूप में रूपांतरित हो गइल.

कुछ लोग कहेला कि ई तुलसीदास के जीवन से जुड़ल किंवदंती हई सन. अब किंवदंती कहीं भा प्रसंग, का फरक परता. तुलसीदास के जीवन में अउरुओ ढेर अइसन प्रसंग आइल बाड़े सन जौन सुनि के आनंद आ जाला. जइसे चित्रकूट वाली घटना-
चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर.
तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर..

जे भगवान राम के आपन सर्वस्व मान लेले बा, ओकरा जीवन के कहहीं के का बा.

(विनय बिहारी सिंह वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यह उनके निजी विचार हैं.)

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