Loksabha Election 2019: रेणु के आंगन में फिर जलेगी लालटेन या खिलेगा कमल?

अररिया लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें आती हैं. जिसमें नरपतगंज, रानीगंज (एससी), फारबिसगंज, अररिया, जोकीहाट और सिकटी शामिल है. 6 में से 4 विधानसभा क्षेत्र में NDA का कब्जा है. जबकि 1-1 सीट कांग्रेस-RJD के कब्जे में है.

Vijay jha | News18 Bihar
Updated: April 23, 2019, 7:30 AM IST
Loksabha Election 2019: रेणु के आंगन में फिर जलेगी लालटेन या खिलेगा कमल?
अररिया समाहरणालय
Vijay jha | News18 Bihar
Updated: April 23, 2019, 7:30 AM IST
साहित्यकार फणिश्वर नाथ 'रेणु' ने इलाके की बदहाली का सजीव चित्रण साठ के दशक में किया था. आज भी यह क्षेत्र कमोबेश वैसा ही नजर आता है. हालांकि शहर से लेकर गांवों तक में सड़कें और बिजली के खंभे जरूर पहुंचे हैं, जो थोड़े बदलाव की तस्दीक करते हैं. लेकिन सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक विकास में निचले पायदान पर खड़ा जिला यहां के विकास की सच्ची कहानी कहता है.

पिछड़ेपन के सवालों के बीच चुनाव में स्थानीय मुद्दों के साथ यहां राष्ट्रीय मुद्दे भी हावी रहते हैं. किसानों का मानना है कि इस चुनाव में कर्जमाफी का मुद्दा होगा. युवा विकास को मुद्दा बता रहे हैं तो वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो स्थानीय मुद्दे को तरजीह दे रहे हैं. हर वर्ग के अपनी आशा-आकांक्षा है, लेकिन सबमें कॉमन यही है कि लोग तेज गति से विकास चाहते हैं और इस बार विकास ही सबस बड़ा मुद्दा होगा.



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सियासत अपनी जगह है और क्षेत्र का विकास अपनी जगह. सियासत के बीच भी क्षेत्र का विकास हो सकता है. लेकिन यहां के प्रतिनिधियों ने अब तक इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया. यही कारण है अररिया आज देश के पिछड़े जिलों की सूची में शामिल है.

अररिया के कुसियारगांव का बायो डायवर्सिटी पार्क


जिला विकास की दौड़ में दूसरे जिलों से काफी पीछे छूट गया है. यही कारण है यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी है. सांसद सरफराज इस क्षेत्र के पिछड़ेपन के लिए केन्द्र सरकार की नीतियों को जिम्मेदार बता रहे हैं.

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अररिया लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें आती हैं. जिसमें नरपतगंज, रानीगंज (एससी), फारबिसगंज, अररिया, जोकीहाट और सिकटी शामिल है. 6 में से 4 विधानसभा क्षेत्र में NDA का कब्जा है. जबकि 1-1 सीट कांग्रेस-RJD के कब्जे में है.

2009 में परिसीमन के बाद यह सीट सामान्य हो गयी. यहां 17 लाख 37 हजार 468 वोटर हैं. जिनमें 9 लाख 19 हजार 115 पुरुष और 8 लाख 18 हजार 286 महिला मतदाता हैं. यहां 1989 से ही MY समीकरण का दबदबा रहा है.

अररिया शहर का जीरो माइल चौराहा


इस लोकसभा में लगभग 54 प्रतिशत हिंदू आबादी है, तो 46 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. हिंदू मतदाताओं में लगभग पांच से छह प्रतिशत यादव मतदाता हैं. 2014 के चुनाव में MY समीकरण सफल हुआ और तस्लीमुद्दीन आसानी से चुनाव जीत गए थे.

17 सितंबर 2017 को तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद यहां उपचुनाव हुआ. उपचुनाव में तस्लीमुद्दीन के बड़े बेटे सरफराज आलम ने BJP के प्रदीप सिंह को हराया. इस सीट पर हाल के दिनों में BJP और RJD के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है. ऐसे तो इस बार यहां 12 प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन इस बार भी सरफराज और प्रदीप सिंह के बीच ही मुख्य मुकाबला माना जा रहा है.

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मौजूदा सांसद सरफराज आलम अभी एक साल पहले उपचुनाव में जीते हैं. इसलिए उनके कार्यकाल को लेकर ज्यादा सवाल नहीं उठाए जा सकते. स्थानीय लोग भी कम समय का हवाला देकर सरफराज को वाक ओवर दे रहे हैं.

क्षेत्र के विकास के दावों के बीच जिस तरह गरीबी और पिछड़ापन इस क्षेत्र की हकीकत है, इसी तरह भूतपूर्व सांसद तस्लीमुद्दीन को लेकर यहां दो मत है. बाहुबली माने जाने वाले तस्लीमुद्दीन 'सीमांचल के गांधी' उपनाम से मशहूर थे.

अररिया का प्रसिद्ध काली मंदिर


स्थानीय सांसद सरफराज आलम को राजनीति विरासत में मिली. उनके पिता तस्लीमुद्दीन केन्द्र सरकार में मंत्री भी रहे. मौजूदा सांसद का दावा है कि उनके पिता ने अररिया ही नहीं पूरे सीमांचल के विकास के लिए पहल की. अब वो पिता के काम को आगे बढ़ा रहे हैं.

सरफराज का कहना है कि क्षेत्र के विकास के लिए उन्होंने अररिया को अति पिछड़े जिलों की सूची में शामिल कराया. जिसका फायदा ये होगा कि केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के लिए क्षेत्र के विकास के लिए विशेष फंड मिलेगा.

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वह ये भी दावा करते हैं कि उन्होंने अररिया के विकास के लिए केन्द्र सरकार के सभी मंत्रियों से बात की और यहां के विकास पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया.

बहरहाल दावों और वादों के बीच विकास की हकीकत ये है कि अररिया में जिले में 5 लाख 988 परिवार ऐसे हैं जो गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने को मजबूर हैं. शिक्षा का हाल जिले का निम्न साक्षरता दर बताने के लिए काफी है.

अररिया जिले की मात्र 53.53 आबादी ही साक्षर है, जिनमें से मात्र 43.91 फीसदी महिलाएं ही पढ़ना-लिखना जानती हैं. गरीबी और अशिक्षा का असर जिले की जनसंख्या वृद्धि दर पर दिखता है. 2001-2011 के बीच अररिया जिले की जनसंख्या वृद्धि दर 30 प्रतिशत रही.

अररिया के दियागंज का मस्जिद


किसानों और खेतिहर मजदूरों का ये हाल बताने के लिए काफी है कि अररिया जिला कितना पिछड़ा हुआ है. नीति आयोग ने मार्च 2018 में देश के 101 पिछड़े जिलों की सूची जारी की थी. जिसमें बिहार के 12 जिले शामिल थे. उन 12 पिछड़े जिलों में अररिया पहले पायदान पर था.

नीति आयोग के मुताबिक अररिया जिले में शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी है. खुद स्थानीय सांसद सरफराज अहमद भी मानते हैं कि यहां स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की स्थिति बदतर है.

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जाहिर तौर पर अररिया की ये तस्वीर बदलनी चाहिए. यहां के लोगों का भी जीवन स्तर ऊंचा होना चाहिए. यहां की गरीब जनता को भी वो सारी सुविधाएं मिलनी चाहिए जो केन्द्र और राज्य की सरकारें गरीबों के नाम पर चलाती हैं.

फणिश्वर नाथ रेणु का गांव औराही हिंगना


बहरहाल 'मैला आंचल' और 'परती परिकथा' में फणीश्वर नाथ 'रेणु' ने इस क्षेत्र के लोगों की गरीबी और बेबसी का जिक्र किया है. रेणु ने आजादी के बाद गांव की गरीबी और बदहाली को दिखाया है. क्षेत्र में कैसे नेता स्वार्थ की राजनीति में डूबे हैं रेणु ने इसका भी जिक्र किया था.

रेणु के उपन्यास का अररिया और आज के अररिया में कोई बहुत फर्क नहीं है. आज भी इस इलाके की आबादी गरीबी का दंश झेल रही है. इन सबके बीच लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बड़ा सवाल यही है कि क्या रेणु के 'आंगन' में एक बार फिर लालटेन ही जलेगी या फिर कमल खिलेगा?

रिपोर्ट- अमित कुमार/सतीश कुमार

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