बिहार इलेक्शन रिजल्ट: अररिया में राजद के 'MY' समीकरण के आगे फेल हुआ बीजेपी का 'ISIS कार्ड '

2000 में राष्ट्रीय जनता दल की टिकट पर पहली बार आलम विधानसभा के लिए चुने गए. सरफराज अब तक बिहार विधानसभा के लिए तीन बार चुने गए हैं.

Amrendra Kumar | ETV Bihar/Jharkhand
Updated: March 15, 2018, 1:17 PM IST
बिहार इलेक्शन रिजल्ट: अररिया में राजद के 'MY' समीकरण के आगे फेल हुआ बीजेपी का 'ISIS कार्ड '
अररिया के चुनावी सभा में तेजस्वी और सरफराज
Amrendra Kumar | ETV Bihar/Jharkhand
Updated: March 15, 2018, 1:17 PM IST
बिहार की अररिया सीट पर 'सीमांचल के गांधी' कहे जाने वाले तस्लीमुद्दीन के परिवार का कब्जा बरकरार रहा है. राजद के कद्दवार नेता के निधन के बाद से खाली हुई इस सीट को उनके ही बेटे सरफराज आलम ने जीत लिया है. चुनाव से ठीक पहले उन्होंने नीतीश का दामन छोड़ राजद का हाथ थामा और राजद से सांसद के लिये उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल किया.

उन्होंने उपचुनाव में बीजेपी के नेता प्रदीप सिंह को 59613 मतों के भारी अंतर से हराया. अररिया के रहने वाले सरफराज आलम अब राष्‍ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता हैं. उन्होंने उपचुनाव में बीजेपी के प्रदीप सिंह से निर्णायक बढ़त ली है और शुरूआती के कुछ राउंड के बाद से उसे बरकरार रखा.

पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और राजद के बड़े चेहरे मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम उस वक्त सुर्खियों में आये थे जब उनका नाम राजधानी एक्सप्रेस मेें  बदतमीजी और छेड़खानी से जुड़े एक मामले में जुड़ा था. वो अरारिया जिले के जोकिहट से विधानसभा कई बार चुने गए हैं. उस समय उन्हें पार्टी ने बाहर का रास्ता भी दिखा दिया था.

2000 में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर सरफराज पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए. सरफराज अब तक बिहार विधानसभा के लिए तीन बार चुने गए हैं. बीजेपी ने अररिया सीट जीतने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगाया था. खुद सीएम नीतीश और डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने एक ही दिन में वहां तीन सभाएं की थीं और वोट मांगा था लेकिन वोटर्स ने एनडीए की इस अपील और विकास के दावों को नकार दिया.

11 मार्च को हुए मतदान से ठीक एक दिन पहले बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नित्यानंद राय ने विवादित बयान देकर अररिया के चुनाव को सांप्रदायिक रंग दिया था. उनके इस बयान को लेकर काफी हाय तौबा मचा था. नित्यानंद राय ने कहा था कि अररिया सीट पर अगर आरजेडी का उम्मीदवार जीता तो यह इलाका आतंकवादी संगठन आईएसआईएस (ISIS) के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन जाएगा लेकिन अगर बीजेपी उम्मीदवार प्रदीप सिंह को जीत मिलती है तो क्षेत्र में देशभक्ति की भावना बढ़ेगी.

लेकिन राय के इस बयान का तस्लीमुद्दीन और राजद के गढ़ में कोई असर नहीं हुआ और जेडीयू छोड़कर आरजेडी में आए सरफराज आलम अपनी पिता की सीट बचाने में कामयाब रहे. इस जीत ने एक बार फिर से बिहार के सीमांचल इलाके में राजद के प्रभुत्व को भी कायम रखा है. लालू की गैरमौजूदगी में भी राजद ने इस सीट को जीत लिया है.

बीजेपी की हार के पीछे का सबसे बड़ा कारण उसकी इंटरनल पॉलिटिक्स और वोटरों को ध्रुवीकरण न होना है. स्थानीय पत्रकार के अनुसार, इस सीट पर बीजेपी वोटरों के ध्रुवीकरण करने में असफल रही है और हार के लिए काफी हद तक बीजेपी की अंदरुनी पॉलिटिक्स ही जिम्मेदार रही. इस सीट से पार्टी के कई कद्दवार नेता बतौर उम्मीदवार दावेदार थे. लेकिन अति पिछड़ी जाति के प्रदीप सिंह को बीजेपी ने उम्मीदवार बनाया जिससे बनिया और महादलित वोटरों में प्रदीप सिंह को कैंडिडेट बनाने से नाराजगी दिखी.

अररिया लोकसभा सीट पर कुल वोटरों की संख्या 17 लाख 38 हजार 867 है. जिसमें मुस्लिम- 6 लाख 37 हजार, यादव- 2 लाख 51 हजार, भूमिहार- 18 हजार, राजूपत- 15 हजार, मुसहर- एक लाख 47 हजार 840, पासवान- 45 हजार 312 अन्य- 6 लाख 87 हजार है.
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