अरवल विधानसभा: जातिगत वोटों के आधार पर ही हर चुनाव में लिखी जाती है जीत की स्क्रिप्ट

बिहार की अरवल सीट से पार्टी के वर्तमान और पूर्व विधायक (फाइल फोटो)
बिहार की अरवल सीट से पार्टी के वर्तमान और पूर्व विधायक (फाइल फोटो)

Bihar Assembly Elections: बिहार की अरवल सीट पर 2015 में बीजेपी का कब्जा था लेकिन 2015 में इस सीट से राजद ने जीत हासिल की. इस बार के भी चुनाव में अरवल में सीधी लड़ाई एनडीए बनाम महागठबंधन रहने की उम्मीद है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 21, 2020, 11:16 AM IST
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अरवल. बिहार के अरवल जिले की पहचान कभी नक्सलियों और उग्रवाद तथा नरसंहार के गढ़ के रूप में होती थी. सोन नदी के किनारे बसे इस जिले की सीमा एक तरफ जहानाबाद (Jehanabad) से लगती है तो इसके पड़ोस के जिलों में औरंगाबाद और अरवल भी शामिल हैं. अरवल विधानसभा (Arwal Seat) क्षेत्र 1951 में अस्तित्व में पहली बार आया. कई सामूहिक नरसंहार का दंश झेल चुके इस विधानसभा क्षेत्र में पहली बार सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर गोदानी सिंह ने कांग्रेस पार्टी के चंद्र भूषण सिंह को पराजित किया था. शुरुआती दौर से ही अगर विजयी प्रत्याशियों की सूची देखा जाए तो इस बार इस विधानसभा क्षेत्र में किसी एक पार्टी का कभी भी दबदबा नहीं रहा है.

1957 में कांग्रेस तो 2015 में राजद का कब्जा

निर्दलीय प्रत्याशी सर्वाधिक इस सीट से जीते हैं जबकि कांग्रेस, सीपीआई राजद और लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले लोग भी जीत का परचम लहरा चुके हैं. 1957 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के बुद्धन मेहता ने सीपीआई के प्रत्याशी को हराया था वहीं 1962 में एक बार फिर से बुधन मेहता विजय हुए थे. लगातार दूसरी बार इन्होंने जीत का परचम लहराया था. 1967 में सीपीआई का जुबेर विजय हुए 1969 में एक बार फिर से जुबेर ने अपनी सीट को बरकरार रखा था. 1972 में निर्दलीय प्रत्याशी रंग बहादुर सिंह विजय घोषित किए गए थे.1977 में जनता पार्टी के प्रत्याशी बालेश्वर प्रसाद सिंह को करारी शिकस्त दी थी 1990 में निर्दलीय प्रत्याशी ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को शिकस्त दी थी.



इस बार भी सीधी लड़ाई
1995 में जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ रहे रविंद्र सिंह ने सीपीआईएमएल के प्रत्याशी रामाधार सिंह को हराया था, वहीं 2000 के विधानसभा चुनाव में राजद प्रत्याशी डॉक्टर अखिलेश प्रसाद सिंह ने शाह चांद को पटखनी देते हुए अपनी जीत सुनिश्चित करते हुए बिहार के मंत्री पद पर भी सुशोभित हुए थे. 2005 में लोजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे दुलारचंद यादव ने अखिलेश प्रसाद सिंह की पत्नी वीणा देवी को हराया था. वर्ष 2010 के चुनाव की अगर बात की जाए तो भाजपा के प्रत्याशी चितरंजन कुमार ने सीपीआई एमएल के महानंद प्रसाद को हराया था. 2015 के चुनाव में राजद के रविंद्र सिंह को चुनावी अखाड़े में उतारा गया था. इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी चितरंजन कुमार को राजद प्रत्याशी ने भारी मतों से शिकस्त दी थी.

इस विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या 254443 है जिसमें पुरुष मतदाता 132101 और महिला मतदाताओं की संख्या 122340 है. मूल रूप से इस विधानसभा क्षेत्र की जो समस्या सामने आती है उसमे जिले में अब तक रेलवे लाइन के कार्य नहीं किया किया जाना है. कई लोग मतदान के समय में ऐसे मुद्दे उठाते हैं लेकिन जातीय मुद्दे की इतनी चर्चा होती है कि समीकरण अंतिम समय में बदल जाता है. इस बार के चुनाव में लोकल की बात की जा रही है. इस विधानसभा क्षेत्र में कुशवाहा, यादव और भूमिहार जाति का ही बोलबाला है और इन्हीं के वोटों की सभी पार्टियों के उम्मीदवार तय किये जाते हैं.
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