कुर्था विधानसभा: सेनारी नरसंहार से चर्चित इस इलाके में आसान नहीं होगी NDA की राह

बिहार की कुर्था सीट से जीत-हार की कुंजी जातिगत समीकीरण के ईर्द-गिर्द ही घूमती है
बिहार की कुर्था सीट से जीत-हार की कुंजी जातिगत समीकीरण के ईर्द-गिर्द ही घूमती है

Bihar Assembly Election: बिहार की कुर्था सीट से विधायक सत्यदेव सिंह कुशवाहा के इलाके में विरोध का एक वीडियो पिछले दिनों सोशल मीडिया में काफी तेजी से वायरल हुआ था, ऐसे में इस सीट से लोग प्रत्याशी बदलने की भी मांग कर रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 27, 2020, 6:22 AM IST
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अरवल. बिहार के अरवल जिले की दो विधानसभा सीटों में से एक कुर्था सीट (Kurtha Assembly Seat) भी है. कभी नरसंहारों को लेकर चर्चित कुर्था विधानसभा में आज माहौल में काफी परिवर्तन हुआ है. सत्ता पर काबिज होने के बाद यहां कई कांटों की लड़ाई कई बार हो चुकी है लेकिन इस बार के चुनाव में एनडीए (NDA) के लिए जीत की राह आसान नहीं दिख रही, इसका कारण इलाके में विकास का न होना है. जिले के विधानसभा क्षेत्र में एनडीए-महागठबंधन (Grand Alliance) के बीच कांटे की टक्कर लगातार होती रहती है. इस विधानसभा क्षेत्र में जातिगर रणनीति की बात करें तो यादव कोइरी और भूमिहार जातियों से लगातार चुनावी टक्कर होती रहती है. कुर्था विधानसभा सीट पहले जहानाबाद जिले में था. 20 अगस्त 2001 को अरवल जिले की स्थापना हुई और कुर्था विधानसभा अस्तित्व में आया.

स्टिंग में फंस चुके हैं विधायक

विधानसभा चुनाव होने के बाद इस क्षेत्र में सेनारी नरसंहार बहुत चर्चित हुआ और ये इलाका देश के पटल पर आ गया. बिहार के हर विधानसभा क्षेत्र के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है सियासी पार्टी सीट के हिसाब से अपने प्रत्याशी इस विधानसभा क्षेत्र में करते हैं लेकिन इस बार लोकल प्रत्याशियों की मांग ज्यादा होने लगी है. हालांकि बीते विधानसभा क्षेत्र में चुनाव के दौरान जदयू के सत्ताधारी विधायक स्टिंग ऑपरेशन में फंसे थे. उनके ऊपर चुनाव आयोग के निर्देशानुसार निर्वाचन अधिकारी ने मामला दर्ज किया था.



कैसा रहा है चुनावी इतिहास
जातीय समीकरण इस विधानसभा क्षेत्र में सबसे बड़ा मुद्दा होता है. इस मुद्दे के बाद ही विधानसभा क्षेत्र में उनके प्रत्याशी चुनाव में हार और जीत तय करते हैं. खासकर कोईरी, यादव और भूमिहार जाति इस विधानसभा क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाकर विधानसभा प्रत्याशी को जीत दिलाते हैं. फिलहाल इस सीट पर जेडीयू का कब्जा है लेकिन इस बार के चुनाव में हालात और परिस्थितियां भिन्न हैं. पिछले 5 बार के चुनाव पर अगर नजर डालें तो इस विधानसभा क्षेत्र से वर्ष 1990 में मुंद्रिका सिंह यादव जनता दल के टिकट पर विजयी हुए थे. उसके बाद 1995 में सहदेव प्रसाद यादव, 2000 में शिव बचन यादव आरजेडी के टिकट से जीते इसके अलावा लोजपा के टिकट से नागमणि की पत्नी सुचित्रा देवी भी भारी मतों से विजयी हुई थीं, जिन्हें बिहार सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री बनाया गया था. 2010 में सत्यदेव कुशवाहा और 2015 में भी इन्हीं को विजयी घोषित कर यहां की जनता ने विधानसभा भेजा.

वोटर्स

इस विधानसभा क्षेत्र में पुरुष मतदाता 103437 से वही महिला मतदाता 87525 बताई जा रही है. इस विधानसभा में चुनावी दंगल में इस पर बाजी किसके हाथ होगी यह सवाल सिर पर चढ़कर बोल रहा है साथ ही पूरे बिहार की राजनीति भी मगध और आसपास के इलाकों पर टिकी रहती है.

समस्या

अरवल जिले के कुर्था विधानसभा क्षेत्र में सिंचाई बड़ी सबसे बड़ी समस्या उत्पन्न होकर सामने आती है. इस इलाके में अब तक सिंचाई के लिए कोई ठोस पहल नेताओं ने नहीं की यही कारण है कि आज भी इस इलाके में किसानों के लिए सिंचाई की व्यवस्था लगभग न के बराबर होती है. कृषि का कार्य इन इलाकों में इंद्र भगवान के भरोसे होता है. वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नेनुआ नाला का उद्घाटन कर इस जिले सहित अरवल और औरंगाबाद जहानाबाद जिले के लिए तोहफे के रुप में विकास यात्रा के दौरान दिया था महत्वकांक्षी परियोजना के मुख्यमंत्री के द्वारा उद्घाटन किए जाने के बाद इस इलाके के किसानों को बड़े ही आशा जगी थी कि अब उन्हें भगवान भरोसे कृषि कार्य नहीं कर रहा होगा लेकिन वह भी आज भी अधूरा पड़ा हुआ है. कुर्था में रेफरल अस्पताल कई वर्षों से लोगों की मांग होती रही है लेकिन अभी निर्माण कार्य नहीं हो पाया है. अगर पिछले 5 वर्षों में कुर्था विधानसभा क्षेत्र में सबसे अगर विकास की बात की जाए तो नदी नालों से घिरे क्षेत्र में अधिकांश जगहों पर पुनपुन नदी में पुल का निर्माण कराया गया और प्रमुखता से सड़क भी बनाई गई.
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