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इस रेलवे स्‍टेशन पर साल में केवल 15 दिन ठहरती है ट्रेनें
Aurangabad-Bihar News in Hindi

News18
Updated: September 17, 2014, 7:21 AM IST
इस रेलवे स्‍टेशन पर साल में केवल 15 दिन ठहरती है ट्रेनें
गया-मुगलसराय रेलखंड पर एक ऐसा रेलवे स्‍टेशन है जहां पूरे साल में केवल 15 दिन रेलगाड़ियां ठहरती हैं। दरअसल इस रेलखंड पर अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन को पुनपुन नदी में पूर्वजों का पिंडदान के लिए आने वाले लोगों को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। इसलिए इस स्‍टेशनपर पूरे साल में केवल पितृपक्ष के दौरान ही ट्रेने ठहरती हैं।

गया-मुगलसराय रेलखंड पर एक ऐसा रेलवे स्‍टेशन है जहां पूरे साल में केवल 15 दिन रेलगाड़ियां ठहरती हैं। दरअसल इस रेलखंड पर अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन को पुनपुन नदी में पूर्वजों का पिंडदान के लिए आने वाले लोगों को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। इसलिए इस स्‍टेशनपर पूरे साल में केवल पितृपक्ष के दौरान ही ट्रेने ठहरती हैं।

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  • Last Updated: September 17, 2014, 7:21 AM IST
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गया-मुगलसराय रेलखंड पर एक ऐसा रेलवे स्‍टेशन है जहां पूरे साल में केवल 15 दिन रेलगाड़ियां ठहरती हैं। दरअसल इस रेलखंड पर अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन को पुनपुन नदी में पूर्वजों का पिंडदान के लिए आने वाले लोगों को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। इसलिए इस स्‍टेशनपर पूरे साल में केवल पितृपक्ष के दौरान ही ट्रेने ठहरती हैं।

भास्‍कर डॉट कॉम की खबर के मुताबिक इस क्षेत्र में अनुग्रह नारायण रेलवे स्टेशन मुख्य रेलवे स्टेशन है। जबकि अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन हाल्ट है। पुनपुन नदी में पिंडदान के लिए सिर्फ पितृपक्ष में ही यहां लगभग सभी ट्रेनों का ठहराव होता है और दूर-दूर से यात्री आते हैं।

अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन पर टिकट काउंटर, यात्री शेड जैसी सुविधाएं हैं, पर 'पितृपक्ष स्पेशल' इस स्टेशन पर किसी रेलकर्मी की स्थायी तैनाती तक नहीं है। पितृपक्ष के दौरान यहां चार-पांच कर्मियों की अस्थाई तैनाती होती है।

वर्षों पहले यहां कुछ ट्रेनों को छोड़ सारी ट्रेनों का ठहराव पितृपक्ष के दौरान होता था। अब उपेक्षा की हालत यह है, कि पिंडदानियों के लिए एक-दो पैसेंजर ट्रेनों के अलावा कोई ट्रेन नहीं रुकती, जबकि इस रूट से पितृपक्ष के दौरान गया-जबलपुर, गया-हबीबगंज जैसे स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं। इससे यात्रियों को भारी परेशानी हो रही है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि मानव रूपी भगवान ने यहां कभी अपने पुरखों के मोक्ष के लिए पहला पिंडदान किया था। इसके बाद से ही यहां पिंडदान करने की परंपरा शुरू हो गई। पिंड़दानियों को ठहरने के लिए कलकत्ता के सेठ सुरजमल बड़जात्या ने सालों पहले यहां तीन एकड़ जमीन में फैले करोड़ों रुपए का एक खुबसूरत धर्मशाला निर्माण कराया था। वर्तमान में वह देख-रेख की अभाव में बर्बाद होने की कगार पर पहुंच गया है।

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First published: September 16, 2014, 7:22 PM IST
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