Loksabha Election 2019: राजनीति की तपोभूमि बांका में क्या इस बार भी बहेगी सियासत की उल्टी हवा?

इस बार भी महागठबंधन से मौजूदा सांसद जयप्रकाश नारायण यादव और BJP से पुतुल कुमारी के चुनाव लड़ने के आसार हैं. NDA में JDU के आने से BJP को फायदा हो सकता है, क्योंकि बांका लोकसभा क्षेत्र में JDU का अच्छा-खासा वोट बैंक है.

News18 Bihar
Updated: April 12, 2019, 3:00 PM IST
Loksabha Election 2019: राजनीति की तपोभूमि बांका में क्या इस बार भी बहेगी सियासत की उल्टी हवा?
बांका का मंदार पर्वत और पापहरणी
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Updated: April 12, 2019, 3:00 PM IST
बांका लोकसभा क्षेत्र के कण-कण में देवताओं का वास है. सुल्तानगंज में उत्तरवाहिनी गंगा की धारा है. यहीं पर अजगबीनाथ धाम है. तेलडीहा में मां दुर्गा का शक्तिपीठ है. मंदार में पापहरणी सरोवर है. जैन धर्म के 10वें गुरू वासुपूज्य का सिद्धक्षेत्र है. संथालियों के सफा धर्म का साधना क्षेत्र भी है. सर्वधर्म की भूमि पर सालों भर सैलानी आते हैं. सुल्तानगंज से देवघर के बीच कांवर यात्रा का बड़ा हिस्सा बांका में ही पड़ता है. पूरा सावन बांका भगवान भोले के जयकारे से गुंजायमान रहता है. इन सबके बीच बांका को राजनीति की तपोभूमि भी माना जाता है क्योंकि यहां शुरू से ही सियासत की हवा उल्टी बहती आ रही है.

मोदी लहर में भी जीती RJD


2014 में मोदी लहर में भी BJP की हार हो गई थी . 2014 में RJD नेता जयप्रकाश नारायण यादव जीते थे.जयप्रकाश नारायण यादव को 2,85,150 वोट मिले थे. BJP उम्मीदवार पुतुल कुमारी को 2,75,006 वोट मिले थे. मात्र 10,144 वोट के अंतर से पुतुल कुमारी को हार मिली थी.

1957 में अस्तित्व में आए बांका लोकसभा क्षेत्र समाजवादियों का गढ़ रहा है.1967 में भारतीय जनसंघ के बी.एस. शर्मा जीते थे.1971 और 1977 में समाजवादी नेता मधु लिमये यहां के सांसद चुने गए.1998,1999 और 2009 में दिग्विजय सिंह को लोकसभा चुनाव में सफलता मिली.

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समुद्र मंथन की प्रतीकात्मक मूर्ति


बांका में विधानसभा की 6 सीटें
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बांका लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत विधानसभा की 6 सीटें आती हैं. सुल्तानगंज, अमरपुर, धोरैया, बांका, बेलहर और कटोरिया. सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र भागलपुर जिले का हिस्सा है. 2009 में सुल्तानगंज बांका लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा बना.

इस बार भी महागठबंधन ने मौजूदा सांसद जयप्रकाश नारायण यादव और BJP से पुतुल कुमारी के चुनाव लड़ने के आसार हैं. NDA में JDU के आने से BJP को फायदा हो सकता है, क्योंकि बांका लोकसभा क्षेत्र में JDU का अच्छा-खासा वोट बैंक है.

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इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बांका लोकसभा में आने वाली 6 में से 4 सीटें JDU ने जीतीं थी. बांका इलाके में पुतुल कुमारी के पति दिग्विजय सिंह का काफी वर्चस्व था. दिग्विजय सिंह तीन बार यहां के सांसद चुने गए थे.

सांसद जेपीएन यादव का दावा
बांका सांसद जयप्रकाश नारायण यादव को क्षेत्र के विकास के लिए सांसद निधि के तहत 23.08 करोड़ रुपये मिले. जिसमें से सांसद विकास कार्यों में 20.22 करोड़ रुपये खर्च कर पाए. 5 सालों में सांसद ने 533 योजनाओं की अनुशंसा की. जिसमें से 433 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं. जबकि 100 योजनाओं पर काम जारी है.

सांसद जयप्रकाश नारायण यादव का दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अपने लोकसभा क्षेत्र में पुल-पुलिया का जाल बिछाया. नहर और उसके तटबंध को दुरुस्त कराया.सिंचाई की ठोस व्यवस्था की. ग्रामीण इलाके में सड़कों का जाल बिछाया.

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गेरूआ और चांदन नदी पर तटबंध का निर्माण कराया. कटोरिया में सिंचाई के नहर बनवाया. धेरैया में पावर ग्रिड सब स्टेशन का निर्माण कराया...बुनकरों का बिजली बिल माफ कराया. सांसद के इन दावों के आधार पर RJD एक बार फिर बांका में जीत का दावा कर रही है.

सांसद के दावों की हकीकत
न्यूज18 की टीम ने जब सांसद के दावों की पड़ताल की दावे और हकीकत में साफ अंतर नजर आया. डैम तो है लेकिन उसमे पानी नहीं. खेतों में सिंचाई के अभाव में फसल मरी हुई है. किसान परेशान हैं. छात्रों की शिकायत की थी कि उन्हें पढ़ने के लिए बाहर जाना पड़ता है.

बांका में आज भी शिक्षा के लिए एकमात्र मान्यता प्राप्त कॉलेज है. वह है पीबीएस कॉलेज. जिस कारण यहां के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ता है. बांका में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की मांग पुरानी है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ख़ास कदम नहीं उठाए गए.

बांका जंक्शन


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बुजुर्गों की अपनी अलग शिकायत है. बांका इलाके में धान की खेती होती है. यहां लोगों की सबसे बड़ी समस्या सिंचाई है. क्षेत्र में नहर की कमी है जिसके कारण किसानों का काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

यहां रोजगार भी काफी बड़ी समस्या है. क्षेत्र में उद्योगों की भारी कमी है जिसके कारण यहां रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे हैं. बांका का साक्षरता दर 58% है. इतने कम साक्षरता दर की बड़ी वजह यहां शैक्षणिक संस्थानों की कमी है.

बांका में अहम है जाति फैक्टर
बांका लोकसभा क्षेत्र में कई मुद्दे हैं और लोगों की कई समस्याएं हैं. जो इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव में हावी रहेंगे. हालांकि चुनाव में विकास की बात के साथ-साथ सामाजिक समीकरण भी बड़ी भूमिका अदा करते हैं.

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एक नजर डालते हैं यहां के सामाजिक समीकरण पर-

यादव- तीन लाख
मुस्लिम- दो लाख
गंगोता- तीस हजार

कोइरी- 80 हजार
कुर्मी- एक लाख
ब्राह्मण- सवा लाख

भूमिहार- पचास हजार
राजपूत- डेढ लाख
कायस्थ- पचास हजार

मारवाड़ी- बीस हजार
वैश्य- दो लाख
महादलित- ढाई लाख
अन्य- एक लाख

(नोट- ये सरकार द्वारा जारी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि विभिन्न निजी एजेंसियों के रिसर्च के आधार पर हैं )

जातीय आंकडा बताने के लिए काफी है कि यहां की राजनीति किस धुरी पर टिकी है. NDA के घटक दलों को उम्मीद है कि केन्द्र और राज्य सरकार का काम का इनाम बांका की जनता देगी. वहीं महागठबंधन की ओर से RJD इस सीट पर दावा छोड़ने को तैयार नहीं है. जबकि कांग्रेस अभी से ही सत्ता में आने पर कई वादों को पूरा करने की बात कह रही है.

बहरहाल जातीय आधार पर एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधे संघर्ष के आसार दिख रहे हैं. ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि बांका का 'बंका बहादुर' इस बार कौन बनता है.
रिपोर्ट-राहुल कुमार ठाकुर एवं नागेन्द्र

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