लाइव टीवी

Analysis: कन्हैया जिस बेगूसराय में लड़ रहे हैं क्या अब भी वो लाल दुर्ग है?

Rajendra Tiwari | News18 Bihar
Updated: April 7, 2019, 1:05 PM IST
Analysis: कन्हैया जिस बेगूसराय में लड़ रहे हैं क्या अब भी वो लाल दुर्ग है?
कन्हैया कुमार (फाइल फोटो)

बेगूसराय में कन्हैया का मुकाबला भाजपा के बड़बोले नेता गिरिराज सिंह और राजद के तनवीर हसन से है.

  • Share this:
एक समय पूरब का लेनिनग्राद कहे जाने वाला बिहार का बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी के चलते सबकी निगाह में है. लेकिन यह लेनिनग्राद पिछले 15 साल से तो पूरी तरह सेंट पीटर्सबर्ग ही बन गया है. अलबत्ता, इस बार कन्हैया कुमार के चुनाव मैदान में उतरने की वजह से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी(भाकपा) जरूर चर्चा में है. बेगूसराय में कन्हैया का मुकाबला भाजपा के बड़बोले नेता गिरिराज सिंह और राजद के तनवीर हसन से है. यह सब कोई मानता है कि यदि कन्हैया महागठबंधन के उम्मीदवार होते तो उनकी जीत सुनिश्चित थी. राजद के तनवीर हसन के मैदान में उतरने से कई किंतु-परंतु पैदा हो गये हैं.

पिछले लोकसभा चुनाव में यह सीट भाजपा के भोला सिंह ने 4.28 लाख वोट हासिल कर जीती थी और लगभग 58 हजार वोटों के अंतर से दूसरे नंबर पर रहे थे राजद के तनवीर हसन. नीतीश समर्थित भाकपा उम्मीदवार राजेंद्र सिंह को मात्र 1.92 लाख वोट ही मिले थे और वे तीसरे स्थान पर रहे थे. 2008 से पहले यहां दो लोकसभा सीटें हुआ करती थीं, एक बलिया और दूसरी बेगूसराय. 2008 में डिलिमिटेशेन के तहत बलिया को खत्म कर दिया गया.

भाकपा ने बलिया सीट अंतिम बार 1996 में जीती थी. तब शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने 267482 वोटों के साथ भाजपा के रामलखन सिंह को लगभग 88 हजार वोट से हराया था. लेकिन उस समय भाकपा का लालू यादव के जनतादल से गठबंधन था. यह भूमिहार बहुल्य सीट है और यहां नौ बार भूमिहार जाति के ही सांसद चुने गए हैं. यहां भूमिहार वोट लगभग 19 फीसदी है. वहीं, 15 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर मुस्लिम हैं. यादव 12 और कुर्मी जाति के वोट लगभग सात फीसदी हैं.

इस लोकसभा सीट के अंतर्गत सात विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें सिर्फ बखरी सीट ऐसी हैं जहां अब तक दस बार भाकपा विजयी रही है. लेकिन यहां भी 2005 के बाद से भाकपा जीत नहीं दर्ज कर सकी. मटिहानी में 2000 के बाद से भाकपा नहीं जीती तो भाकपा का गढ़ कही जाने वाली तेघड़ा सीट भी 2005 के बाद नहीं जीत सकी. बछवाड़ा में जरूर 2010 में भाकपा जीती थी. साहेबपुर-कमाल व चेरिया-बरियारपुर में भी भाकपा नदारद है. यहां भी उल्लेखनीय यह है कि भाकपा ने पिछले तीस साल में जो जीतें हासिल कीं, वे सब गठबंधन में. इस तरह 1990 के दशक से पूरब का लेनिनग्राद भी धसकना शुरू हो गया था और अब तो लालू यादव की पार्टी भी भाकपा के खिलाफ चुनाव लड़ रही है. नीतीश की जदयू भाजपा के साथ गठबंधन में है.

बेगूसराय को लेकर राजनीतिक गलियारों में जो गणित लगाई जा रही है, उसके मुताबिक अगर कन्हैया भूमिहार वोटों में सेंध लगा लेते हैं तो वे मुकाबले में रहेंगे. क्योंकि ऐसा होने पर मुस्लिम वोट उनकी तरफ मुड़ सकता है. लेकिन यह एक कठिन काम नजर आता है. साथ ही, यादव और मुस्लिम मिलकर ज्यादा मजबूत समीकरण बनाते नजर आ रहे हैं.

दरअसल, बेगूसराय में जो माहौल नजर आता है, उसकी वजह है देश भर से कन्हैया के समर्थन में पहुंचने वाले नौजवान और सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता. लेकिन वे वोटर नहीं हैं. भले ही कन्हैया कुमार कह रहे हैं कि उनकी लड़ाई मोदी से है लेकिन जमीन पर तो उन्हें गिरिराज सिंह व तनवीर हसन से ही लड़ना है. हां अगर राजद उनको समर्थन कर देता तो यहां 1996 दोहराना तय था. शायद इसी संभावना के मद्देनजर शुरुआत में भाजपा नेता गिरिराज सिंह इस सीट से लड़ने से बचना चाहते थे. यह बात सही है कि कन्हैया कुमार जरूरी मुद्दे उठा रहे हैं लेकिन उन मुद्दों को समझने वाले भी होने चाहिए. ऐसे लोग कितने हैं, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा.

ये भी पढ़ें- दादा की ख्वाहिश थी कि पोता सिमुलतला स्कूल में पढ़े, प्रियांशु ने टॉपर बनकर पूरा किया सपना

Bihar Board 10th result 2019: अंकेश ने बढ़ाया बेतिया का मान, टॉप 10 में पाया छठा स्थान

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए बेगूसराय से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: April 6, 2019, 7:48 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर