बिहार की राजनीति में जेएनयू से निकले छात्र नेताओं का पहले भी रहा है दबदबा!

कन्हैया कुमार का मुकाबला बीजेपी के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह से है, लेकिन, आरजेडी की तरफ से तनवीर हसन के चुनाव मैदान में उतरने के बाद त्रिकोणीय लड़ाई में कन्हैया के लिए मुश्किलें हो सकती हैं.

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Updated: April 18, 2019, 2:45 PM IST
बिहार की राजनीति में जेएनयू से निकले छात्र नेताओं का पहले भी रहा है दबदबा!
कन्हैया कुमार की फाइल फोटो
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Updated: April 18, 2019, 2:45 PM IST
(अमितेश)

बिहार के बेगूसराय में इस बार मुकाबला काफी रोचक हो गया है. जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के वहां से चुनाव मैदान में उतरने के बाद माहौल काफी गरम हो गया है. लेफ्ट राजनीति की दशा और दिशा तय करने वाले अधिकतर नेता जेएनयू की छात्र राजनीति से ही निकलकर सामने आते रहे हैं. लेफ्ट के गढ़ जेएनयू की छात्र राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय क्षितिज पर कम उम्र में ही अपनी एक अलग पहचान बनाने वाले कन्हैया कुमार लेफ्ट के पुराने गढ़ बेगूसराय में ताल ठोंक रहे हैं.

सीपीआई के टिकट पर कन्हैया अपने गृह जिले बेगूसराय से ही मैदान में हैं. उनकी कोशिश लेफ्ट के पुराने किले को फिर से मजबूत करने की है, जो कि वक्त के थपेड़ों के साथ धीरे-धीरे भगवा किले में तब्दील हो चुका है. कन्हैया कुमार का मुकाबला बीजेपी के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह से है, लेकिन, आरजेडी की तरफ से तनवीर हसन के चुनाव मैदान में उतरने के बाद त्रिकोणीय लड़ाई में कन्हैया के लिए मुश्किलें हो सकती हैं.

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भले ही इस बार चुनाव में जेएनयू की छात्र राजनीति से आए कन्हैया कुमार की चर्चा खूब हो रही हो, लेकिन, इसके पहले भी बिहार की राजनीति में जेएनयू से आए छात्र नेताओं का दबदबा रहा है. बिहार के सीवान जिले के रहने वाले जेएनयू के छात्र नेता चंद्रशेखर ने भी सियासत में कदम रखा था. लेकिन, उनके उभरने से पहले ही राजनीतिक रंजिश के तहत उनकी हत्या कर दी गई थी. चंद्रशेखर 1993 में ही जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए थे, जिसके बाद वे जेएनयू  छात्र संघ के अध्यक्ष बनाए गए. छात्र राजनीति के बाद उन्होंने सीपीआईएमएल के ज़रिए सियासी सफर की शुरुआत करने की कोशिश की थी. लेकिन, मुख्यधारा में खुलकर आने से पहले ही 1997 में उनकी हत्या कर दी गई.

बिहार की सियासत में दबदबे वाले एक और नेता थे दिग्विजय सिंह. बांका सीट से सांसद रह चुके दिग्विजय सिंह भी 1982 में जेएनयू छात्र संघ के महासचिव रह चुके थे. वे स्टूडेंट्स फॉर डेमोक्रेटिक सोशलिज्म यानी डीवाईएस से जुड़े हुए थे. वे 1998 और 1999 और 2009 में लोकसभा के लिए चुने गए थे. जबकि, दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए थे. पहली बार 1990 में वे राज्यसभा के लिए चुने गए थे. लेकिन, 2009 में उन्हें समता पार्टी से टिकट नहीं दिया गया जिसके बाद उन्होंने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मर्जी के खिलाफ अपनी काबिलियत और दबदबे के दम पर दिग्विजय सिंह बांका से निर्दलीय चुनाव जीतने मे सफल रहे.

हालांकि, अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उनको पूरा सम्मान मिला था. 1999 से 2001 के बीच उन्होंने बतौर रेल राज्यमंत्री काम किया. इसके बाद 2001 में उन्हें वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का राज्य मंत्री बनाया गया. फिर, 2002 में उन्हें विदेश मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई. इस पद पर वे 2004 तक पद पर बने रहे.
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लेकिन, एक बार फिर वक्त की सुई दस साल बाद भी उसी जगह पर आ पहुंची है. 2009 में उन्हें नीतीश कुमार के चलते टिकट नहीं मिल सका था, तो वे निर्दलीय मैदान में थे. अब दस साल बाद 2019 में दिग्विजय सिंह की पत्नी पुतुल कुमारी को टिकट नहीं मिला, तो उनकी पत्नी ने भी ताल ठोक दिया है. 2010 में दिग्विजय सिंह के असामयिक निधन के बाद पुतुल कुमारी बांका से सांसद बनी थी. लेकिन, 2014 में वो चुनाव हार गई थी.

बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले शकील अहमद खान भी ऐसे नेता हैं जिनकी राजनीति में एंट्री जेएनयू के जरिए हुई. कदवा से कांग्रेस के मौजूदा विधायक शकील अहमद खान 1992-93 में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष बने थे. एसएफआई के बैनर तले छात्र संघ की सियासत करने वाले खाने छात्र राजनीति को अलविदा करने के बाद कांग्रेस से जुड़ गए. हालांकि, शकील अहमद खान 1999 में कांग्रेस से जुड़े और 2015 में पहली बार कदवा से विधायक चुन गए हैं.
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