दिनकर जयंती: सन् 62 की हार पर जब नेहरू से बोले राष्ट्रकवि- 'जब-जब राजनीति लड़खड़ाई, साहित्य ने ही उसे संभाला'

भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एवं राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर.
भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एवं राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर.

Ramdhari Singh Dinkar Anniversary: भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के संदर्भ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Prime Minister Jawaharlal Nehru) से जुड़ा एक वाकया स्मरण करना आवश्यक हो जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 23, 2020, 1:36 PM IST
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पटना. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर  (Rashtrakavi Ramdhari Singh Dinkar) की आज जयंती है. 23 सितंबर, 1908 को उनका जन्म बिहार के बेगूसराय के सिमरिया में हुआ था. विद्रोह,  क्रांति, श्रृंगार और प्रेम, वे साहित्य की हर विधा में रचनाशील रहे. साहित्य के जानकार बताते हैं कि कई बार तो उनकी कविताओं में कबीर पंथ की भी छाप दिख जाती थी. दरअसल आज संसद से सड़क तक, देश में हर ​ओर भारत-चीन सीमा पर तनाव और किसानों की हालत को लेकर वाद-विवाद का दौर जारी है. कहीं संसद में हंगामा हो रहा है तो कहीं सांसद किसान के मुद्दों पर अपना इस्तीफा दे रहे हैं. अब तो कृषि विधेयक को कांग्रेस बिहार चुनाव में मुद्दा भी बनाने जा रही है. ऐसे में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता हमारा मार्गदर्शन करती प्रतीत होती है.


आरती लिए तू किसे ढूंढ़ता है मूरख
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में खलिहानों में




 

यही नहीं, अभी जब भारत की सीमा पर चीन के सैनिक बैठे हैं और भारत पर हमला करने को बेताब हैं, ऐसे में रामधारी सिंह दिनकर और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा एक प्रसंग बरबस ही याद हो आता है.  दरअसल सन् 1962 में जब चीन ने हमारे देश पर आक्रमण किया तो रामधारी सिंह दिनकर के समस्त व्यक्तित्व पर राष्ट्रीयता अत्यन्त उग्र बनकर छा गई थी. 1962 में चीन से मिली हार ने उन्हें परेशान कर दिया और वो पूरी तरह आक्रोशित हो उठे. विरोधियों की तो बात दूर है वो अपने ही पार्टी कांग्रेस की गलत नीतियों का भी खुल कर विरोध करते थे.


ऐसे तो दिनकर जी की तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ सहज संबंध थे, पर चीन से पराजय असहनीय थी. कदाचित वे इसके लिए नेहरू की गलत नीतियों को जिम्मेदार मानते थे. इसी क्रम में एक ऐसा भी प्रसंग आता है जब दिल्ली के एक कवि सम्मलेन में जब नेहरूजी लड़खड़ा जाते हैं तब दिनकर जी उन्हें संभालते हैं. नेहरूजी उन्हें धन्यवाद देते हैं तो दिनकर के मन का गुबार उनकी साहित्यिक भाषा में उभर आती है.



दिनकर जी तत्काल ही जवाब देते हैं, 'इसमें धन्यवाद कि क्या आवश्यकता! वैसे भी जब-जब राजनीति लड़खड़ाई है, साहित्य ने ही उसे संभाला है.



जाहिर है ये वाक्य उनकी निर्भीकता, कार्य दक्षता और समर्पण के दर्शन कराती है. इसके बाद जब देश को पाकिस्तान के सामने जीत मिली तो उन्होंने सबको सराहा भी. दरअसल रामधारी सिंह दिनकर राष्ट्रीय चेतना के कवि रहे. ओज और पौरुष के कवि माने गए. राष्ट्र के व्यावहारिक धर्म के गर्जन के कवि के रूप में जाने गए. राष्ट्रीयता उनकी आत्मा का स्पन्दन है.


राष्ट्रकवि होने के नाते उन्हें अपनी जिम्मेदारियों का भी आभास रहा तो जनकवि होने के नाते अपने कर्तव्य का भी ज्ञान सदा ही रहा है. ता-उम्र मां हिंदी की सेवा करने के लिए उन्हें भारत सरकार ने साहित्य अकादमी और पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. राष्ट्रकवि का निधन 24 अप्रैल 1974 को हुआ था.

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