अपना शहर चुनें

States

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच भी बिहार से क्यों शुरू हुआ रिवर्स माइग्रेशन ?

बिहार से रिवर्स पलायन का दौर शुरू हो चुका है.
बिहार से रिवर्स पलायन का दौर शुरू हो चुका है.

खगड़िया से तेलंगाना (Khagaria To Telangana) रवाना होते हुए मजदूरों ने कहा कि बिहार में रहकर क्या करेंगे? जाहिर है ये बिहार के संदर्भ में एक बड़ा प्रश्न है.

  • Share this:
पटना. कोरोना महामारी (Corona epidemic) के कारण कई प्रदेशों से स्पेशल ट्रेन मजदूरों को बिहार पहुंचा रही हैं. लेकिन, बिहार के गरीब तबकों के लिए कठोर हकीकत यह है कि पेट की आग के आगे कोरोना के संक्रमण (Corona infections) का डर भी नहीं ठहरता है. हजारों मजदूरों की बिहार वापसी के वक्त ही खगड़िया से मजदूर वापस दूसरे राज्यों की ओर काम पर लौटने लगे हैं. तेलंगाना (Telangana) में काम करने के लिए 222 मजदूरों को लेकर श्रमिक स्पेशल ट्रेन (Shramik Special Train) गुरुवार को खगड़िया (Khagaria) से तेलंगाना के लिए रवाना हुई.

बिहार के संदर्भ में प्रश्न बड़ा है

खगड़िया से तेलंगाना रवाना होते हुए मजदूरों ने कहा कि बिहार में रहकर क्या करेंगे? जाहिर है ये बिहार के संदर्भ में एक बड़ा प्रश्न है. हालांकि हमारे राजनीतिक दल इस मुद्दे को चुनाव में तो जरूर उठाते रहे हैं, पर जैसे ही चुनाव बीतता है सब ढाक के तीन पात वाली कहावत सिद्ध हो जाती है. आखिर बिहार में पलायन कितना बड़ा मुद्दा है?




तालाबंदी में दिल्ली में रह रहे आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने भी कहा कि इस मुश्किल दौर में सरकार प्रायोजित रिवर्स माइग्रेशन की यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना इनके 15 सालों की असफलताओं का जीता-जागता स्मारक है. बिहार के सीएम और डिप्टी CM को बिहारवासियों से माफ़ी मांगनी चाहिए कि इनकी 15 वर्षों की विफलताओं के चलते बिहार के हर दूसरे घर से पलायन हुआ है.

राजनीति की भेंट चढ़ता मूल मुद्दा

एक उंगली अगर आप किसी और की ओर उठाते हैं तो बाकी की उंगलियां स्वत: उनकी ओर मुड़ जाती हैं. पलायन पर जेडीयू ने भी पलटवार किया और कहा कि 15 वर्षों में लालू-राबड़ी शासनकाल का ही दंश बिहार आज तक भुगत रहा है. दरअसल लालू-राबड़ी के शासनकाल में भी पलायन एक बड़ा मुद्दा था और आज नीतीश कुमार के शासनकाल में भी बिहार में ये मुद्दा आज भी सामने मुंह बाए खड़ा है.

पलायन का लंबा इतिहास

दरअसल बिहार से से मजदूरों का पलायान का लंबा इतिहास है. पर बीते तीन दशकों में में इसमें अप्रत्याशित तेजी आई. पंजाब के खेतों और बंगाल की फैक्ट्रियों की ओर होने वाला मजदूरों का पलायन देशव्यापी स्वरूप में हमारे सामने है. एक अनुमान के अनुसार बिहार के 35 से 40 लाख मजदूर विभिन्न प्रदेशों में काम करते हैं. हालांकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 25 से 30 लाख के बीच है.

अगर सरकार के आंकड़ों को ही मानें तो ये किसी भी प्रदेश के लिए बहुत बड़ी संख्या है.आईएचडी के सर्वेक्षण में शामिल 7 जिलों में औसतन सर्वाधिक प्रवासी मजदूर भेजने वाला जिला है गोपालगंज और मधुबनी है. यहां 71.8% मजदूर पलायन करते हैं .

गुरुवार को खगड़िया से तेलंगाना वापस गए बिहार के 222 मजदूर.


आईआईपीए के 17 जिलों के ग्राम पंचायत सर्वेक्षण में अररिया में प्रवासी श्रमिकों वाले परिवारों का प्रतिशत 53.2, पूर्णिया में 48.2, शिवहर में 47.1 तथा मुंगेर और गया दोनों में 44.2% है . बाढ़ ग्रस्त कोसी क्षेत्र से भी काफी संख्या में श्रमिक रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं. इस क्षेत्र में शामिल जिले हैं सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, दरभंगा, सीतामढ़ी, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार शामिल हैं.

यही नहीं बिहार से अंतर-राज्यीय पलायन का सकल और नेट दर देश में सबसे ज्यादा है. ऐतिहासिक रूप से बिहार से पलायन तीन दौरों से गुजरा है.  पहले दौर में, अंग्रेजों ने बिहारी श्रमिकों को पूर्व के राज्यों में पलायन करने के लिए खास तौर पर प्रोत्साहित किया. दूसरा दौर हरित क्रांति के बाद शुरू हुआ, जब मजदूर पंजाब, हरियाणा जाने लगे.

मौजूदा दौर की ये है हकीकत

तीसरा मौजूदा दौर उदारीकरण के साथ शुरू होता है, जब शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन का रुझान बढ़ा.  इसके साथ एक हहीकत ये है कि पलायन का 64 प्रतिशत परिवार भरण-पोषण के लिए होता है और महज 29 प्रतिशत ही परिवार बेहतर वेतन और अच्छे रोजगार के लिए पलायन करते हैं.

इन सबके बीच एक स्थिति ये है कि बिहार पिछले कई सालों से विकास दर के मामले में पहले-दूसरे स्थान पर बना रहता है. लेकिन सवाल ये है कि क्या  यह लोगों के जीवन को कितना बेहतर कर पा रहा है?

अभी भी बिहार में विकास का मतलब बेहतर सड़कें, बिजली और कुछ हद तक अपराध पर नियंत्रण तक ही सीमित हैं. हाल के दिनों में कुछ फ्लाई ओवर और ऊंची-ऊंची बिल्डिगें भी इसके मानक माने जाने लगे हैं. इससे आगे बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, औद्योगीकरण, नौकरियां और बेहतर कामकाजी माहौल के बारे में कोई चर्चा ही नहीं होती है.

आखिर क्यों नहीं रुक रहा पलायन?

बिहार की सरकार एग्रो इंडस्ट्री को आकर्षित करने की बात तो कहती है पर सच्चाई ये है कि इसमें भी वह  असफल रही है. एक आंकड़े के अनुसार  देश की कुल आबादी का 69 प्रतिशत आबादी कृषि पर आधारित है, लकिन बिहार में यह 90 प्रतिशत है. सरकार भले ही कृषि में तरक्की का दावा करे, लेकिन सच्चाई यही है कि खेती-किसानी अब घाटे का सौदा बन चुका है.

झारखंड से अलग होने के बाद राज्य में औद्योगिक विकास सिर्फ कागजों पर ही सीमित दिखता है. पिछले 20 वर्षों में इंडस्ट्री लाने में मौजूदा सरकार भी नाकाम ही रही है. हालांकि, सीमेंट की एक-दो फैक्ट्रियां लगी हैं, लेकिन यह नाकाफी है. अभी देश के कुल उद्योग में बिहार की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से कम है, और कैपिटल के मामले में यह सिर्फ आधा प्रतिशत. वहीं, गुजरात जैसे राज्य की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से अधिक है.

क्या ये नीतीश कुमार की विफलता है?

इससे भी बड़ा सच राजनीतिज्ञों का इस मूल मुद्दे से मुंह चुराना है. कुछ वर्षों पहले ही सीएम नीतीश कुमार ने कहा था-बिहार के लोग अपनी इच्छा से पलायन करते हैं, मजबूरी में नहीं. जाहिर है यह बिहार जैसे राज्य का सच बताने वाला बयान नहीं है. शायद यही पलायन जैसी बड़ी समस्या का बड़ा कारण भी है कि हमारे राजनीतिज्ञ इसे चुनावी मुद्दा भर मानते हैं.

नीतीश कुमार बिहार के सफल मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं पर पलायन जैसे मुद्दे पर उनकी सफलता पर प्रश्न खड़े होते हैं.


बहरहाल, बिहार सरकार तो अभी प्रवासी मजदूरों को बाहर के राज्य से वापस बिहार लाने में लगी है. हालांकि मनरेगा के तहत इन्हें रोजगार उपलब्ध करवाने की बात भी कही जा रही है और योजनाएं लागू किए जाने का दावा भी. शायद आने वाला मौसम चुनावी है और ये संजीदगी कहीं चुनावी फसल काटने की कवायद ही मानी जा रही है. हर चुनाव खत्म होते ही फिर पलायन का अंतहीन सिलसिला जारी रहता है और इसपर राजनीति अगले चुनाव तक थम जाती है.

ये भी पढ़ें

 
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज