Bihar Election: क्या बीजेपी-जेडीयू का खेल बिगाड़ पाएंगे ये बागी नेता?

बिहार चुनाव के 'बागी' किसका खेल बिगाड़ेंगे?
बिहार चुनाव के 'बागी' किसका खेल बिगाड़ेंगे?

यूपी बीजेपी के प्रभारी रहे रामेश्वर चौरसिया और झारखंड के प्रभारी रहे पुराने संघ प्रचारक राजेंद्र सिंह की बगावत से क्या भारतीय जनता पार्टी का कुछ बिगड़ेगा?

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2020, 10:30 PM IST
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नई दिल्ली. बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election-2020) में बगावत की बीमारी से हर पार्टी जूझ रही है. लेकिन कैडर बेस्ड पार्टी बीजेपी और 15 साल से सत्ता में रही जेडीयू की चर्चा सबसे ज्यादा है. इनका सबसे बड़ा गठबंधन भी है. बीजेपी से दो ऐसे नेता बागी हो गए हैं जो कभी पार्टी की ओर से सीएम पद की रेस में रहते थे. आईए समझते हैं कि आखिर बागियों की सियासी हैसियत क्या है. क्या वे बीजेपी (BJP) और जेडीयू (JDU) का खेल बिगाड़कर अपने लिए कुछ हासिल कर पाएंगे या फिर सिर्फ वोटकटवा ही बने रहेंगे. ग्राउंड जीरो रिसर्च के निदेशक शशि शंकर सिंह कहते हैं कि जहां बागी उम्मीदवार लोक जनशक्ति पार्टी से हैं वहां या तो वे या फिर राजद (RJD) का प्रत्याशी जीतेगा.

सिंह कहते हैं कि इस बार लार्जर स्केल पर एक मुख्यमंत्री (CM) न चुनकर जनता विधानसभा क्षेत्र में अपना नेता चुन रही है. उसने एक चेहरे पर 15 साल तक वोट करके देख लिया है. ह्यूमन इंडेक्स, एजुकेशन इंडेक्ट, हेल्थ इंडेक्स में बिहार निचले पायदान पर है यह किसी से छिपा नहीं है. देश के 20 गरीब जिलों में 5 बिहार के हैं. ऐसे में चेहरा चुनकर उन्हें कुछ नहीं मिला है. जो लोग ग्राउंड पर काम करने वाले हैं, जिन लोगों ने पार्टी की सेवा की है, उन्हें दिल्ली से लिए गए फैसले के आधार पर टिकट नहीं दिया जाएगा तो वो आत्मसम्मान के लिए मैदान में उतरेंगे ही. जिन लोगों को बगावत के आरोप में निकाला गया है उनमें से अधिकांश पूर्व विधायक हैं. मंत्री रह चुके हैं और ग्राउंड पर उनकी पकड़ काफी मजबूत है.

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तो ये है बिहार की मौजूदा स्थिति




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बाहरी से ज्यादा अपनों से खतरा!

कुल मिलाकर बिहार के चुनाव में सियासी दुश्मनों से ज्यादा अपनों से चुनौती है. ऊपर से असंतुष्टों से भितरघात का भी खतरा है. बगावत करने पर जदयू से निकाले गए नेताओं में डुमरांव के निवर्तमान विधायक ददन सिंह यादव, पूर्व मंत्री रामेश्वर पासवान, पूर्व मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा, पूर्व विधायक रणविजय सिंह और चकाई के पूर्व विधायक सुमित कुमार सिंह के नाम प्रमुख हैं.

ग्राउंड पर चौरसिया और राजेंद्र सिंह की कैसी है पकड़?

जबकि,  बीजेपी के जो नेता बागी होकर मैदान में डटे हैं उनमें रामेश्वर चौरसिया (Rameshwar Chaurasiya) और राजेन्द्र सिंह (Rajendra Singh) के नाम प्रमुख हैं. चौरसिया सासाराम से जबकि सिंह दिनारा से मैदान में हैं. राजेंद्र सिंह ने दिनारा से 2015 में भी चुनाव लड़ा था लेकिन वो दूसरे नंबर पर थे. उन्हें 62008 वोट मिले थे. उधर, रामेश्वर चौरसिया नोखा विधानसभा सीट से लगातार चार  बार साल 2000, 2005 (फरवरी और नवंबर) और 2010 में जीत चुके हैं.  वो 2015 में आरजेडी से हार गए थे. वो दूसरे नंबर पर थे और उन्हें 49782 वोट मिले थे.

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2015 में कैसे बनी थी सरकार?


चौरसिया नीतीश के विरोधी नेता माने जाते रहे हैं. माना जाता है कि इस वजह से उन्हें इस सीट से हाथ धोना पड़ा है. इस बार ये सीट जेडीयू के खाते में चली गई है. जेडीयू ने वहां से नागेंद्र चंद्रवंशी को टिकट दिया है. चौरासिया अब वो लोजपा उम्मीदवार के तौर पर नोखा से ही जेडीयू उम्मीदवार के खिलाफ लड़ेंगे.

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राजेंद्र सिंह को भी उम्मीद थी की पार्टी उन्हें दिनारा विधान सभा सीट से टिकट देगी लेकिन उस सीट से नीतीश सरकार में मंत्री जय कुमार सिंह को फिर से जेडीयू ने टिकट दिया है. इससे नाराज होकर वो लोजपा में शामिल हो गए. राजेंद्र सिंह बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष और संघ (RSS) प्रचारक रहे हैं. 2014  में उन्हें झारखंड का प्रभारी बनाया गया और उस साल वहां भाजपा की जीत में उनकी काफी महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई.
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