मुजफ्फरपुर शेल्टर होम : ‘भागी’ हुई लड़कियां जो कहीं की नहीं रहती

बिहार के अलग अलग गांव, शहरों की बेघर और बेसहारा लड़कियों के लिए सरकार की अलग अलग योजनाओं के अंतर्गत आवास गृह चला रही है. लेकिन जहां ये सिर छुपाने के लिए आती हैं, वो कागज़ पर जितनी आदर्श जगह दिखती है, हक़ीकत में उससे कोसों अलग है.

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 7:11 AM IST
मुजफ्फरपुर शेल्टर होम : ‘भागी’ हुई लड़कियां जो कहीं की नहीं रहती
आवास गृह को असल में कैसा होना चाहिए
Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: December 7, 2018, 7:11 AM IST
हमारे पास एक लड़की आई थी जिसका ट्रेन में रेप हो गया था. बलात्कारियों ने रेप करके उसे ट्रेन से फेंक दिया. जब उसे हमारे शेल्टर होम में लाया गया तब वो बुरी हालत में थी. मानसिक रूप से अस्थिर हो चुकी थी. उसके दिमाग को ठंडा करने में पहले तो हमें 15 दिन लगे. इसके बाद उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है और वो मुंबई से असम जा रही थी. तब रास्ते में यह हादसा हुआ. जब वो ठीक हुई तब हमने उसके पति को सूचित किया. लड़की ने हमसे रिक्वेस्ट की कि हम इस हादसे के बारे में पति को न बताएं. हमे इस बात का मान रखना ही था. काउंसलर के तौर पर हमारे लिए यह बहुत जरूरी है कि अगर वो कुछ भूलना चाहती है तो हम उसकी मदद करें. उसके पति को हमने नहीं बताया कि उसके साथ क्या हुआ, बस इतना कहा कि पुलिस इन्हें लेकर आई थी.

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पटना में जरूरतमंदों के लिए शेल्टर होम की संचालक और सामाजिक कार्यकर्ता राखी शर्मा ने हमसे इस घटना को साझा किया. राखी बताती हैं कि शेल्टर होम या स्टे होम इस तरह की कई कहानियों से पटे पड़े हैं. लड़कियां उनके पास इस हाल में आती हैं कि उन्हें देखकर यह समझ पाना मुश्किल है कि यह कभी ठीक भी हो पाएंगी या नहीं. कई लड़कियां बेहद परेशानी कर देने वाली हालत में आती हैं और कहती हैं हम सालों से सोए नहीं हैं, यहां आकर सो रहे हैं. हालांकि आवास गृहों में लड़कों की तादाद भी कम नहीं है लेकिन लड़कियां ज्यादा बुरे हाल में पहुंचती हैं. वो नशा कर चुकी होती हैं, भीख मांगती हैं और इन सबके साथ उनका शारीरिक शोषण या बलात्कार भी हो चुका होता है.

बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग ने अपनी अलग-अलग योजनाओं के तहत 38 जिलों में जरूरतमंदों के लिए आश्रय की व्यवस्था की है. इसके अलावा अन्य विभागों के अंतर्गत चलने वाली योजनाओं में भी आश्रय चलाए जा रहे हैं. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ के 'कोशिश' प्रोजेक्ट की टीम ने बिहार के 110 ऐसे आश्रय केंद्रों का जायज़ा लिया जो महिलाओं, 6-18 साल तक के बच्चों, बेघर भिखारियों और 6 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए बनाए गए हैं. अपनी रिपोर्ट में इस टीम ने करीब 21 आवास गृह को कटघरे में खड़ा किया है. मुजफ्फरपुर समेत 15 आवास गृह ऐसे हैं जिनमें गंभीर समस्याएं नज़र आईं और उनमें से ज्यादातर में 18 साल से कम उम्र की लड़के- लड़कियां रह रहे हैं. यह आवास गृह सरकार खुद चला रही है या फिर ज्यादातर को किसी एनजीओ के तहत चलाया जा रहा है. हालांकि इस पूरे प्रकरण के मीडिया में आने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि जिन जिलों में एनजीओ के जरिए सरकार प्रायोजित चिल्ड्रन होम चलाए जा रहे हैं, उन्हें चरणबद्ध तरीके से सरकारी नियंत्रण में लिया जाएगा. रिमांड होम की तरह इन्हें चलाने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी.



18 साल तक की बच्चियों के लिए जिला स्तर पर दो अलग अलग तरह के आवास चलाए जाते हैं. एक जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के तहत ऐसे होम जहां उन लड़कियों को ठहराया जाता है जो किसी अपराध में लिप्त पाई गई हो और दूसरा, CWC यानि बाल कल्याण समिति (जो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2000 के तहत ही है) जिसके तहत मुजफ्फरपुर जैसे बालिका गृह आते हैं. यहां वह बच्चियां आती हैं जो घर से किसी कारण वश भाग गई हो, या भटक गई हो, भीख मांगती हुई, नशा करती हुई पाई गई हो या फिर किसी भी बुरे हालात में सामाजिक कार्यकर्ता या पुलिस को मिली हो. बाल कल्याण समिति को जिला स्तर पर फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट का दर्जा हासिल होता है. उन्हीं के आदेश पर बच्चे और बच्चियां, बाल/बालिका गृह में आते हैं और उन्हीं के आदेश पर, परिवार का पता ठिकाना मालूम करने के बाद उन्हें घर भेज दिया जाता है. बालिका गृह में ही इनकी काउंसलिंग की जाती है.

सामाजिक कार्यकर्ता और मुजफ्फरपुर मामले में सीबीआई जांच के लिए जनहित याचिका दायर करने वाले संतोष कुमार समझाते हैं -
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कई बार बच्चों का घर मालूम होकर भी उन्हें घर नहीं भेजा जाता. ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि एनजीओ चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे वहां रहे क्योंकि उसी के आधार पर उन्हें सरकार से फंड मिलेंगे. दूसरा खेल है मुजफ्फरपुर बालिका गृह जैसा जहां बच्चियों के साथ जो कुछ हो रहा था, वो हम सबको पता है.


जहां तक CWC का सवाल है तो इसमें एक चेयरपर्सन और चार सदस्य होते हैं. चेयरपर्सन एक ऐसा शख्स हो जो बाल कल्याण मामलों में पारंगत हो और बोर्ड में एक महिला सदस्य भी होनी चाहिए. यहां गौर करने वाली बात यह है कि मुजफ्फरपुर मामले में जिले के बाल कल्याण समिति के चेयरपर्सन दिलीप वर्मा ही फरार हैं. इस मामले में जिले के सीडब्लूसी ने इस कदर निराश किया कि उसे अब विघटित कर दिया गया है.



कम उम्र की लड़कियों और लड़कों के इस तरह के गृहों की जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) भी देखरेख करती है. दिलचस्प बात यह है कि 2009 में बिहार देश का पहला राज्य बना जहां जिला बाल संरक्षण इकाई को अधिसूचित किया गया.

अगर आप इस मामले को समझने में नए हैं तो इतना समझ लीजिए बस की बच्चियों को जिनसे संरक्षण की उम्मीद थी, उन्हें वहीं से धोखा मिला. बिहार की मुजफ्फरपुर बाल संरक्षण इकाई ने इस मामले में इस कदर निराशाजनक काम किया कि इस इकाई के छह अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है जिनमें से एक देवेश शर्मा है जिन्होंने सबसे पहले मुजफ्फरपुर मामले में FIR दर्ज की थी. मामला सामने आने के बाद देवेश मीडिया से बात करते भी दिखाई दिए लेकिन सवाल यह है कि क्यों इन सभी अधिकारियों, कर्मचारियों ने रिपोर्ट से पहले कोई कदम नहीं उठाया. क्यों कदम उठाने के लिए उन्हें किसी रिपोर्ट का इँतजार करना पड़ा.

बच्चों की 'रखवाली' करने के नाम पर अधिकारी की नाक के नीचे बहुत कुछ हो रहा था. इस मामले में जिला बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन को अगस्त में गिरफ्तार कर लिया गया था. पीड़ित बच्चियों ने कुछ तस्वीरें देखकर रवि रोशन की पहचान की थी. यह अलग बात है कि रवि रोशन ने आरोप लगाया है कि उन्हें किसी साज़िश के तहत 34 लाख रुपया घूस लेकर फंसाया गया है. रोशन ने गिरफ्तारी के वक्त मीडिया से कहा कि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है और वह जब भी बालिका गृह में गए हैं, उनके साथ सामाजिक कल्याण विभाग की सदस्य गई हैं. यूट्यूब पर रवि रोशन की पत्नी और उनके चाचा का एक वीडियो भी अपलोड किया गया है जिसमें वह अपना पक्ष रखते हुए बता रहे हैं कि किस तरह रवि रोशन को मंत्रालय, CWC, और पुलिस ने मिलकर फंसाने का काम किया है.

इन तमाम प्रकार के बयानों के बीच इस बात में कोई दो राय नहीं है कि इन, शेल्टर होम, स्टे होम, अल्पावास गृह, आवास गृह, आप इसे कुछ भी कह लीजिए , पर सरकारी पकड़ ढीली होते ही तमाम तरह की विसंगतियां पनपने लग जाती हैं. जिन हालात में यह बच्चियों लाई जाती हैं, ऐसे में वह शोषण का सबसे आसान हथियार बन जाती हैं. ऊपर से अगर सरकारी तंत्र के साथ आपकी सांठ गांठ हो तब तो कोई 'रिपोर्ट' ही जिन्न की तरह आकर इन बच्चियों को बचाने का काम कर सकती है.

आगे की कड़ी में हम आपको बताएंगे कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के बालिका गृहों के लिए जारी किए गए दिशा निर्देशों में कितनी छोटी से छोटी बात पर भी ध्यान दिया गया है. गद्दे, तकिये से लेकर बच्चियों से कैसे बर्ताव करना है, हर एक बात लिखी हुई है.

(सभी इल्स्ट्रेशन्स - प्रशांत)
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