रामायण और महाभारत काल से जुड़ता है प्राचीन नगर दरभंगा का इतिहास

दरभंगा का किला

दरभंगा का किला

दरभंगा रियासत (Darbhanga principality) के आखिरी महाराज कामेश्वर सिंह (Maharaj Kameshwar Singh) अपनी शान-शौकत के लिए पूरी दुनिया में विख्यात थे. इससे प्रभावित होकर अंग्रेजों ने उन्हें महाराजाधिराज की उपाधि दी थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 28, 2020, 7:45 PM IST
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दरभंगा. बिहार का यह जिला अपने समृद्ध अतीत और प्रसिद्ध दरभंगा राजघराने (Darbhanga royalty) के लिए जाना जाता है. अपनी सांस्कृतिक और शाब्दिक परंपराओं के लिए भी दरभंगा मशहूर है और शहर बिहार की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में लोकप्रिय है. यहां का इतिहास रामायण (Ramayan) और महाभारत (Mahabharat) काल से जुड़ा है, जिसका जिक्र भारतीय पौराणिक महाकाव्यों में भी है. दरभंगा शब्द संस्कृत भाषा के शब्द 'द्वार-बंग' या फारसी भाषा के 'दर-ए-बंग' यानि बंगाल का दरवाजा का मैथिली भाषा में कई सालों तक चलनेवाले स्थानीयकरण का परिणाम है.

ऐसा कहा जाता है कि मुगल काल में दरभंगी खां ने शहर बसाया था. देश के रजवाड़ों में दरभंगा राज का हमेशा अलग स्थान रहा है. ये रियासत बिहार के मिथिला और बंगाल के कुछ इलाकों में कई किलोमीटर के दायरे तक फैला था. रियासत का मुख्यालय दरभंगा शहर था. ब्रिटिश इंडिया में इस रियासत का जलवा अंग्रेज भी मानते थे.

इलाके का खान-पान -----

विश्व के मानचित्र पर “पग –पग पोखरी और माछ-मखान, इहें छैथ मिथिलाक पहचान ” की युक्ति से प्रसिद्ध है यह मिथिला ! इस भूमि में उपजे माछ, मखान एवं पान का स्वाद तो देश - दुनिया के करोड़ों खाने वाले लोगों के दिलों पर राज करता है. इसके स्वाद का मज़ा किसी भी अन्य प्रांत में उपजे माछ, पान एवं मखान में कहां है. अपने स्वाद के दीवानों को मिथिला की मिटटी खींच ही लाती और उसे अधिक दिनों तक  सरकारी उपेक्षाओं के कारण भी रोक पाने में सफल नहीं हो पा रहा है. किन्तु , आज भी इस स्वाद के कायल न जाने कितने ही लोग है. उनकी लालसा रहती है कि एक बार भी कोई उस लजीज स्वाद का रस उन्हें चखा दें !
आम ----

दरभंगा में माछ ,मखान ,और पान के साथ आम भी काफी लोकप्रिय फल है. यहां के मालदह और बम्बइया आम के स्वाद के लोग दीवाने हैं. यहां के मालदह आम की मिठास दूसरे राज्य ही नहीं बल्कि देश में भी फैला हुआ है.

ऐतिहासिक-पर्यटन स्‍थल, संस्‍कृति-------



दरभंगा राज परिसर एवं किला: ऐतिहासिक-पर्यटन स्‍थल में  दरभंगा राज परिसर एवं किला  का सौंदर्य देखते ही बनता है. भव्य एवं योजनाबद्ध तरीके से अभिकल्पित महलों, मंदिरों एवं पुराने प्रतीकों को अब भी देखा जा सकता है. अलग-अलग महाराजाओं द्वारा बनबाए गए महलों में नरगौना महल, आनंदबाग महल एवं बेला महल प्रमुख हैं.

दरभंगा का ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी


कुशेश्वरस्थान शिवमंदिर: बाबा कुशेश्वर् नाथ का शिव मंदिर जिला मुख्यालय से लगभग 70  किलोमीटर दूर है. यह मंदिर मिथिला में बाबाधाम के नाम के रूप में प्रचलित है. इस मंदिर में उत्तर बिहार , नेपाल तथा झारखण्ड तक के भक्त गन पूजा करने के लिए आते है.

अहिल्यास्थान एवं गौतमस्थान: अहिल्या स्थान दरभंगा जिला में दरभंगा-सीतामढ़ी रेल पथ के कमतौल स्टेशन से दछिण दिशा में 2 किलो मीटर कि दूरी पर अवस्थित है. गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार जनकपुर जाने के क्रम में त्रेता युग में राम जी ने अपने चरण से किया था और उनके स्पर्श से पत्थर बनी अहिल्या में जान आ गई थी. मान्यता है कि उसी तरह जिस व्यक्ति के शरीर में अहिला होता है, वे रामनवमी के दिन गौतम और अहिल्या स्थान कुण्ड में स्नान कर अपने कंधे पर बैंगन का भार लेकर मंदिर आते हैं और बैंगन का भार चढ़ाते हैं तो उन्हें अहिला रोग से मुक्ति मिलती है.

श्यामा मंदिर: चिता पर बना है मां काली का धाम श्यामा काली मंदिर। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और सभी मांगलिक कार्य भी यहां होता है. श्यामा माई का मंदिर श्मशान घाट में महाराजा रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. वहीं प्रांगण में बने सभी मंदिर राजा के वंशजों के ही चिता पर बना हुआ है.

दरभंगा का मनोकामना मंदिर


नवादा भगवती: नवादा गांव स्थित भगवती मंदिर में मां हैयहट्ट देवी के सिंहासन की होती है पूजा, दर्शन के लिए आते हैं नेपाल सहित दूरदराज के भक्त आते हैं.

पहनावा: यहां परम्परागत परिधान धोती कुर्ता , पाग पाग है वैसे तो अब कम लोग इस परिधान को धारण करते है लेकिन वैवाहिक ऐंव मांगलिक कार्य में अभी भी लोग धोती कुर्ता  पहनते हैं.
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