लोकसभा चुनाव 2019: संघवाद और समाजवाद की 'जंग' में दरभंगा का दिल जीतने की चुनौती

News18 Bihar
Updated: April 29, 2019, 6:27 AM IST
लोकसभा चुनाव 2019: संघवाद और समाजवाद की 'जंग' में दरभंगा का दिल जीतने की चुनौती
दरभंगा का टावर चौक
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Updated: April 29, 2019, 6:27 AM IST
'मिथिलांचल का दिल' कहे जाने वाला दरभंगा अपने समृद्ध अतीत और प्रसिद्ध दरभंगा राज के लिए जाना जाता है. यह जिला अपनी सांस्कृतिक और शाब्दिक परंपराओं के लिए मशहूर है और शहर बिहार की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में लोकप्रिय है. यहां का इतिहास रामायण और महाभारत काल से जुड़ा है जिसका जिक्र भारतीय पौराणिक महाकाव्यों में भी है.

बहरहाल बीतते दौर के साथ दरभंगा ने कई बदलाव देखे हैं. कभी कांग्रेस की राजनीति का गढ़ रहा दरभंगा बदलते वक्त के साथ कभी समाजवादी राजनीति की प्रयोगशाला बनी तो कभी दक्षिणपंथी राजनीति की कर्मभूमि बन गई.

दरभंगा ने दिग्गजों को देखा
चुनावी राजनीति में दरभंगा का इतिहास बहुत पुराना है. ब्रिटिश भारत में यहां पहली बार 1893 में चुनाव हुआ था. इस चुनाव में दरभंगा राज परिवार के लक्ष्मेश्वर सिंह निर्वाचित हुए थे. इसके बाद कई चुनावों में दरभंगा राज परिवार के सदस्य जीतते रहे थे. कालांतर में दरभंगा की जनता ने अपने क्षेत्र से कई दिग्गज नेताओं को लोकसभा और विधानसभा भेजा. ये अलग-अलग सरकारों में मंत्री भी रहे.

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कांग्रेस के गढ़ में संघ और समाजवाद की पैठ
1971 तक दरभंगा लोकसभा सीट कांग्रेस का गढ़ रहा. बिहार के कद्दावर नेता रहे और भूतपूर्व रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा ने भी इस क्षेत्र का प्रनिधित्व किया.1980 में कांग्रेस यहां आखिरी बार जीती थी. तब पंडित हरिनाथ मिश्र लोकसभा चुनाव जीते थे. उसके बाद यहां से समाजवादी और संघ की पृष्ठभूमि के उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं.
दरभंगा महाराज की ऐतिहासिक विरासत


जातीय समीकरण पर दारोमदार
दरभंगा लोकसभा क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें आती हैं. दरभंगा नगर, बहादुरपुर, दरभंगा ग्रामीण, अलीनगर, बेनीपुर और गौड़ा बौराम विधानसभा को मिलाकर दरभंगा लोकसभा क्षेत्र का गठन हुआ है. माना जाता है कि यहां यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण जाति के वोटर निर्णायक होते हैं. इस सीट पर मुसलमान वोटरों की संख्या साढ़े तीन लाख है. जबकि यादव और ब्राह्मण जाति के वोटरों की संख्या तीन-तीन लाख के करीब है. सवर्ण जातियों में राजपूत और भूमिहार वोटरों की आबादी एक-एक लाख है.

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बाढ़-पलायन सबसे बड़ा मुद्दा
जाति-धर्म की परवान चढ़ती राजनीति और सामाजिक आंदोलनों का गवाह रहे दरभंगा की राजनीति में हर दौर में विकास ही मुख्य मुद्दा रहा है. विडंबना ये है कि एक से एक दिग्गज नेताओं की कर्मभूमि रही यह धरती आज भी बाढ़ के कहर से निजात नहीं पा सकी. रोजगार के लिए पलायन आज भी यहां की सबसे बड़ी समस्या है. देश के किसी भी कोने में जाएंगे तो दरभंगावासी आपको जरूर मिल जाएंगे जो दूसरे प्रदेशों में रोजगार के लिए गए हैं.

3 बार सांसद चुने गए कीर्ति आजाद
RJD की टिकट पर अली अशरफ फातमी 4 बार दरभंगा से लोकसभा चुनाव जीते. जबकि ब्राह्मण जाति के कीर्ति झा आजाद 1999, 2009 और 2014 में दरभंगा के सांसद चुने गए.  2014 के लोकसभा चुनाव में BJP की टिकट पर कीर्ति झा आजाद चुनाव जीते थे. उन्होंने RJD के अली अशरफ फातमी को 46,453 मतों से मात दी थी. हालांकि कीर्ति झा आजाद को पार्टी ने कुछ दिनों बाद ही निलंबित कर दिया.

दरभंगा के वर्तमान सांसद कीर्ति झा आजाद


दरभंगा के मौजूदा सांसद कीर्ति झा आज़ाद के कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं और अब वे दरभंगा से नहीं झारखंड धनबाद से चुनावी मैदान में हैं. दरभंगा में जहां एनडीए की ओर से बीजेपी के टिकट पर गोपालजी ठाकुर मैदान में हैं वहीं महागठबंधन की ओर से आरजेडी के टिकट पर अब्दुल बारी सिद्दीकी चुनाव लड़ रहे हैं.

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दिलचस्प होगा मुकाबला

बहरहाल दरभंगा लोकसभा सीट पर इस बार का लोकसभा चुनाव काफी दिलचस्प होगा. कीर्ति झा आजाद मैदान छोड़ धनबाद चले गए हैं. वहीं गोपालजी ठाकुर और अब्दुल बारी सिद्दीकी के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा है. सामाजिक समीकरणों के लिहाज से यहां आरजेडी के MY समीकरण के जवाब में अतिपिछड़ा, पिछड़ा, दलित, महादलित और सवर्णों के कम्बीनेशन को बीजेपी ने अपनी सियासी चाल चली है. देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में यहां क्या नतीजा रहता है.

रिपोर्ट- बृजम पांडे/विपिन कुमार दास

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