बाढ़ से ढह गया था स्कूल, 22 सालों से पेड़ के नीचे पढ़ रहे बच्चे

दरभंगा जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर बहादुरपुर प्रखंड के उघरा गांव में स्थित राधाकांत प्राथमिक सह मध्य संस्कृत स्कूल सालों से अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. इस स्कूल की स्थापना 1978 में हुई थी. स्कूल में बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर ही पढ़ने को मजबूर हैं क्योंकि स्कूल के पास भवन नहीं है.

Vipin Kumar Das | ETV Bihar/Jharkhand
Updated: November 14, 2017, 7:21 PM IST
बाढ़ से ढह गया था स्कूल, 22 सालों से पेड़ के नीचे पढ़ रहे बच्चे
दरभंगा में 22 सालों से पेड़ के नीचे पढ़ रहे हैं बच्चे (ईटीवी वीडियो)
Vipin Kumar Das | ETV Bihar/Jharkhand
Updated: November 14, 2017, 7:21 PM IST
आजादी के 70 साल बाद भी देश के कई हिस्सों में बच्चों की शिक्षा के स्तर में कोई बदलाव होता नहीं दिखता वो तब जब कि सरकारें डिजिटल इंडिया की बात कर रही हो. हम साल दर साल पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं. इस दिन पर हम सभी बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की बात करते हैं.

आधुनिक शिक्षा बच्चों के लिए जरूरी ही नहीं बल्कि समय की मांग भी है. आज भी देश के कई ऐसे हिस्सों में है शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है. बाल दिवस के मौके पर हम जो तस्वीरें दिखाने जा रहे हैं वो तस्वीरें ये बताने के लिए काफी हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में हम आज भी काफी पीछे हैं. चाचा नेहरू भी आज अगर होते तो जरूर विचलित हो जाते.

दरभंगा जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर बहादुरपुर प्रखंड के उघरा गांव में स्थित राधाकांत प्राथमिक सह मध्य संस्कृत स्कूल सालों से अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. इस स्कूल की स्थापना 1978 में हुई थी. स्कूल में बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर ही पढ़ने को मजबूर हैं क्योंकि स्कूल के पास भवन नहीं है.

गांव के पास नदी का बांध टूटने से बाढ़ के पानी ने 22 साल पहले ही इस स्कूल को भवन विहीन कर दिया था. तब से आज तक ये स्कूल पेड़ के नीचे ही संचालित होता आ रहा है. 320 छात्रों वाले इस स्कूल में पढ़ाने के लिए महज 6 शिक्षक हैं.

स्कूल परिसर में लगे पेड़ ही अलग-अलग क्लास हैं. जिला के जनप्रतिनिधि से लेकर पदाधिकारी तक स्कूल प्रशासन गुहार लगा चुका है, लेकिन आज तक किसी ने इस स्कूल की व्यथा पर ध्यान नहीं दिया. अब हार कर स्कूल के प्रधानाचार्य पेड़ के नीचे ही स्कूल का परिचालन कर रहे हैं. सड़क किनारे खुले आसमान के नीचे बच्चे पेड़ की छांव में पढ़ते तो हैं, लेकिन सड़क से गुजरते वाहन का शोर और दुर्घटना से मन अशांत रहता है जिससे शिक्षक और छात्र दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ता है.
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