जहां भगवान राम ने अपने पितरों का किया था पिंडदान वह प्राचीन नगर है गया
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जहां भगवान राम ने अपने पितरों का किया था पिंडदान वह प्राचीन नगर है गया
गया का विष्णुपद मंदिर

फल्गु नदी के तट (Banks of river Phalgu) एवं इस पर स्थित मंदिर सुन्दर एवं आकर्षक हैं. फल्गु नदी के तट पर स्थित पीपल का वृक्ष है जिसे अक्षयवट कहते हैं, हिंदुओं के लिए पवित्र है. यह वृक्ष अपनी दिव्यता की वजह से पूजा जाता है.

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  • Last Updated: August 28, 2020, 5:39 PM IST
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गया. ऐतिहासिक रूप से गया प्राचीन मगध साम्राज्य (Ancient Magadha Empire) का हिस्सा था. यह शहर फल्गु नदी के तट पर अवस्थित है और हिंदुओं के लिए मान्यताप्राप्त पवित्रतम स्थलों में से एक है. तीन पहाड़ियां मंगलागौरी, सृंग स्थान , रामशिला और ब्रह्मयोनि इस शहर को तीन ओर से घेरती है. जिससे इसकी सुरक्षा एवं सौंदर्या प्राप्त होता है. गया (Gaya) महान विरासत एवं ऐतिहासिक को धारण करने वाला एक प्राचीन स्थान है. गया शहर के नामकरण के पीछे यह मान्यता है की यहां भगवान विष्णु ने एक द्वन्द में गयासुर का वध किया था. यह शहर इतना पवित्र है कि यहां स्वयं भगवान राम (Lord Rama) ने अपने पितरों का पिंडदान (Pinddan) किया था. प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है कि भगवान राम अपने पूर्वजों को मोक्ष प्रदान करने क लिए गया आए थे और देवी सीता भी उनके साथ थी.

गया सिर्फ हिंदुओं का ही नहीं बल्कि बौद्धों का भी पवित्र स्थान है. गया बुद्ध के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यही वह स्थान है जहां भगवान बुद्ध ने 1000 ग्रामवासियों को जो अग्नि पूजक थे, जो आदित्यपर्याय सूत्र का उपदेश दिया था. बुद्ध के उपदेश का प्रभाव था की भी लोगों ने बौद्ध धर्म को अपना लिया था. गया में कई बौद्ध तीर्थ स्थान हैं. गया के ये पवित्र स्थान प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं. जिनमें से अधिकांश भौतिक सुविधाओं के अनुरूप है.

आधुनिक इतिहास



बिहार का गया जिला राज्य के सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है. वर्ष 1764 में बक्सर के युद्ध में अंग्रेजों की जीत के परिणामस्वरूप बिहार का दीवानी और राजस्व अधिकार अंग्रेज कंपनी के हाथ चला गया. सन1864 तक गया तत्कालीन बिहार तथा रामगढ जिलों का हिस्सा बना रहा. 1865 में गया को एक पूर्ण जिले के रूप में मान्यता प्राप्त हुआ.
1947 में देश के अन्य प्रान्तों के साथ गया को भी आजादी मिली. 1976 में गया जिला को विभक्त कर दो नए जिलों – औरंगाबाद एवं नवादा का सृजन किया गया. कालान्तर में मई, 1981 में बिहार राज्य सरकार द्वारा गया, नवादा, औरंगाबाद एवं जहानाबाद कुल चार जिलों को सम्मिलित करते हुए मगध प्रमंडल का सृजन किया गया. ये सभी जिलें वर्ष 1865 में गया जिले के गठन के पूर्व तक अनुमंडल हुआ करता था.

सांस्कृतिक-धार्मिक महत्व के स्थान

80 फुट की बुद्ध प्रतिमा: महान बुद्ध की मूर्ति को 80 फुट की बुध प्रतिमा के रूप मे जाना जाता है. इसका अनावरण एव लोकपन 18 नवंबर 1989 को समारोहपूर्वक 14वें पवित्र दलाई लामा की उपस्थति मे किया गया था. जिन्होंने इस 25 मीटर की प्रतिमा को आशीर्वाद प्रदान किया. यह महान बुद्ध की पहली प्रतिमा थी जिसे आधुनिक भारत के इतिहास मे बनाया गया था| यह प्रतिमा महाबोधि मंदिर बोधगया के आगे स्थित है| यहा पर सुबह 7 बजे 12 बजे तक दोपहर 2बजे से शाम . 6 बजे तक दर्शन किया जा सकता है

संग्रहालय: यहां पर बोधगया और आसपास क स्थित खुदाई स्थलो से प्राप्त बहुत सी हिंदू और बुद्ध पुरातात्विक वस्तुओं का रोचक सक़लन है. प्राचीन विदेशी मतों में से एक जिसे कलात्मक रेगल थाई स्थापत्या शैली मे बनाया गया है. यह मंदिर लाल और पीले रतन के रूप में सामने की शांत झील में प्रतिबिम्बित होता है. यहां शानदार बुद्ध प्रतिमाएं है साथ ही भव्य भित्तिचित्र है जो बुद्ध के जीवन और कुछ आधुनिक घटनाओं, जैसे- वृक्षारोपण का महत्व को सैलीगत तरीके से अत्यंत खूबसूरती से दर्शाया गया है. यह महाबोधि मंदिर से आगे स्थित है.

बोधगया का महाबोधि मंदिर.


सुजाता गढ़/ सुजाता गांव: इस प्राचीन स्तूप के बारे में मान्यता है कि इसी स्थान पर सिद्धार्थ गौतम ने ज्ञान पर्प्ति से पूर्व भूखे रह कर कठोर तपस्या की थी. गौतम को अत्यंत कृशकाय पाकर पास क गौव की औरत सुजाता ने खीर का कटोरा पेश किया| गौतम ने वह उपहार स्वीकार किया स्वपीड़ा के कठोर निग्रह की व्यर्थता को महसूस किया. इसके बाद उन्होंने बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान लगाया और ज्ञान प्राप्त कर बुद्ध बन गए. यह महाबोधि मंदिर बोधगया से लगभग दो किलोमेट दूर है.

दुंगेश्वरी मंदिर / दुंगेश्वरी पहाड़ी: मान्यताओं के अनुसार बोधगया मे ज्ञान प्राप्ति के पूर्व सिद्धार्थ गौतम ने यहां 6 वर्षों तक ध्यान किया था. बुध के इस जीवन चरण की याद मे दो छोटे मंदिर यहां बनाए गये हैं. क्षीण स्वर्ण से निर्मित बुध की एक प्रतिमा गुहा मंदिर में रखी है जो बुद्ध के कठोर निग्रह को दर्शाती है और दूसरे मंदिर मे लगभग छह फुट ऊंची बुद्ध की प्रतिमा है. एक हिंदू देवी दुंगेश्वरी की भी मूर्ति गुहा मंदिर के अंदर रखी हुई है.

विष्णुपद मंदिर: गया का सबसे आकर्षक स्थल विष्णुपद मंदिर है. यह फल्गु नदी के तट पर स्थित है और इसमें बेसाल्ट पत्थरों पर भगवान विष्णु के चरण चिन्ह खुदे हैं. लोगों की मान्यता है की भगवान विष्णु ने यहीं पर गयासुर की छाती पर अपने पैर रख कर उसका वध किया था. प्राचीन विष्णुपद मंदिर को बाद में इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने 18वीं सदी में पुननिर्मित कराया. हिंदू विष्णुपद स्थित चरण चिन्हों को भगवान विष्णु का जबकि बौद्ध इन्हें भगवान बुद्ध के चरण चिन्ह के रूप में मान्यता देते हैं. यह मंदिर यहां का सबसे मुख्य धार्मिक तीर्थस्थल है.

मंगला गौरी मंदिर: यहां भगवान शिव की प्रथम पत्नी के रूप में मान्य सती देवी की पूजा की जाती हैं. यहां स्थित दो गोल पत्थरों को पौराणिक देवी सती के स्तनों का प्रतीक मानकर हिंदुओं के बीच पवित्र माना जाता है.

बोधगया: बोधगया विश्व के प्रमुख एवं पवित्र बौद्ध तीर्थस्थलों में से एक है. यहीं बोद्धि वृक्ष के नीचे गौतम ने अलौकिक ज्ञान प्राप्त किया जिसके उपरांत उन्हें बुद्ध कहा गया.

महाबोधि मंदिर: यह मंदिर बोधिवृक्ष के पूर्व में स्थित है. इसका स्थापत्य अदभुत है. इसकी निन 48 वर्ग फुट है जो सिलिंडर पिरामिट के रूप में इस की गर्दन तक उठती चली गई है क्योंकि इसका आकर सिलिन्डरिकल है. मंदिर की कुल उँचाई 170 फुट है और मंदिर के शिखर पर छत्र है जो धर्म की संप्रभुता का प्रतीक है.

इसके चारों कोनों पर स्थित मीनार कलात्मक ढंग से बनाए गये हैं जो पवित्र बनावट को संतुलन प्रदान करते हैं. यह पवित्र इमारत समय पर फहराया गया एक महान एक बैनर है जो दुनिया को सांसारिक समस्याओं से उपर उठकर, मानव के दुखमय जीवन को शांति प्रदान करने के लिए बुद्ध के पवित्र प्रयासों का प्रचार करने के लिए और ज्ञान अच्छे आचरण और अनुशासित जीवन के माध्यम से दिव्यशांति प्राप्त करने के लिए किए गये प्रयास का प्रतीक है.

मंदिर के अंदर मुख्य क्षेत्र में बुध की बैठी हुई मूर्तिस्थित है जिस में वे अपने दाएं हाथ से बनी हुई है जो श्रद्धालूओं के दान से लाई गई थी. मंदिर का पूरा छेत्र कई श्रद्धा हेतु निर्मित स्तूपों से भरा हुआ है. ये स्तूप विभिन्न आकार के हैं जो पिछले 2500 सालों के दौरान बनाए गये हैं. इनमें से ज़्यादातर स्थापत्य की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक हैं. प्राचीन वेदिका जो मंदिर को चारों ओर घेरती हैं पहली सदी ई०पू० की है और यह उस सदी की रोचक स्मारकों मे से एक है.

अनिमेष लोचन चैत्य: यह विश्वास किया जाता है कि बुद्ध ने महान बोद्धिवृक्ष को बिना पलकें झपकाये देखते हुए यहां एक साप्ताह बिताया था. वर्तमान बोद्धिवृक्ष वास्तविक वृक्ष का संभवतः पांचवाँ उतराधिकार है जिसके नीचे बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था.

वज्रासन – महाबोधि वृक्ष के नीचे एक पत्थर की प्लेटफार्म है जिसपर मान्यता है क़ि बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के तीसरे हफ्ते बैठकर पूर्व की ओर देखते हुए ध्यान लगाया करते थे.

चक्रामण – यह पवित्र चिन्ह है जो बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति के तीसरे हफ्ते बाद में ध्यान की मुद्रा में टहलने से बना है. मान्यता है कि यहां बुद्ध ने अपने पदमचरण रखे थे. रतनगढ़ में बुध ने एक सप्ताह बिताया था जहां विश्वास है कि उनके शरीर से पांच रंग फूटने लगे थे.

संस्कृति और विरासत

फल्गु नदी: गया शहर के पूर्वी छोर पर प्रबाह्मान फल्गु नदी मूलतः एक बरसाती नदी है. साल के अन्य समय में यह नदी बिलकुल सुखा पढ़ा होता है परन्तु नदी में थोड़ी सी बालू की रेत को हटाए जाने पर ही पानी मिल जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार माता सीता द्वारा श्राप दिए जाने के पश्चात् फल्गु नदी अन्तःसलिला के रूप में प्रबाहित होती आ रही है.

अक्षयवट: विश्वविख्यात अक्षय वट विष्णुपद मंदिर के इर्द-गिर्द ही स्थित है. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार अक्षयवट को माता सीता द्वारा अमर होने का वर प्राप्त है जिसके पत्ते किसी भी ऋतु में नहीं झरते.

गया का प्रसिद्ध अक्षयवट


सीता कुण्ड: विष्णुपद मंदिर के ठीक पीछे की ओर फल्गु नदी के तट पर सीता कुण्ड अवस्थित है जहां माता सीता ने अपने ससुर श्री राजा दशरथ का पिण्डदान एवं श्राद्धकर्म किया था.

मंगला गौरी: गया शहर के दक्षिण की ओर एक छोटा पहाड़ पर यह प्रसिद्ध माता सती (गौरी) का मंदिर है. यह मंदिर अक्षयवट मंदिर के नजदीक स्थित है. एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् शिव जब पत्नी माता सती की मृत्यु पर उन्मत्त होकर प्रलयंकारी नृत्य में लीन थे तो भगवान विष्णु ने उसे शान्त करने के लिये अपने चक्र का उपयोग करते हुए माता सती के देह को कई टुकरों में काट दिया था. तत्पश्चात कटे हुए यह टुकरें बिभिन्न स्थानों पर गिरे एवं प्रत्येक वैसा जगह एक शक्ति पीठ (माता गौरी के पवित्र पूजन स्थली) के रूप में आज भी विराजमान है.

रामशीला पर्वत: गया शहर के दक्षिण-पूर्वी छोर पर स्थित रामशीला पर्वत एक पवित्र स्थल के रूप में ख्याति प्राप्त है. मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम इसी पहाड़ी पर राजा दशरथ का पिण्डदान किया था जिसके आधार पर ही इस पहाड़ी का नाम रामशीला पड़ा. पहाड़ी पर पुरातन कालीन मूर्तियों का संग्रह आज भी विद्यमान है. पहाड़ी के ऊपर स्थित रामेश्वर या पातालेश्वर मन्दिर सन १०१४ ए०डी० में निर्मित हुआ था परन्तु कालान्तर में कई बार इसका जीर्णोद्धार एवं मरम्मती किया गया. पितृपक्ष मेला के दौरान इसी मंदिर के सामने बैठकर हिन्दू मान्यता के अनुरूप पूर्वजों के लिये पिण्डदान किये जाने का विधान है.

प्रेतशीला पर्वत: रामशिला पहाड़ी से तकरीबन10 कि०मी० की दूरी पर प्रेतशीला पहाड़ी स्थित है जिसके नीचे ब्रह्मकुण्ड अवस्थित है. इसी कुण्ड में नहाने के बाद ही लोग पिण्डदान कर्म प्रारम्भ करते हैं. इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा वर्ष 1787 ई में इस पहाड़ पर एक मंदिर का निर्माण कराया गया था जो अहिल्याबाई मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है. शानदार वास्तुकला एवं अद्वितीय मूर्तिकला के लिये यह मंदिर पर्यटकों के लिये सर्वदा ही एक आकर्षण का केंद्र बना हुआ रहा है.

पहनवा, रहन-सहन
पटना व गया जिले के ग्रामीण इलाकों के लोग अपने माथे पर ‘पगड़ी’ व कानों में ‘कुंडल’ पहन कर बेहद ही पारंपरिक नजर आते हैं. ग्रामीण इलाकों की महिलाएं अपनी बांह या कलाई पर टैटू लगवाती हैं, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘गोदना या गुदवाना’ कहा जाता है.

खान-पान
परंपरागत भोजन में दाल-भात और चोखा मशहूर है. वहीं मिठाईयों की विभिन्न किस्मों के अलावे अनरसा की गोली, खाजा, मोतीचूर का लड्डू, तिलकुट, खुरमा यहां की खास पसंद है. सत्तू और लिट्टी-चोखा जैसे स्थानीय व्यंजन तो यहां के लोगों की कमजोरी है. लहसुन की चटनी भी बहुत पसंद की जाती है.

गया का तिलकुट: गया का तिलकुट पूरे देश में प्रसिद्ध है. संक्रांति के एक महीने पहले से ही गया की सड़कों पर तिलकुट की सोंधी महक और तिल कूटने की धम-धम की आवाज लोगों के जेहन में इस पर्व की याद दिला देती है.
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