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Gaya लोकसभा नतीजे: जदयू के विजय मांझी ने जीतन राम मांझी को हराया

जीतन राम मांझी के सामने गया जीत पाने की बड़ी चुनौती!

जीतन राम मांझी के सामने गया जीत पाने की बड़ी चुनौती!

गया लोकसभा नतीजे (Gaya Election Result): जीतन राम मांझी (Jitan Ram Manjhi)

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बिहार के पूर्व सीएम जीतन राम मांझी बिहार में महादलित राजनीति का बड़ा चेहरा हैं. उनकी छवि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को सीधे टक्कर देने वाले नेताओं की भी है. कभी मोदी मुरीद रहे जीतन राम मांझी, अब लालू के करीब हैं. लेकिन बिहार की गया लोकसभा सीट से जदयू प्रत्याशी विजय मांझी ने महागठबंधन प्रत्याशी जीतनराम मांझी को 1,52,426 मताें से हरा दिया है. जीतनराम मांझी को 3,14,581 वोट मिले, जबकि विजय मांझी को 4,67,007 मत मिले. इस सीट पर 30,030 मत नोटा को डाले गए.

इस लोकसभा चुनाव में बिहार की गया लोकसभा सीट से महागठबंधन की ओर से उम्मीदवार हैं. गया जिले के स्थानीय होने और बीजेपी के हरि मांझी की जगह जेडीयू से विजय मांझी से सीधा मुकाबला होने की वजह से वे सुर्खियों में हैं.

मजदूर से सीएम का सफर



जीतन राम मांझी ने शुरुआती संघर्ष एक मजदूर के तौर पर किया, फिर पोस्टल डिपार्टमेंट में क्लर्क बने और राजनीति के मैदान में उतरकर सूबे के मुखिया भी बने. मांझी ने 80 के दशक में राजनीतिक सफर की शुरुआत की. वे कांग्रेस, आरजेडी और जेडीयू की राज्य सरकारों में मंत्री का पद संभाल चुके हैं.
छह बार विधायक रहे मांझी पहली बार कांग्रेस की चंद्रशेखर सिंह सरकार में 1980 में मंत्री बने थे. इसके बाद बिंदेश्वरी दुबे की सरकार में मंत्री रहे. इसके बाद नीतीश सरकार में मंत्री बने और 2014 के बाद मांझी मुख्यमंत्री बने.

मांझी मुसहर समुदाय से आते हैं और उनका जन्म बिहार के गया जिला के खिजरसराय के महकार गांव हुआ था. उनके पिता रामजीत राम मांझी एक खेतिहर मजदूर थे. जीतन राम मांझी को भी बचपन में जमीन मालिक द्वारा खेतों में काम पर लगा दिया जाता था, लेकिन वे अलग मिट्टी के ही बने थे और जीवन में ऊंचा मुकाम हासिल किया.

कांग्रेसी आंदोलन का हिस्सा

1980 में डाक विभाग की नौकरी छोड़कर कांग्रेस पार्टी के उस आंदोलन का हिस्सा बन गए, जो 'आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को जिताएंगे' पर आधारित था. इसके बाद 1980 में पहला चुनाव लड़ा और जीतकर मंत्री बने.

वे राबड़ी देवी की सरकार में भी मंत्री बने और फिर नीतीश का दामन थाम लिया और उनके करीबी बन गए. इसी का नतीजा है कि नीतीश ने जब सीएम के पद से इस्तीफा दिया तो उन्होंने अपनी मांझी को सौंपी.

हालांकि जब नीतीश ने बाद में उनसे इस्तीफा देने के लिए कहा तो वो चुनौती बनकर उनके सामने खड़े हो गए. इस बार के सियासी संग्राम में वह नीतीश कुमार की पार्टी के खिलाफ ही चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं.
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