सूर्यग्रहण में भी बंद नहीं होता है गया के विष्णुपद मंदिर का कपाट, जानें क्यों
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सूर्यग्रहण में भी बंद नहीं होता है गया के विष्णुपद मंदिर का कपाट, जानें क्यों
गया के विष्णुपद मंदिर में पूजा करते श्रद्धालु

मंदिर के पंडा प्रीतम धोकड़ी ने कहा कि गया के विष्णुपद मंदिर एक वेदी के रूप में प्रतिष्ठित है जहां देश-विदेश के सनातन धर्म के मानने वाले लोग सालों भर अपने मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करने आतें हैं.

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गया. सैकड़ों साल के बाद लगे सूर्यग्रहण (Solar Eclipse 2020) के दौरान देशभर की अधिकांश मंदिरों के कपाट बंद हो गये हैं लेकिन गया के ऐतिहासिक विष्णुपद मंदिर (Vishnupad Temple) का कपाट बंद नहीं किया गया और इस दौरान सनातन धर्म को मानने वाले श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर में विशेष रूप से अपने पितरों के लिए पिंडदान किया और विष्णुचरण पर उन्हें अर्पित किया. श्रद्धालुओं के इस धार्मिक कार्य में गयापाल पंडा समाज ने भी सहयोग किया.

ग्रहण में क्यों नहीं बंद होता है विष्णुपद मंदिर का द्वार

सूर्य और चंद्रग्रहण के दौरान विष्णुपद मंदिर का कपाट कभी भी बंद नहीं होता है. इसकी वजह बताते हुए स्थानीय पंडा प्रीतम धोकड़ी ने कहा कि गया के विष्णुपद मंदिर एक वेदी के रूप में प्रतिष्ठित है जहां देश-विदेश के सनातन धर्म के मानने वाले लोग सालों भर अपने मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण करने आतें हैं. धार्मिक मान्यताओं के अऩुसार जो काल शादी-विवाह एवं शुभ कार्य के लिए मनाही होता है उस काल में पिंडदान करने पर दस गुणा लाभ होता है. यही वजह है कि मलमास, अमावस्या और ग्रहण के दौरान सनातन धर्मावलंबी विशेष रूप से पिंडदान और तर्पण करतें हैं.  ऐसी किंवन्ती है कि इस दौरान मृत आत्मा गया के आस-पास विचरण करते रहते हैं और उनके संतान द्वारा दिया गया पिंड उन तक पहुंच जाता है, जिससे मौत के बाद भटकती हुई आत्मा को मोक्ष मिल जाती है.



सूर्यग्रहण के दौरान पिंडदान करने वाले श्रद्धालु खुश
यूं तो कोरोनाबंदी की वजह से पिंडदान के लिए ज्यादा श्रद्धालु गया नहीं आ पा रहें हैं फिर सूर्यग्रहण के दौरान काफी संख्या में लोगों ने अपने पितरों के लिए पिंडदान किया. पश्चिम बंगाल से आये एक श्रद्धालु रामेश्वरम ने कहा कि वे अपने परिवार के साथ सूर्यग्रहण के दौरान पिंडदान करने के लिए गया आये हुए हैं,और यहां पिंडदान करके उननहें इस बात की सुखद अऩुभूति हुई है कि उन्होंने अपने पूर्वजों के लिए अपने कर्म को पूरे किये हैं. अब उनके पूर्वज तो वापस नहीं आ सकतें हैं पर उनके द्वारा किया गया कार्य सदा उन्हें प्रेरित करता रहेगा.

बद्रीनाथ और विष्णुपद की परम्परा एक जैसी

ग्रहण के दौरान देश के अधिकांश मंदिर के कपाट बंद होतें हैं. स्थानीय ज्योतिषाचार्य पंडित गोपालकृष्ण की मानें तो ग्रहण के शुरू होने से चार पहर यानी 12 घंटे पहले मंदिरों के कपाट बंद करने की परम्परा है और ग्रहण के बाद 3 घंटे बाद मंदिर को आम श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है. इस दौरान साफ-सफाई एवं विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है क्योंकि ग्रहण के दौरान स्पर्श मात्र से दोष होना की आशंका रहती है. देश के अधिकांश प्रतिष्ठित मंदिर में इस परम्परा का पालन किया जाता है.

हर दिन है एक पिंड एक मुंड की परंपरा

कई मंदिरों को ग्रहण काले से कुछ पहले बंद किया जाता है वहीं उत्तराखंड के बद्रीनाथ और गया के विष्णुपद मंदिर की परम्परा अलग है. दोनों मंदिर भगवान विष्णु से ही जुड़े हुए हैं. बर्फ की वजह से बद्रीनाथ अप्रैल के अंतिम सप्ताह से नवंबर के शुरूआत तक लगतार श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है और ग्रहण के दौरान भी यहां का कपाट बंद नहीं किया जाता है. उसी तरह विष्णुपद मंदिर में हरेक दिन एक पिंड और एक मुंड का परम्परा है और इस परम्परा के पालन के लिए ग्रहणकाल मे भी मंदिर को बंद नहीं किया जाता है.
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