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भीख मांगना छोड़ तिब्बती भाषा सीख रहे हैं महादलित बच्चे
Gaya News in Hindi

Arun Chaurasia | News18 Bihar
Updated: February 24, 2020, 5:24 PM IST
भीख मांगना छोड़ तिब्बती भाषा सीख रहे हैं महादलित बच्चे
भीख न मांगने की शर्त पर मिलती है तिब्‍बती भाषा की शिक्षा.

दलाईलामा (Dalai Lama) और दशरथ मांझी (Dasharatha Manjhi) के प्रेरणा से रामजी मांझी (Ramji Manjhi) दे रहे हैं इन बच्‍चों को मुफ्त में शिक्षा (Free Education).

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गया (Gaya): बोधगया में महादलित परिवार (Mahadalit Family) के बच्चे विदेशियों (Foreigner) के सामने भीख मांगना छोड़ कर हिन्दी (Hindi) और अंग्रेजी (English) के साथ तिब्बती भाषा (Tibetan Language) की पढ़ाई में जुट गये हैं. यह नेक काम हुआ है स्थानीय रामजी मांझी (Ramji Manjhi) के प्रयास से. खुद की उच्च शिक्षा का सपना पूरा नहीं करने वाले रामजी मांझी ने यह काम तिब्बती धर्म गुरू दलाईलामा (Dalai Lama) और पर्वत पुरूष दशरथ मांझी (Dasharth Manjhi) की प्रेरणा से शुरू किय़ा है.

बोधगया के बकरौर स्थित पुराने चरवाहा विद्यालय के भवन में सेनानी सामाजिक जागरूकता समूह द्वारा महादलित बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा दी जा रही है. यहां पढने वाले कुल 110 बच्चों में ज्यादातर गरीब और अशिक्षित परिवार के हैं. इनमें से कई बच्चें पहले भगवान बुद्ध की ज्ञानस्थली महाबोधी मंदिर एवं अन्य विदेशी मोनेस्ट्री के बाहर देश-विदेश से आनेवाले पर्यटकों से भीख मांगा करते थे. आज ये यहां आकर पढाई कर रहें हैं और आने वाले दिनों में शिक्षक, डॉक्‍टर और इंजीनियर बनने का सपना देख रहे हैं.

हिंदी और अंग्रेजी ही नहीं, तिब्‍बती भाषा सीख रहे बच्‍चे
यहां पढ़ने वाले बच्‍चे हिन्दी और अंग्रेजी के साथ ही तिब्बती भाषा की भी पढाई कर रहें हैं. इनमें कई बच्चें तिब्बती भाषा बोलना भी सीख गए हैं. यहां पढाई कर रही सुरभि कुमारी, नंदनी कुमारी समेत कई छात्र-छात्रा ने बताया कि पहले वे देश विदेश से आने वाले लोगों से पैसा मांगते थे, पर अब भीख मांगना छोड़कर पढाई कर रहे हैं. दरअसल यहां महादलितों को हिन्दी और अंग्रेजी के साथ मुफ्त में तिब्बती भाषा की शिक्षा देने में मुख्य भूमिका रामजी मांझी द्वारा निभाई जा रही है.



इनकी प्रेरणा बनी नेक काम की वजह
रामजी मांझी गरीबी की वजह से खुद ज्यादा पढाई नहीं कर पाये और 12 साल की उम्र में ही काम करने के लिए निकल पड़े. वे 1985 से दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में दलाईलामा के सहयोगियों के साथ काम रहे है. इस दौरान, उन्‍होंने खुद तिब्बती भाषा सीख ली. बोधगया वापस आने पर दलाईलामा द्वारा मानव की सेवा और पर्वत पुरूष दशरथ मांझी के कठिन मेहनत के विचार से प्रेरणा लेकर महादलित बच्चों को शिक्षित करने के लिए प्रयास शुरु किया.

इस शर्त पर मिलता है दाखिला
इसके लिए बकरौर स्थित चरवाहा विद्यालय के पुराने भवन को शिक्षा का केंद्र बनाया, जो देखरेख के अभाव में जर्जर हो रहा था. यहां बच्चों से किसी तरह की फीस नहीं ली जाती है. बच्चों के शिक्षित करने में स्थानीय टोला सेवक एवं अन्य सामाजिक कार्यकर्ता भी इनका सहयोग कर रहें हैं. रामजी मांझी ने बताया कि वे यहां पढ़ने वाले सभी बच्चों एवं अभिभावकों से भीख नहीं मांगने की शर्त लेकर नामांकन करवाते हैं. इसका असर भी समाज में देखा जा रहा है, अब ये बच्चें भीख मांगने के बजाय पढाई पर ध्यान दे रहें हैं.

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First published: February 24, 2020, 5:24 PM IST
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