लाइव टीवी

बदल रही तस्वीर: जंगल में लकड़ी काटने वाली लड़कियों के हाथों में अब है कलम, नक्सल प्रभावित इलाके के लोगों की बदल रही सोच

News18 Bihar
Updated: November 27, 2019, 10:30 AM IST
बदल रही तस्वीर: जंगल में लकड़ी काटने वाली लड़कियों के हाथों में अब है कलम, नक्सल प्रभावित इलाके के लोगों की बदल रही सोच
जमुई के खैरा इलाके में चल रहे बालिका छात्रावास की तस्वीर.

शिक्षिका सूर्यमणि हेम्ब्रम की मानें तो लड़कियां जब शुरू में आई थी हिंदी बोलना नहीं जानती थी. कई ऐसी भी हैं जिनके गांव में अभी तक किसी ने मैट्रिक पास तक नहीं किया है. अब यहां आकर ये और इनके परिजन शिक्षा के महत्व को समझ गए हैं.

  • News18 Bihar
  • Last Updated: November 27, 2019, 10:30 AM IST
  • Share this:
जमुई. नक्सल प्रभावित (Naxal affected) इलाके के गांव की बेटियों को शिक्षा के मुख्यधारा में जोड़ने की कोशिश रंग दिखाने लगी हैं. जिन इलाकों की लड़कियां अपनी मां के साथ जंगल में जाकर लकड़ियां काटती थीं वे अब शिक्षा की मुख्यधारा (Mainstream) से जुड़ रही हैं. यह तब संभव हुआ जब सरकार के समग्र शिक्षा अभियान के तहत यहां बालिका छात्रावास (Girls Hostel) खुला. यहां इस इलाके की 100 लड़कियों को रखकर शिक्षा दी जा रही है.

जमुई जिले के खैरा प्रखंड के बेला गांव स्थित मिडिल स्कूल परिसर में बालिका छात्रावास चलता है. जहां पर 100 लड़कियों के रहने- खाने और उन्हें स्कूल के बाद अतिरिक्त शिक्षा देने का प्रावधान है. यंहा वर्ग 1 से 10 तक की पढ़ाई पूरी करने के लिए 100 लड़कियों का नामांकन होता है.

सरकार के शिक्षा विभाग के समग्र शिक्षा अभियान के तहत इस बालिका छात्रावास का संचालन बीते 2 वर्षों से हो रहा है. इसका उद्देश्य है उन लड़कियों को यहां पर रखकर शिक्षा से जोड़ना, जो या तो स्कूल से ड्रॉप आउट हो चुकी हैं या फिर उनका स्कूल में कभी नामांकन ही नहीं हुआ. जाहिर है यह बालिका छात्रावास जमुई जिले के नक्सल प्रभावित इलाके के गांवों की उन लड़कियों के लिए वरदान साबित हो रहा है जो अभी तक शिक्षा से दूर रही हैं.

बालिका छात्रावास के प्रभारी रजनीश कुमार का कहना है कि जमुई के बेला में चलने वाला है छात्रावास सूबे का एकमात्र बालिका छात्रावास है जहां पर उसी इलाके की लड़कियां रहकर पढ़़ती हैं.


खैरा इलाके के बरदौन की रीता हांसदा, जाताजोड़ की प्रियंका हेम्ब्रम ताराटांड़ की नेहा मुर्मू या फिर दीपा करहर की रानी टुड्डू कहती हैं कि वे अब जंगल से लकड़ी नहीं काटेंगी, पढ़ लिखकर आगे बढ़ेंगी और नौकरी करेंगी.

यहां की शिक्षिका सूर्यमणि हेम्ब्रम की मानें तो लड़कियां जब शुरू में आई थी हिंदी बोलना नहीं जानती थी. कई ऐसी भी हैं जिनके गांव में अभी तक किसी ने मैट्रिक पास तक नहीं किया है. अब यहां आकर ये और इनके परिजन शिक्षा के महत्व को समझ गए हैं. अब यह लोग पढ़ लिख कर आगे बढ़ना चाहती हैं कुछ करना चाहती हैं.

लड़कियों को यहां पर स्कूली शिक्षा तो दी ही जा रही है उनके प्रतिभा को निखारने के लिए अलग से भी पेंटिंग और गीत- संगीत जैसे कई कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं.
जिला शिक्षा पदाधिकारी विजय कुमार हिमांशु कहते हैं कि जिले के पहाड़ी क्षेत्र में बसे गांव से आने वाली लड़कियों को शिक्षा से जोड़ने के लिए विभाग लगातार काम कर रहा है. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में उन इलाकों में भी शिक्षा में बदलाव आएगा जहां से यह लड़कियां आती हैं.आदिवासी और अनुसूचित जाति समाज से आने वाली लड़कियां अब उन पिछड़े इलाके में भी शिक्षा को बढ़ावा देने में मददगार हो सकती हैं जहां शिक्षा का प्रकाश अब तक नहीं पहुंच पाया है.

ये भी पढ़ें

जमुई के दो जूनियर एथलीटों ने नेशनल लेवल के मीट में जीता मेडल

गीत-संगीत के जरिए संस्कृत पढ़ा देता है जमुई का यह नौजवान

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जमुई से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: November 27, 2019, 10:27 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर